29 फ़र॰ 2008
अपनी सरहद की सुरछा ख़ुद करें
फिराक को याद करेगा प्रेस क्लब
28 फ़र॰ 2008
भाई की मौत पर हाय-हाय करते फिराक
घाट पर जलने- जलाने के हैं सामां हाय-हाय
किस कद्र खामोश है शहर-ऐ- ख्मोशा हाय-हाय
मिटती जाती है उफक से सुर्खिये-ऐ- रंग शफक
बढ़ता जाता है स्वाद-ऐ-शाम-ऐ- जिंदा हाय-हाय
वो सुकुते-ऐ-गम वो एक हंगामा बे-शोरोशर
याद आके कुछ वो उठना दर्द-ऐ-हिजरां हाय-हाय
एक सन्नाटे का आलम है दरों-दीवार पर
शाम-ऐ- जिन्दान अब हुई तो शाम-ऐ-जिंदान हाय-हाय
यह चमकते दर्द, यह जुल्मत, यह दिल उमड हुए
यह छलकते जाम यह बज्मे चिरागा हाय-हाय
अब कहाँ है खून रोने वाले मेरे दर्द पर
खाक में मिल जाने वाले लाला कारा हाय-हाय
निजा में देखा था वो चेहरा उतरते अहले दिल
उस शकिस्ट-ऐ-रंग के आइना दारा हाय-हाय
उफ़ बगूलों का यह आलम बाढ़ ऐ सर सर का यह जोश
खाक उडाता है तेरे गम में बयाँबा हाय-हाय
मरने वाले याद आती है जन्वामरगी तेरी
उठ गया दिल में लिए तूं दिल के अरमान हाय-हाय
याद आयेगी किसी शोरीदा सर वह्शातें
देख कर गुल्कारिये दीवारे जिंदा हाय-हाय
सोने वाले ख़ाक वीरानों में उड़ती है तेरी
बादऐ सर सर है तेरी गह्वारा-ऐ- जुम्बा हाय-हाय
यह घड़ी भी आयी और जीता हूँ मैं हिर्मानसीब
छूटता है हाथ से दामान-ऐ-जाना हाय-हाय
नश्तर-ऐ-गम उज्लते जज्ब-ऐ-निहां की दाद दे
कर लिया तुझको भी पैवस्त-ऐ-रग-ऐ-जान हाय-हाय
मेरी किस्मत में तुझे कान्धा भी देना जब न था
दिल ने यों बांधा था तुझसे अह्दो पैमा हाय-हाय
अलविदा ऐ जोर-ऐ-बाजू प्यारे भाई अल फिराक
अब तो मैं हूँ और तेरे दाग-ऐ-हिजरां हाय-हाय
कैद में जी खोल के रोना भी मुश्किल हो गया
अब मैं समझा माँअनी-ऐ-तंगी-ऐ-जिंदा हाय-हाय
आह! यह आदाब-ऐ-जिंदा यह शआर-ऐ-जब्त-ऐ-गम
यह वफूर-ऐ-दर्द यह हाल ये परीशान हाय-हाय
अपने मरने पर मेरा रोना था तुझको गवार
इतना कब था मुझको पास-ऐ-अहल-ऐ-जिंदा हाय-हाय
शर्म आती है मुझे जीने से तुझको खो के आह!
इस तरह करना न था तुझको पशेमा हाय-हाय
कैद में भी परदादाआरी गम की मुश्किल हो गई
खुल गया राज-ऐ-दरों- दीवार-ऐ-जिंदा हाय-हाय
घर को मैं क्या मुंह दिखाउंगा रिहा होकर फिराक
मैं असीर और उनके यह हाल-ऐ-परेशा हाय-हाय
26 फ़र॰ 2008
तुम कौन अपिरिचित घर आए

गुनाह और बंजारे, ज़रा आप भी विचारें
यकीनन! कभी कभी सड़कों, गलियों में घुमते या अपराध सुर्खियों में दिखायी देने वाले कंजर,दाढी, करवाल, सांसी, नत, मदारीसपेरे, बंजारे, बावरिया, कबुत्राए, न जाने कितनी जातियाँ हैं जो सभ्य समाज के हाशिये पर डेरा लगाए सदियाँ गुजार देती हैं। हमारा उनसे चौकन्ना सम्बन्ध सिर्फ़ कामचलाऊ ही बना रहता है। उनके लिए हम सब सभ्य और उनका इस्तेमाल करने वाले शोषक- उनके अपराधों से डरते हुए, मगर उन्हें अपराधी बनाए जाने के आग्रही। हमारे लिए वे ऐसे छापामार गुरिल्ले हैं जो हमारी असावधानियों की दरारों से झपट्टा मार कर वापस अपनी दुनिया में जाकर छिप जाते हैं। ऐसे लोग या तो जेल में रहतें हैं या फ़िर अपराध के सफर में, इनके घरों की महिलाएं शराब की भट्टियों पर या सभ्य कहे जाने वालों के बिस्तरों पर। यह परिवार तो एक नजीर है लेकिन ऐसे बहुत से परिवार पूर्वांचल में भटक रहे हैं और उनके हाथों अपराध हो रहे हैं। फूलन देवी, मान सिंह, मलखान सिंह, ब्रजेश और राजन जैसों को राजनीतिक दल पनाह देकर उन्हें वोट के कारोबार में उतारते हैं और माननीय बना देते हैं। सुनील पाण्डेय और मुन्ना शुक्ला जैसों को विधान सभा में जगह मिल जाती है। अन्नत सिंह बंदूकें लहराता है और सरेशाम मौत का फरमान जारी कर देता है लेकिन उन पर पुलिस के हाथ नही पंहुच पाते। ये बंज्जारे हैं। थके हारे। पता नही कबसे अपनी छाती में इतिहास का दर्द छिपाये .........अपराध पर अपराध करते जा रहे हैं। इनकी व्यथा को समझने के लिए तो कोई जयप्रकाश नारायण चाहिए, कोई सुब्बा राव चाहिए, मगर उत्तर परदेश अथवा इस देश की पुलिस में ऐसे लोगों की बात दूर, ऐसा सोचने वाले भी नही हैं और अगर किसी ने सोचा तो आपख़ुद नतीजा सोच सकते हैं।
मुझको कत्ल करो

20 फ़र॰ 2008
दुःख को सहने की शक्ति दे भगवान्
सूखी नही कलम की स्याही

मंडी एक हकीकत

17 फ़र॰ 2008
16 फ़र॰ 2008
तीसरी कसम

वी पी सिंह की खामोशी
15 फ़र॰ 2008
14 फ़र॰ 2008
मोबाइल और मुसीबत

रघुपति राघव राजाराम
वसीयत
13 फ़र॰ 2008
विनय भइया
माचिस की तिली
राज ठाकरे की दादागिरी और पूर्वांचल
मुम्बई में राज ठाकरे की दादागिरी चल रही है। यहाँ लोग-बाग़ परेशां है। यंही के लोगों ने खून पसीना बहाकर मुम्बई को चमकाया है। यंहा के लोग तो फिजी, सूरीनाम, गुयाना, मारीशाश,त्रिनिदाद, टोबैको और दुनिया के पता नही कितने देशों में गए और अपनी उपलब्धियों का इतिहास लिखा। पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग हर जगह फैले है। मुम्बई का हर इलाका इन लोगों के कहकहों से गुलजार है। वंहा जब भी कोई हवा बहती है पूरब के लोगों की जुबान से उसका अहसास जरूर होता है। यंहा के लोंगो को मुम्बई से अलग कर दिया जाय तो वहां इतिहास के गुनागुनानें या ठंडी साँस लेने की कोई आवाज नही आयेगी। राज ठाकरे अपनी दादागिरी को कायम रखने के लिए चाहे जो तर्क गढ़ लें लेकिन वे इस बात को कैसे झुठला देंगे की मुम्बई की फिजा में अब भी कैफी के गीत गूंजते है। अब भी राही के संवाद सुनायी पड़ते है। कमलेश्वर की आंधी आज भी अपनी मौजदगी दर्ज कराती है। उससे भी आगे वहा के कल-कारखानों से यहाँ के मजदूरों दे पसीनो की गंध हर उत्पाद के साथ आती है। मुम्बई की फैक्ट्रियों में यू पी और बिहार के सपने भेज दिए जाते है। यंहा का श्रम और युवाओं की अनमोल जवानी कौद्दियों के भाव वहा बिक जाती है। अब भी गांवों में रेलिया बैरी पिया को लिए जाय रे गीत'''''''''' चाव से ही सुने जाते है। यंहा टू बेरोजगारी ऐसी है की जब राज ठाकरे की तरह हुमांच भरने का वक्त आता तो गजभर की छातियों वाले बेरोजगारी के चूल्हे में जोत् दिए जाते है। अब वे अपने सपनो का तेल निकालें या राज ठाकरे की दादागिरी का जवाब दे। इसीलिए तो राज की सरहद बढ़ रही है।
राज के लिए यह सोचने की बात है की मुम्बई में उन्हें जिनकी बड़ी तादाद दिख रही है वे वहा नादिर और तैमुर नही है। वे तो एक विरह है। उनके लिए यहा न जाने कितनी आंख का काजल बहकर सुख गया है। मुम्बई की तरह उद्योग की हर बड़ी नगरी यहाँ के बेरोजगारों की सरहद है। राज ठाकरे एक और बात कहू- यहाँ के लोग पूरी दुनिया को अपने में समेत्नें की ताकत रखतें है। ५-६ दशक पहले महारास्त्त्रे से मधुकर विनायक दिघे नाम के एक नौजवान ने गोरखपुर की जमीन पर कदम रखा। मजदूरों के बीच रहने वाले इस नौजवान को यहाँ के लोंगो ने अपने सीने से लगा लिया। कई बार दिघे विधायक बने। प्रदेश सरकार में वित्त मंत्री बने और गवर्नर भी बने। उन्हें यहा के लोंगों ने अपने कन्धों पर बिठाया। राज ठाकरे शुक्र करो मधुकर दिघे बीमार है। वरना आज के राजनीतीक दलों के लोग जिस तरह सियासत के लिए हाथ बांधे बैठे है वे चुप नही बैठते। दीघे तो सीधे मजदूरों की गोल बनाते और राज जैसों से दो-दो हाथ जरूर कर लेते। यकीन करना जब भी मुम्बई के लोग किसी मोर्चे पर हार जाते हैं यहीं के लोग मोर्चा सँभालते हैं।
12 फ़र॰ 2008
बाबा

दूसरा वनवास
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये।
रक्स दीवानगी आँगन में जो देखा होगा।
६ दिसम्बर को श्रीराम ने ये सोचा होगा।
इतने दीवाने कंहा से मेरे घर में आये।
जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशा।
प्यार की कहकशां लेटी थी अंगडाई जहाँ।
मोड़ नफरत के उसी राहगुजर में आये।
धर्म क्या उनका है क्या जाट है यह जनता कौन।
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन।
घर जलाने को मेरा यार लोग जो घर में आये।
शाकाहारी है मेरे दोस्त तुम्हारा खंजर।
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर।
है मेरे सर की खाता जख्म जो मेरे सर में आये।
पांव सरयू में अभी राम ne धोये भी न थे।
कि नज़र आये वहाँ खून के गहरे धब्बे।
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे।
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे।
राजधानी की फिज्जा आयी नही रास मुझे।
६ दिसम्बर को मिला दूसरा वनवास मुझे।
देव को लिखते हुए कैफी आजमी की यह रचना मुझे याद आयी। सोचा कंही देव को मिल गयी तो कैफी को श्रधान्जली होगी। बस यही सोचकर इसे पोस्ट कर रहा हू। वैसे भरोसा यह भी है कि यह अमनपसंदों को रास आयेगी.
फोटो एक ऐसे संत की है जो वास्तव में राम के आदर्श पर जंगल में फल फूल खाकर जीवन गुजार रहे है.