12/03/2012

किचन के भी मास्टर हैं अखिलेश यादव

आनन्द राय


लखनऊ, 11 मार्च : सैंतीस साल के चन्द्रशेखर सिंह के अलबम में यूपी के होने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जुड़ी अनगिनत यादें हैं। आस्ट्रेलिया में पढ़ते समय दोनों एक साथ अगल-बगल पेइंग गेस्ट बनकर रहे। दोनों ने सुख-दुख साझा किया। उन दिनों मुलायम सिंह यादव भारत सरकार के रक्षा मंत्री थे, लेकिन अखिलेश ने अपनी सादगी से कभी चन्द्रशेखर को अहसास नहीं होने दिया कि उन दोनों की हैसियत में जमीन-आसमान का अंतर है। उनके इसी बड़प्पन को चन्द्रशेखर आज तक भूल नहीं पाए हैं और अब भी उनकी दोस्ती की गांठ उतनी ही मजबूत है। 1/2 फैजाबाद रोड, शिवस्थली में रहने वाले चन्द्रशेखर बैंकिंग ट्रेड से जुड़े हैं।

पहली मुलाकात : 1996 में चन्द्रशेखर यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न सिडनी से एमबीए करने गए थे। उन्हीं दिनों अखिलेश यादव ने यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी में एमटेक में दाखिला लिया। अखिलेश के हास्टल के रूम पार्टनर दीपक और चन्द्रशेखर के रूम पार्टनर सुनील धींगरा दिल्ली के रहने वाले थे। अखिलेश ने आस्ट्रेलिया पहंुचते ही भारतीयों को एकत्र करना शुरू किया। तभी दीपक और सुनील ने अखिलेश और चन्द्रशेखर की मुलाकात कराई। फिर धीरे-धीरे दोनों एक दूसरे से मिलने जुलने और फोन पर बातें करने लगे।

छोड़ा हॉस्टल : उस समय चन्द्रशेखर डेनट्रे ड्राइव में पेइंग गेस्ट थे। दोनों के बीच अपनी दिनचर्या को लेकर बातें होती। लगभग ढाई तीन महीने बाद अखिलेश ने हास्टल छोड़ दिया। चन्द्रशेखर के संदर्भ से वह उनके पड़ोस में आस्ट्रेलियन और फिजी इंडियन दंपती डेविड और रश्मि के पेइंग गेस्ट बन गए। अगल-बगल आने के बाद दोनों की नजदीकियां बढ़ती गई। तभी पता चला कि इस नौजवान के दिल में जो ख्वाब पल रहे हैं, उसका सिरा उत्तर प्रदेश की तकदीर से जुड़ा है।

आलू की रसेदार सब्जी और भारतीय प्रेम : आस्ट्रेलिया में अखिलेश का भारतीय प्रेम हर दिन बढ़ता गया। देसी खाने की याद उन्हें खूब आती और उन्होंने किचन में भी अपना दखल दिया। आलू-मटर की रसेदार सब्जी इतनी अच्छी बनाते कि सभी दोस्त तारीफ किए बिना नहीं रहते। उनकी हर पार्टी में यह सब्जी जरूर होती।

संवेदनशील व्यक्तित्व और मुश्किल के साथी : उस दिन बेहद मुश्किल का क्षण था। चन्द्रशेखर के मकान मालिक सैम का अचानक एक्सीडेंट हो गया। उस समय चन्द्रशेखर आटोमेटिक गाड़ी चलाना जानते थे। अस्पताल जाने के लिए अपने एक परिचित की गाड़ी मांगी। खूब बारिश हो रही थी और वह घबराहट में भी थे। तभी अखिलेश को पता चला तो वह भी साथ चल दिए। ड्राइविंग करते समय चन्द्रशेखर से गाड़ी का संतुलन बिगड़ गया। अखिलेश ने उनको तसल्ली दी और खुद ड्राइव कर अस्पताल तक ले गए।

बच्चों से लगाव : अखिलेश को बच्चों से बहुत लगाव है। चन्द्रशेखर के मकान मालिक सैम के बच्चों के जन्मदिन पर अखिलेश और वह मिल जुलकर केक काटते और उनको गिफ्ट देते। इसी तरह डेविड के बच्चों के जन्म दिन पर भी वह लोग मिलकर आयोजन करते।

मेधावी विद्यार्थी और सादा जीवन : चन्द्रशेखर बताते हैं कि अखिलेश पढ़ाई में बहुत रुचि लेते थे। अपना हर असाइनमेंट पूरा करते थे। उनका जीवन इतना सादा था कि मेट्रो जैसी सेवा का प्रयोग करते थे। वह टंगारा से ही यात्रा करते थे।

पर्यावरण में गहरी रुचि : अखिलेश की पर्यावरण में गहरी रुचि है। आस्ट्रेलिया में क्रीक (नहरों) के किनारे पेड़ पौधे और फूलों को देखकर वह बहुत खुश होते और भारत के लिए उसी तरह की परिकल्पना करते।







UP Election 2012 Perception| Post Issues, Views at Dainik Jagran

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01/03/2012

मैं इतना स्वार्थी भी नहीं हूं कि सिर्फ अपने लिए सोचूं

बाबू सिंह कुशवाहा


एक समय था जब बाबू सिंह कुशवाहा बसपा प्रमुख मायावती के गिने चुने राजदारों में शुमार होते थे। एनआरएचएम में जब हत्याओं का दौर शुरू हुआ तो खून की छीटे बाबू सिंह कुशवाहा के भी दामन पर आए लेकिन तब बसपा और पूरी सरकार उनके बचाव में खड़ी हुई। भले ही उनका मंत्री पद चला गया था लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी हनक और धमक खत्म नहीं हुई लेकिन न जाने अचानक ऐसा क्या हुआ कि बसपा के अंदर ही बाबू सिंह कुशवाहा अपने को असुरक्षित महसूस करने लगे और नौबत यहां तक आ गई कि उन्हें सार्वजनिक तौर पर यह कहना पड़ा कि कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर और प्रमुख सचिव गृह फतेहबहादुर उनकी हत्या करा देना चाहते हैं। उसके बाद उन्हें बसपा से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कुछ समय तक उनकी कांग्रेस के साथ खिचड़ी पकी लेकिन बात नहीं बनी तो उन्होंने भाजपा से हाथ मिला लिया। वह आज कल भाजपा के लिए वोट मांग रहे हैं। मंगलवार को दैनिक जागरण के साथ बातचीत में उन्होंने अपने दिल की बात रखी है। प्रस्तुत है आनन्द राय के साथ हुई उनकी बातचीत के प्रमुख अंश :

0बसपा से आपका मोहभंग क्यों हो गया?


- मेरे खिलाफ तमाम षडयंत्र हुए और मैं चुप रहा। 28 नवंबर को मुझे बसपा से बाहर कर दिया गया तो भी खामोश रहा। लेकिन जब हद हो गयी.... (फिर खामोश हो जाते हैं)

0 क्या हद हो गयी ?

- मेरे खिलाफ बड़ी साजिशें हुई। अचानक बांदा में मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया और जिसने मुकदमा किया उसकी सुरक्षा बढ़ाई गयी। उसे टिकट दिया गया। मेरे लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कराकर मुझे तहस-नहस करने की कोशिश की गई।

0यह सब क्यों किया गया!
- मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर और प्रमुख सचिव गृह फतेहबहादुर मेरी हत्या की साजिश में लगे थे। मुकदमे इसलिए दर्ज करवाए जा रहे थे कि जेल भेजकर वहां मेरी हत्या करा दी जाए। इसकी तैयारी हो चुकी थी।

0 क्या इसी खौफ और सीबीआइ की डर से आप कांग्रेस में जाना चाह रहे थे?

- यह तो अफवाह है। सीबीआइ जांच से बचने के लिए बसपा ने आठ साल से कांग्रेस को समर्थन दिया है। यह कौन नहीं जानता है। मैं तो यह भी जानता हूं कि बसपा ने किसको बचाने के लिए कब किससे समझौता किया है।

0राहुल गांधी से तो आपकी मुलाकात हुई?

-राहुल से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई।

0 तो क्या वह गलत बोल रहे हैं?

- मैं यह कैसे कह सकता हूं। वह बड़े नेता हैं, लेकिन मेरी उनसे मुलाकात नहीं हुई, यही सच है।

0भाजपा वालों ने आपसे सम्पर्क किया था या आपने किया था?

- ओबीसी के आरक्षण की कटौती के खिलाफ भाजपा पिछड़ों के साथ थी, इसलिए हम उसके साथ हो गए। सपा और बसपा तो कांग्रेस के पक्ष में थीं और एक बार भी विरोध में जुबान नहीं खोली। यह दोनों दल सही मायने में पिछड़ों के विरोधी हैं।

0लेकिन भाजपा विपक्ष के दबाव में आ गई और आपकी सदस्यता भी स्थगित हो गई?

- विपक्ष नहीं, मीडिया ने मेरा इतना बाजा बजा दिया कि .. और मैं इतना स्वार्थी भी नहीं हूं कि सिर्फ अपने लिए सोचूं।

0तो फिर इतना त्याग मायावती के साथ क्यों नहीं किए?

- मुझे तीखा बोलने पर मजबूर न करें। मुझे बसपा अध्यक्ष के चरित्र की नहीं, अपनी चिंता है। 20 साल किसी के साथ रहा हूं तो सोचता हूं कि ऐसी बात न निकले जिससे मुझे पछतावा हो। लेकिन 20 साल की वफादारी की उन लोगों ने कोई कीमत नहीं समझी। मेरी पीठ में छुरा घोंप दिया।

0एनआरएचएम घोटाले में तो आपके खिलाफ सीबीआइ के पास सबूत हैं?

-पहले यह जानकारी करिए कि वाकई घोटाला कहां हुआ। एनआरएचएम के प्रोसीजर मिस्टेक को जानिए। इसमें मंत्री की कोई भूमिका नहीं होती। मुख्यमंत्री पदेन अध्यक्ष हैं और सभी फैसले उनकी अध्यक्षता में होने वाली बैठकों में होते हैं। उनकी अनुपस्थिति में विभागीय मंत्री को अध्यक्षता करनी होती है। पौने दो साल के कार्यकाल में मुझे तो कभी अवसर ही नहीं मिला। मेरा इस घोटाले से कोई लेना देना नहीं है।

0फिर आपके खिलाफ सीबीआइ का मुकदमा और बार-बार पूछताछ?

- देखिए यह तो शशांक शेखर और फतेहबहादुर ने पूरा होमवर्क किया। इन्हीं लोगों ने सारी पीआइएल कराई। सभी पेपरवर्क ऐसे कराया, जिससे मैसेज जाए कि कुछ गड़बड़ है। इसमें नीता चौधरी ने भी उन लोगों का साथ दिया। यह लोग तो मुझे सचान मामले में जेल भेजने की तैयारी कर चुके थे। (यह बताते हुए कुशवाहा रोने लगे) .... वे लोग अभी भी मेरी हत्या की साजिश कर रहे हैं।

0दो-दो सीएमओ की हत्याएं? इसकी वजह?

-यह तो मुझे फंसाने और बदनाम करने का षड्यंत्र रहा। कुछ बड़े लोगों का नाम नहीं लेना चाहूंगा, लेकिन हत्याएं इसीलिए कराई गई कि मैं बदनाम हो जाऊं।

0 कहा जाता है कि बसपा सरकार में कोई काम बगैर पैसे के नहीं होता?

(अनमना होकर) दूसरा सवाल पूछिए।

0 लेकिन यह तो बता सकते हैं कि सरकार में पैसों के लेन-देन में कौन लोग शामिल रहते हैं?

बहुत सारी चीजें कहने की नहीं होती हैं। कौन सी ऐसी चीज है जो मीडिया से छिपी है।






अवधेश के आंसू का असर बता पाना मुश्किल

सीतापुर-शाहजहांपुर रोड पर चकभिटारा चौराहा है। यहीं से एक सड़क निकलती है जो रेलवे क्रासिंग पार कर कहलिया तक जाती है। कहलिया प्रदेश सरकार के बर्खास्त मंत्री अवधेश वर्मा का गांव है। वही अवधेश वर्मा जो बसपा से टिकट कटने पर फूट-फूट कर रोने लगे और उनका आंसू देखकर भाजपा पिघल गई। पर कहलिया जाकर भी यह बता पाना मुश्किल है कि अवधेश के आंसू मतदाताओं के दिल पर कितना असर कर पाये हैं। सियासी रुख को लेकर उठे सवाल पर रास्ते में ही मिले मुंशीलाल कहते हैं कि अभी कोई पतो नहीं, सब गुप्ते दान हो। गांव के कई लोग तो कुछ भी कहने से इंकार कर देते हैं।

ददरौल में बसपा के टिकट पर दो बार जीते और मंत्री बनने वाले अवधेश वर्मा अक्सर सुर्खियों में रहे हैं। वर्मा की हैट्रिक न बने, इसलिए सभी दलों ने समीकरण बिठाए हैं। मसलन सपा ने उनकी ही जाति के कद्दावर नेता, पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद राममूर्ति वर्मा को सामने खड़ा कर दिया है, जबकि बसपा ने इस दफा मुस्लिम फेस पर दांव लगाते हुए रिजवान अली को मौका दिया है। कांग्रेस से कौशल मिश्रा, पीस पार्टी ने अरविन्द पाल और महान दल ने पूर्व विधायक देवेन्द्र पाल सिंह को टिकट दिया है। यहां छोटे दलों और निर्दलियों समेत कुल 16 उम्मीदवार हैं।

ददरौल की सियासी लड़ाई भी जातियों के बीच सिमटी हुई है। अवधेश वर्मा भाजपा के उम्मीदवार हो गये हैं, लेकिन इस दल के परंपरागत ब्रांाण मतों पर कांग्रेस के कौशल मिश्रा अपना हक जता रहे हैं। बसपा के रिजवान अली ने दलित और मुसलमानों के गठजोड़ से लड़ाई को रोमांचक कर दिया है। लेकिन सर्वाधिक सेंधमारी पीस पार्टी के अरविन्द पाल कर रहे हैं। इलाके में गड़रिया मतदाताओं की भी अच्छी संख्या है, इसलिए पाल अपनी जाति के साथ पीस पार्टी के मुस्लिम मतों पर भरोसा किये बैठे हैं। महान दल के साथ कुशवाहा और मौर्या जाति का आधार है, जबकि इसके उम्मीदवार देवेन्द्र पाल सिंह ने ठाकुरों को लामबंद करना शुरू किया है। जातीय गोलबंदी के बीच दलीय जनाधार के भी मायने तलाशे जा रहे हैं। सभी दलों के बड़े नेता भी उम्मीदवारों का माहौल बनाकर जा चुके हैं, लेकिन किसी के आने से कोई हवा नहीं बनी है। बहादुरपुर के वेदराम वर्मा कहते हैं कि कोई आए और कोई जाए, हवा नहीं बहनी है। मर्जी है वोटर की, चाहे जिस ओर ले जाए। यकीनन वोटर की मर्जी से हवा बहनी है, लेकिन उसकी खामोशी ने कयासों की बुनियाद हिला दी है। खेतिहर रामचंद्र वर्मा से जब उनकी जाति का हवाला देकर अवधेश के बारे में बात की गयी तो वह राममूर्ति वर्मा का भी नाम गिनाते हैं। पर किसके पक्ष में हैं, यह नहीं बताते। लेकिन दुकानदार महीपाल का कहना है कि हम तो साफ कहों, इहां दुइए की हवा है। एक ठो साइकिल और दूसरी हाथी। ददरौल में चुनाव को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखता है, लेकिन सड़कों पर दौड़ रही उम्मीदवारों की गाडि़यां सियासी गर्मी पैदा करने की कोशिश कर रही हैं। एक निर्दल उम्मीदवार की शिकायत रहती है कि मैं इतना मजबूत प्रत्याशी हूं, लेकिन मीडिया मेरी नोटिस नहीं ले रहा है। हालांकि उनके जाते ही पीछे खड़े कई युवा उनको खारिज कर देते हैं। बड़े दलों के बारे में मतदाता अपना मंतव्य भले स्पष्ट न करें, लेकिन निर्दलीय और छोटे दलों के कई उम्मीदवारों को लोग वोटकटवा कहने से भी नहीं चूक रहे हैं। कहलिया, अकबरपुर, कटरा, जलालाबाद, मदनापुर, कांठ, सेहरामऊ समेत हर जगह एक ही जैसा माहौल दिखता है। अंतर सिर्फ यही कि कहीं किसी का प्रभाव ज्यादा तो कहीं किसी का।

लखीमपुर खीरी में सियासी गूंज

आनन्द राय


पड़ोसी देश नेपाल की सरहद से सटे लखीमपुर खीरी जिले का भौगोलिक दायरा काफी बड़ा है, लेकिन इसके सापेक्ष जिले में सियासी गूंज नहीं सुनाई पड़ती। दल और पसंद का उम्मीदवार जाहिर करने में यहां के मतदाता भी औरों की तरह ही है। सलेमपुर पालिटेक्निक के सामने सीमेंट की दुकान चला रहे संजय से हवा का रुख पूछने पर कोई साफ जवाब नहीं मिलता है। बस टालमटोल और सभी की जय-जय। चतुराई भरे इस अंदाज से कोई कयास लगाए भी तो क्या। लेकिन यहां निर्दल चुनाव लड़ रहे अन्ना आंदोलन के सिपाही, राष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी और वाइडी कालेज के प्रवक्ता डाक्टर योगेश कुमार से जब कुछ लोग उनकी जाति और क्षेत्र पूछते हैं तो लगता है कि यहां भी जाति की कसौटी पर ही सियासी सूरमा परखे जा रहे हैं।

साहित्यकार डाक्टर सत्येन्द्र दुबे कहते हैं कि जनता माशाअल्लाह है। पांच साल मुद्दों की बात करती है, लेकिन नेता पता नहीं क्या डमरू बजा देते हैं कि चुनाव में जातियों की बात सुनाई पड़ने लगती है। जिले में ब्रांाणों की अच्छी संख्या है, लेकिन सबसे प्रभावशाली कुर्मी बिरादरी है। इस बिरादरी को सहेजने के लिए सभी दलों के बड़े नेता भावनाओं की लहर चला चुके हैं। वैसे चुनावी नतीजों का रुख मोड़ने के लिए दलितों की खासी तादाद भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सिख, यादव, कुशवाहा, कहांर समेत कई और जातियां हैं। मुसलमान वोटर भी निर्णायक भूमिका में हैं। राजनीति विज्ञान के शिक्षक डाक्टर एससी मिश्र जातियों की सियासत पर दुख प्रकट करते हुए कहते हैं कि अगर ऐसा नहीं रहता तो वर्षो से यह जिला रेल की बड़ी लाइन के लिए नहीं तरसता। लखीमपुर में शारदा और घाघरा नदी की बाढ़ तथा उजड़ते चीनी उद्योग जैसे बुनियादी मसले वजूद में हैं, लेकिन इन पर आवाज उठाने वाला कोई नहीं है।

पिछले चुनाव तक इस जिले में सात विधानसभा क्षेत्र थे जो परिसीमन में बढ़कर आठ हो गये हैं। निघासन, श्रीनगर सुरक्षित, मोहम्मदी, कस्ता सुरक्षित, पलिया, लखीमपुर, गोला और धौरहरा। इनमें तीन सीटें धौरहरा, मोहम्मदी और कस्ता सुरक्षित केन्द्र सरकार के राज्यमंत्री कुंवर जितिन प्रसाद के संसदीय क्षेत्र में पड़ती हैं। कुंवर जितिन की साख इस चुनावी कसौटी पर है। बाकी पांच सीटें कांग्रेस सांसद जफर अली नकवी के क्षेत्र की हैं। पिछली बार सात सीटों में चार सीटों पर काबिज रही समाजवादी पार्टी अबकी जनाक्रोश को वोट में बदलने की मुहिम में जुटी है और वह अपना आंकड़ा बढ़ाने की जंग लड़ रही है। सपा जिलाध्यक्ष शशांक यादव कहते हैं कि इस बार हमारी सीटें बढ़ेगी। यहां पिछली बार दो सीट बसपा को और एक भाजपा को मिली थी।

मोहम्मदी : धौरहरा से बसपा से जीते बाला प्रसाद अवस्थी अबकी मोहम्मदी में चुनाव लड़ रहे हैं। यह सीट पहले सुरक्षित थी। भाजपा के लोकेन्द्र प्रताप सिंह, कांग्रेस के अशफाकउल्लाह खान और सपा के इमरान खान भी यहां पर अपना कब्जा करने में लगे हैं। मोहम्मदी में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतीं कृष्णाराज अबकी नई बनी कस्ता सुरक्षित सीट पर आ गयीं। कस्ता में प्रभावशाली पासी नेत्री कृष्णाराज के सामने सौरभ सिंह सोनू हैं, लेकिन प्रतिष्ठा उनके पिता बसपा के जोनल कोआर्डिनेटर जुगल किशोर की ही दांव पर लगी है। यहां कुर्मी, कुशवाहा, लोध, पासी और सवर्णो को भाजपा कृष्णा राज के पक्ष में करने में जुटी है, जबकि जुगल किशोर ने भी प्रतिष्ठा बचाने को पूरी ताकत लगा दी है। यहां पर कांग्रेस से पूर्व मंत्री वंशीधर राज और सपा से सुनील भार्गव तस्वीर बदलने में जुटे हैं। ज्यादातर लोग यही कहते हैं कि सभी कृष्णाराज से ही लड़ रहे हैं। इलाके में दौरा कर रहे भाजपा के प्रदेश मंत्री दयाशंकर सिंह दावा करते हैं कि भाजपा कई सीटें जीत रही है।

निघासन : श्रीनगर से सपा से जीते आरए

उस्मानी निघासन से तकदीर आजमा रहे हैं। निघासन क्षेत्र ने लखीमपुर को सुर्खियों में ला दिया था। यहां की एक नाबालिग मुस्लिम बालिका सोनम के साथ थाने में सिपाहियों ने दुराचार कर उसकी हत्या कर दी। दो दिन पूर्व निघासन पहंुचे सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव सोनम के मुद्दे को हवा दे गये हैं। निघासन में भाजपा से अजय मिश्रा, कांग्रेस ने अजय वर्मा और बसपा से दारोगा सिंह संघर्ष में हैं। श्रीनगर के सुरक्षित हो जाने के बाद पैला से बसपा से जीते राजेश गौतम पीस पार्टी के सिंबल पर मैदान में हैं। सपा से पूर्व विधायक रामसरन हैं, जबकि कांग्रेस ने पूर्व मंत्री मायावती उर्फ माया प्रसाद पर दांव लगाया है। श्रीनगर में बसपा हराओ अभियान में सभी दल जुटे हैं। सुरक्षित सीट होने की वजह से सवर्ण मतदाताओं के बूते भाजपा उम्मीदवार मंजू त्यागी हवा बनाने में जुटी हैं। पीस पार्टी से एक और दावेदार राजाराम ने राजेश के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। पीस पार्टी की तेजी की वजह से हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण हा रहा है। जहां मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे को भुनाने की कोशिश सपा कर रही है, वहीं इसी मुद्दे पर भाजपा पिछड़ों को प्रभावी ढंग से गोलबंद कर रही है।

लखीमपुर में उप चुनाव में जीते उत्कर्ष वर्मा फिर सपा के उम्मीदवार हैं। यहां बसपा से नगर पालिका अध्यक्ष ज्ञान प्रकाश वाजपेयी, कांग्रेस से राघवेन्द्र सिंह और भाजपा से विनोद मिश्र अपनी अपनी जीत सुनिश्चित करने में लगे हैं।

गोला में कई बार सपा के टिकट पर जीते अरविन्द गिरी अबकी कांग्रेस उम्मीदवार हैं। उनके सामने सपा ने विनय तिवारी, बसपा ने हरदोई जिले के विधायक दाऊद अहमद की पत्नी सिम्मी बानो और भाजपा से ईश्र्वरदीन मुकाबले में हैं।

पलिया में भाजपा ने पूर्व मंत्री रामकुमार वर्मा और कांग्रेस ने पूर्व मंत्री विनोद तिवारी को आमने सामने कर लड़ाई तेज कर दी है, लेकिन किसान नेता बीएम सिंह ने तृणमूल कांग्रेस से यहां ताल ठोंककर सबको पशोपेश में डाल दिया है। बसपा से रोमी साहनी मैदान में हैं। धौरहरा में सपा से पूर्व विधायक यशपाल चौधरी, कांग्रेस से समरप्रताप सिंह, भाजपा से विनोद अवस्थी और बसपा से शमशेर बहादुर मैदान में लड़ रहे हैं। इस सीट पर कुंवर जितिन प्रसाद की सर्वाधिक दिलचस्पी दिख रही है।

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