26/02/2008

गुनाह और बंजारे, ज़रा आप भी विचारें

मैत्रेयी पुष्पा ने अल्मा कबूतरी उपन्यास लिखा है। जन जातियों और कबीलों में रहने वाले खानाबदोश लोंगों की कहानी है। कहानी में खास तौर पर पुलिस द्वारा ऐसे लोगों को अपराधी बनाए जाने की पड़ताल है। कई निर्दोष लोगों को गुनाह के दलदल में धकेले जाने की गाथा है। बहुत पहले नागेश मिश्रा ने मुझे यह उपन्यास पढने को दिया था और मुझे बेहद पसंद आया। असल में पुलिस की नौकरी में नागेश को कई अनुभव हासिल हुए और उन्होंने माना की कई बार मजबूरी बस इनपर कार्रवाई करनी पड़ती है। कल पुलिस ने एक अपराधी के जीवन की हस्तरेखा मिटा दी। जिस आदमी को पुलिस ने कल गोलियों से भून दिया उसके घर की कहानी वेदनाओं से भरी है। आजादी केबाद इस खानाबदोश परिवार का बुधिराम दाढी बनकटिया गांव के नन्दलाल केवट की निगाह में आया। उस जमाने में बुधिराम पहलवान था। बंजारों की तरह कभी यहाँ तो कभी वहा अपने लोगों को लिए वह घूमता रहता।घर कीमाहिलायेंसाथ में होती और उन पर सबकी निगाहें होती। एक बार ऐसे ही किसी जलती हुई निगाह को अपने घर के अंदर बुधिराम ने जाते हुए देखा तो उसका खून खौल गया। बुधिराम ने उस आदमी को अधमरा कर दिया। बलशाली बुधिराम को नंदलाल ने अपनी जमीन में जगह दी और फ़िर उन सबकी जिन्दगी बनकटिया में गुजरने लगी। केवट परिवार ने दाढी परिवार की ताकत और हुनर का खूब इस्तेमाल किया। बुधिराम के दूसरी पीढी के बलशाली जवान मारपीट और चोरी में आगे निकल गए। दाढी परिवार की यह दूसरी पीढ़ी भी केवट परिवार की वफादार रही। तीसरी पीढ़ी में सुंदर और स्मार्ट लड़के हुए। उसी तरह की लडकियां भी। बस दोनों परिवारों में एक दरार पड़ने लगी। जर और जमीन तो झगडे की वजह नही बन सकी लेकिन जोरू आदे आ गई। बुधिराम की तीसरी पीढ़ी में पन्ने और श्रीपत नाम के दो जवान हुए। अपराध की राह पर परिवार पहले से था लेकिन ये दोनों आधुनिक हो गए। चोरी और नक्ब छोड़ कर लूट करने लगे। यह हुनर केवट परिवार की छाया में सीखे। श्रीपत की बहन की अस्मत और लूटी हुई एक गाड़ी के लिए केवट परिवार के महेन्द्र से तकरार बढ़ी तो एक दिन श्रीपत और पन्ने ने महेन्द्र को मार गिराया और उसकी बंदूक लूट लिए। फ़िर सिलसिला मौत का शुरू हुआ। दोनों परिवारों में लाश गिरने लगी। केवट परिवार के चार लोग मारे गए और दाढ़ी परिवार के भी आधा दर्जन से अधिक लोग। फर्क यही की केवट परिवार दाढ़ी परिवार की गोलियओं का निशाना बना और दाढ़ी परिवार पुलिस की गोलियों का। कल जिस शिवप्रसाद दाढी को पुलिस ने सहजनवा में अपनी गोलियों का शिकार बनाया वह अपराधी था इससे इनकार नही किया जा सकता। शिवप्रसाद समेत इस परिवार के पन्ने, श्रीपत, प्रकाश, शिवमूरत पुलिस की गोली के शिकार बन गए हैं। पन्ने के बाप तेजमन को एक गाँव में नकबजनी के दौरान लोगों ने काट डाला। १० फरवरी १९९८ को श्रीपत कोराजधानी में पुलिस ने मारा था। अपराध की राह पर चलते हुए श्रीपत इतना शातिर हो गया की उसने गोल बनाकर अपराध से राजनीति में गए बाहुबली विधायक ओंप्रकाश पासवान की हत्या कर दी। चुनाव प्रचार के दौरान श्रीपत और उसके साथियों ने देशी बम से एक दर्जन लोगों कोउड़ा दिया। पर उसके बाद श्रीपत के घर में अगर किसी ने चैन की जिन्दगी गुजारने की सोची भी तो पुलिस ने अपराध की राह पर चलने को मजबूर कर दिया। यह एक ऐसे व्यथित परिवार की गाथा है जिसका इतिहास स्याह है। पर एक सच्चाई यह भी है की एक जांबाज परिवार को ग़लत राह पर धकेल कर उनकी उर्जा बरबाद कर दी गई।

यकीनन! कभी कभी सड़कों, गलियों में घुमते या अपराध सुर्खियों में दिखायी देने वाले कंजर,दाढी, करवाल, सांसी, नत, मदारीसपेरे, बंजारे, बावरिया, कबुत्राए, न जाने कितनी जातियाँ हैं जो सभ्य समाज के हाशिये पर डेरा लगाए सदियाँ गुजार देती हैं। हमारा उनसे चौकन्ना सम्बन्ध सिर्फ़ कामचलाऊ ही बना रहता है। उनके लिए हम सब सभ्य और उनका इस्तेमाल करने वाले शोषक- उनके अपराधों से डरते हुए, मगर उन्हें अपराधी बनाए जाने के आग्रही। हमारे लिए वे ऐसे छापामार गुरिल्ले हैं जो हमारी असावधानियों की दरारों से झपट्टा मार कर वापस अपनी दुनिया में जाकर छिप जाते हैं। ऐसे लोग या तो जेल में रहतें हैं या फ़िर अपराध के सफर में, इनके घरों की महिलाएं शराब की भट्टियों पर या सभ्य कहे जाने वालों के बिस्तरों पर। यह परिवार तो एक नजीर है लेकिन ऐसे बहुत से परिवार पूर्वांचल में भटक रहे हैं और उनके हाथों अपराध हो रहे हैं। फूलन देवी, मान सिंह, मलखान सिंह, ब्रजेश और राजन जैसों को राजनीतिक दल पनाह देकर उन्हें वोट के कारोबार में उतारते हैं और माननीय बना देते हैं। सुनील पाण्डेय और मुन्ना शुक्ला जैसों को विधान सभा में जगह मिल जाती है। अन्नत सिंह बंदूकें लहराता है और सरेशाम मौत का फरमान जारी कर देता है लेकिन उन पर पुलिस के हाथ नही पंहुच पाते। ये बंज्जारे हैं। थके हारे। पता नही कबसे अपनी छाती में इतिहास का दर्द छिपाये .........अपराध पर अपराध करते जा रहे हैं। इनकी व्यथा को समझने के लिए तो कोई जयप्रकाश नारायण चाहिए, कोई सुब्बा राव चाहिए, मगर उत्तर परदेश अथवा इस देश की पुलिस में ऐसे लोगों की बात दूर, ऐसा सोचने वाले भी नही हैं और अगर किसी ने सोचा तो आपख़ुद नतीजा सोच सकते हैं।

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