30/04/2009

आमी की धार से जुडी है जोगिया कोल की आस्था

आनंद राय , गोरखपुर :
जोगियाकोल गांव की आबादी लगभग ढाई हजार है। इस गांव में हिन्दू और मुसलमान दोनों हैं लेकिन यहां मंदिर और मस्जिद नहीं है। मुसलमान तीन किलोमीटर दूर जाकर भीटी में नमाज पढ़ते हैं और हिन्दू महदेइया जाकर शंकर जी के मंदिर में पूजा करते हैं। कुछ साल पहले तक हिन्दू और मुसलमान दोनों आमी नदी के तट पर जाते थे। इस नदी की धार से उनकी आस्था जुड़ी थी। पर जबसे औद्योगिक इकाइयों ने आमी नदी को प्रदूषित किया आस्था कम होने लगी। अब तो नयी पीढ़ी का इस नदी से कोई खास लगाव नहीं रहा और पुराने लोग तरस रहे हैं कि आमी पहले जैसी हो जाय। गोरखपुर से जोगियाकोल लगभग 25 किलोमीटर दूर है। इस गांव की प्रधान वसुंधरा देवी के प्रतिनिधि उनके 28 साल के पुत्र संतोष सिंह हैं। गांव में संतोष को लोग चुन्नू कहते हैं। चन्नू बचपन में आमी नदी में नहाते थे। उन्हें याद है तब राजेश्र्वर सिंह, चन्द्रभूषण, प्रदीप, अशोक, जवाहर, रामललित, पूर्णमासी जैसे कई लोग नदी में घण्टों रह जाते थे। अब ये लोग भी नदी की ओर नहीं जाते। आमी नदी इस कदर प्रदूषित हो गयी है कि पूछिये मत। शाम को बदबू का झोंका आता है। दुर्गध इतनी कि सांस लेना भी दूभर हो जाता है। मच्छर भी खूब लगते हैं। बदबू और मच्छर के चलते लोग रात को सो नहीं पाते हैं। नदी के पानी से खेतों की सिंचाई नहीं हो पाती। पशु भी नदी में नहीं जाते। जिनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी भी अच्छी है पंम्पिंग सेट लगवा लिये हैं। अधिकांश लोग सब्जी की खेती करके अपनी आजीविका चलाते हैं। आमी नदी गांव के लोगों के लिए दुखों का पहाड़ हो गयी है। आमी के गौरवशाली अतीत को बीडीओ साहब कहे जाने वाले बुजुर्ग जोखू सिंह याद रखते हैं। वे भी क्या दिन थे जब सबके लिए नदी का तट किसी तीर्थ से कम नहीं था। अब तो गांव के सभी लोग इसकी दिक्कतों का ही पहाड़ा पढ़ते हैं। गांव में अनुसूचित जाति, सैंथवार, गुप्ता, मुसलमान, यादव और मौर्य जाति के लोग हैं और कमोवेश सभी एक दूसरे से सामंजस्य बनाये हैं। सिलाई करने वाले गुल हसन की दुकान पर सब लोग जुटते हैं। आमी के आंदोलन की चर्चा से कुछ लोगों को उम्मीद जगती है। इस बार कुछ न कुछ होकर रहेगा। जोगियाकोल कुआवल, शीतलपार, कोइरीकला, टड़वामाफी, धुसियापार, खीरीडाड़ जैसे कई गांवों का चौराहा है। लोग यहां आकर आंदोलन की गति तेज करने की बात करते हैं। गांव के किसी भी आदमी से आमी की समस्या पर बात करिये तो चेहरा गुस्से से तन जाता है। ईट भट्टे पर मजूरी करने वाला ललई हो या रिक्शा चलाने वाला बिन्दू, सब दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करके रोटी तो जुटा लेते हैं लेकिन इनके मन में कसक रह जाती है। आमी पहले जैसी होती तो इनके लिए रोटी की दुश्वारी नहीं होती। नदी के आंचल से जाकर सभी सुख मिल जाते। अब तो हाड़तोड़ मेहनत करके आने के बाद बदबू का झोंका चैन से सोने भी नहीं देता है। इस गांव से चलते समय द्विजेन्द्र द्विज की पंक्तियां याद आती हैं- अभागे लोग हैं कितने इसी सम्पन्न बस्ती में, अभावों के जिन्हें हर पल भयानक सांप डंसते हैं। तुम्हारे ख्वाब की जन्नत में मंदिर और मस्जिद है, हमारे ख्वाब में द्विज सिर्फ रोटी-दाल बसते हैं। ये फसले पक भी जायेंगी तो देंगी क्या भला जग को, बिना मौसम ही जिनपे रात दिन ओले बरसते हैं।

जो लफ्ज गूंजे दास्ताँ नही बन पाये


आनन्द राय, गोरखपुर

परिषदीय विद्यालयों में सुधार के लिए इतने प्रयोग हुये कि पूछिये मत। सरकार की नीति अच्छी थी मगर उसके नियंताओं की नीयत साफ नहीं थी। उद्देश्य जितना पाक था उसके अनुपालन में उतनी ही बदनीयती भरी रही। लम्बी-चौड़ी गाइड लाइन तैयार कर प्राइमरी स्कूलों के बच्चों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए जो लफ्ज गूंजे वे दास्तां नहीं बन पाये। परिषदीय विद्यालयों के बच्चों का मूल्यांकन करने के लिए शासन द्वारा सत्र परीक्षा, विद्यालयों का श्रेणीकरण और निरीक्षण का फरमान जारी हुआ। सचिव बेसिक शिक्षा राज प्रताप सिंह ने सभी डायट प्राचार्यो और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों को दो टूक हिदायत दी कि विद्यालयों के भौतिक एवं अकादमिक पर्यवेक्षण हेतु छात्र-छात्राओं की सम्प्राप्ति पर आधारित समेकित प्रणाली विकसित करते हुये विद्यालयों का श्रेणीकरण किया जाय। 2006 में बनायी गयी इस व्यवस्था को अमली जामा पहनाने के लिए गाइड लाइन दी गयी कि छमाही और सालाना परीक्षा के अतिरिक्त सितम्बर और फरवरी माह में सत्र परीक्षा आयोजित हो। हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, विज्ञान, गणित और सामाजिक विज्ञान विषय में ही परीक्षा आयोजित करने का निर्देश हुआ। इन दोनों सत्र परीक्षाओं में प्राप्त अंकों को मुख्य परीक्षा के अंकों में जोड़ने का भी निर्देश जारी हुआ। यकीन जानिये कि गोरखपुर-बस्ती मण्डल के कुल 14631 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बीस फीसदी विद्यालयों ने भले ही रजिस्टर बनाकर इस योजना की खानापूर्ति कर ली हो लेकिन बड़ी संख्या में स्कूलों ने इस फरमान को ठेंगे पर रखा। उद्देश्य तो यह था कि इस परीक्षा के जरिये विद्यार्थियों के अधिगम स्तर को जाना जाय और कमजोर छात्रों को चिन्हित करके उनके लिए बेहतर दिशा तय की जाय लेकिन सब कुछ कागजों तक ही रहा। इसके लिए जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, प्रधानाध्यापक, एन। पी. आर. सी., बी.आर.सी. ए.बी.एस.ए. और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के साथ ही मण्डलीय सहायक निदेशक बेसिक शिक्षा की जवाबदेही तय की गयी लेकिन सभी अपने कर्तव्य के प्रति उदास रहे। न ही किसी ने सुधि ली और न ही इसकी मानीटरिंग हो सकी। प्राइमरी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब घरों के बच्चे तो वैसे भी अक्षरों से जुड़ने की बजाय रोटी के चक्कर में ही स्कूल जाते हैं। इन्हीं बच्चों में कुछ बहुत मेधावी भी होते हैं। इन्हें तराशने की जरूरत होती लेकिन साहबों की उसमें रूचि नहीं रहती। इन्हीं की उम्र के जो बच्चे अंग्रेजीदा स्कूलों में पढ़ते वे लम्बी क्लास करने के बाद टयूशन भी लेते हैं। इस पर दो दर्जन से अधिक शिक्षकों से बातचीत की। सबने कहा कि पिछले साल तो कुछ रजिस्टर बने थे और टेस्ट लिया गया था लेकिन इस बार तो चुनावी ड्यूटी ने सारा उत्साह मार दिया। वजह कोई हो लेकिन स्कूलों में इन आदेशों पर अमल नहीं हुआ। एडी बेसिक से बातचीत की कोशिश की लेकिन सम्पर्क नहीं हो सका। एक सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी से सम्पर्क हुआ। छूटते ही उन्होंने सवाल कर दिया कैसी सत्र परीक्षा? फिर 26फरवरी से अपने हड़ताल का हवाला दिया और कहा-परीक्षा जरूर हुई होगी। बहुत ही अटपटा लगा। सरकारी फरमानों पर वसीम बरेलवी ने सही लिखा है- लहू न हो तो कलम तर्जुमा नहीं होता, हमारे दौर में आंसू जुबां नहीं होता। वसीम सदियों की आंखों से देखिए मुझको, वो लफ्ज हूं जो कभी दास्तां नहीं होता।


25/04/2009

'पढ़ने वाले बाबू' की जगह बन गए मजूर

आनंद राय , गोरखपुर
खोराबार में मुंहबोले चाचा के साथ साइकिल की दुकान पर पंचर बनाने वाले नौ साल के अमरनाथ के कदम किसी स्कूल में नहीं रुक पाये। कई बार नाम लिखाया लेकिन पेट की आग ने उसे 'पढ़ने वाले बाबू' की जगह मजूर बना दिया। उसके जैसे न जाने कितने बच्चे हैं जो स्कूल जाने की उमर में अपने कंधे पर किताबों का बस्ता नहीं, बल्कि जिंदगी का बोझ उठा रहे हैं। स्कूल जाने से वंचित ऐसे बच्चों के लिए सरकार एक बार फिर जागी है। अबकी स्कूलों में बच्चों के ठहराव पर जोर दिया गया है और इसके लिए लोगों की जवाबदेही तय की गयी है।
सर्व शिक्षा अभियान की राज्य परियोजना निदेशक वीना की एक चिट्ठी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के नाम आयी है। इस चिट्ठी का मजमून आउट आफ स्कूल बच्चों को चिन्हित कर स्कूलों में उनका ठहराव सुनिश्चित करना है। पिछले कई साल से इस तरह की सरकारी चिट्ठियां आ रही हैं। यथार्थ की कसौटी पर जांचें तो उन पर कुछ खास अमल नहीं होता। वैसे भी बेसिक शिक्षा परिषद से संचालित स्कूलों की हकीकत आंकड़ों के बोझ से दब गयी है। उन स्कूलों में व्यवस्था दम तोड़ रही है और वहां पढ़ाई का माहौल नहीं रह गया है। बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं और फिर किसी चाय की दुकान, किसी ठेले खोमचे या किसी होटल में उनकी तकदीर सिमट जाती है।
सर्व शिक्षा अभियान की राज्य परियोजना निदेशक वीना ने साफ साफ पूछा है कि सामुदायिक सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए बनाये गये अभिभावक-अध्यापक एसोसिएशन की बैठकें प्रतिमाह सुनिश्चित की गयी है किन्तु इन बैठकों की सूचना परियोजना कार्यालय को नहीं दी जाती। सच तो यही है कि अधिकांश स्कूलों में इस एसोसिएशन का गठन ही नहीं हुआ है।
बहरहाल परियोजना निदेशक ने इस बार सख्त चेतावनी दी है कि हर माह की तीन तारीख को अभिभावक-अध्यापक एसोसिएशन की बैठक की जाय। अब इन बैठकों में एसडीआई उपस्थित रहेंगे। हर माह की छह तारीख को हर विद्यालय की बैठक की सूचना एसडीआई एकत्र करेंगे। बैठक की समीक्षा रिपोर्ट बीएसए को उपलब्ध कराने की भी व्यवस्था की गयी है। श्रीमती वीना ने साफ कहा है कि जिन बच्चों का कहीं नामांकन नहीं है और वे स्कूल नहीं जा रहे तो उनके अभिभावकों को बुलाकर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया जाय। बेसिक शिक्षा अधिकारी इस स्थिति से जिलाधिकारी को अवगत करायेंगे। ध्यान रहे कि अब आउट आफ स्कूल बच्चों का डाटा जिले की वेब साइट पर रखा जायेगा। इस संदर्भ में मण्डलीय सहायक शिक्षा निदेशक मृदुला आनन्द ने कहा है कि परियोजना के निर्देशों को अक्षरश: पालन कराया जायेगा और इस बार सख्ती बरती जायेगी ।

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध


आनन्द राय, गोरखपुर

संतकबीरनगर की पहचान खरी-खरी सुनाने वाले कबीर की वजह से है। बस्ती को आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डुमरियागंज (सिद्धार्थनगर) को गौतम बुद्ध के चलते भारतीय मानचित्र पर विशेष स्थान मिला है। बस्ती मण्डल की इन तीनों संसदीय सीटों पर गुरुवार को मतदान सम्पन्न हो गया। लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व में लोक सक्रिय नहीं हो पाया। आधे से अधिक लोग अपने अपने घरों में बैठे रह गये। तटस्थ भाव में। बिल्कुल यह सोचकर कोउ नृप होई हमें का हानि..। यकीनन इस बार मतदान के लिए बुद्धिजीवियों ने खुलकर अपील की। मतदाताओं को खूब उत्साहित किया गया। अभियान दर अभियान चले लेकिन कोई कारगर नतीजा नहीं निकला। अभी पिछले गुरुवार को गोरखपुर मण्डल की पांच सीटों पर हुये मतदान में भी पचास फीसदी से कम मत पड़े। इन दोनों मण्डलों में आधे से अधिक मतदाता मतदान के प्रति उदासीन रहे। इसकी पड़ताल की कोशिश हुई तो कई तरह की बातें सामने आयी। सतही तौर पर लोगों ने मौसम और खेती-किसानी को वजह बताया। पर जब उनसे यह तर्क हुआ कि गोरखपुर जैसे महानगर में महज 33 फीसदी ही वोट पड़े तो फिर कुछ दूसरी तरह के भी तथ्य उभरे। यहां एक सहायक अभियंता हैं जिनका गांव संतकबीरनगर जिले में है। वे अपने गांव की राजनीति में रुचि रखते हैं। बुधवार की शाम को उन्होंने परिवार समेत गांव जाकर मतदान करने का मन बनाया लेकिन गुरुवार को पूरे दिन गोरखपुर में अपने घर पड़े रहे। हमने पूछा कि वोट देने क्यों नहीं गये? तो शुरू में उन्होंने तेज धूप को ही कारण बताया लेकिन थोड़ा कुरेदने पर बोले- असल में दो प्रत्याशी मेरे बहुत करीबी हैं और मेरे वोट न देने से किसी के नाराज होने का खतरा नहीं रहेगा। यह तकनीक अकेले एक आदमी की नहीं है, ऐसे बहुत से लोग हैं जो तटस्थ भाव में हैं। उनकी नजर में मतदान से ज्यादा महत्वपूर्ण अपने व्यक्तिगत समीकरण हैं। शायद ऐसी ही स्थितियों के लिए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा- समर शेष है, जनगंगा को खुलकर लहराने दो, शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो, पथरीली ऊंची जमीन है? तो उसको तोड़ेंगे, समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे, समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल ब्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध। भारत भारती से सम्मानित सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. परमानन्द श्रीवास्तव कहते हैं कि बच्चे और विचारक लगातार अपील कर रहे हैं लेकिन मध्य वर्ग और सामान्य वर्ग को वोट की चिंता नहीं है। इसकी वजह पूछने पर वे दो टूक कहते- बुद्धिजीवी आत्म केन्दि्रत हो गया है और उन्हें समाज नहीं दिख रहा है। मतदान को निजी तौर पर वे लोग अपने हित से नहीं जोड़ पा रहे हैं। मतदान कितना नेक पर्व है। इसका उदाहरण पिछले गुरुवार को गोरखपुर में 79 साल के सुप्रसिद्ध राजनीति शास्त्री और सक्रिय आंदोलनकारी प्रो. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी ने दिया। प्रो. त्रिपाठी वाकर से चलकर वोट देने गये और गर्मी की वजह से तीन दिन बीमार रहे। उनकी चिंता है कि यही हाल रहा तो लोकतंत्र हाईजैक हो जायेगा लेकिन उन्हें यह उम्मीद है कि इग्लैंड में लोकतंत्र को पटरी पर आने में सैकड़ों साल लग गये तो देर-सवेर यहां भी हालत सुधर जायेगी। प्रो. रामकृष्ण मणि नागरिकों में उपेक्षा के भाव को मतदान के प्रति उदासी की खास वजह बताते हैं। दूसरे सत्ता के लिए राजनीतिक दलों की गणित और उनकी निरर्थक भूमिका भी एक कारण है। उनकी नजर में एक तीसरी वजह यह भी है कि अब राजनीतिक दलों की सारी गणित जाति और संप्रदाय के बीच सिमट गयी है। पर गोरखपुर विश्र्वविद्यालय के समाजशास्त्री डा. मानवेन्द्र प्रताप सिंह कहते हैं कि- अभी तक मतदाताओं में जाति और धर्म के आधार पर कट्टरपंथी रवैया था लेकिन इस बार यह धारणा खत्म हुई है। इस वजह से भी मतदान के प्रति लोगों में उदासी आयी है।

खिसक गए सपा के कई पाये

आनंद राय, गोरखपुर
चुनावी संतुलन बनाने में सपा को कहीं नफा तो कहीं नुकसान उठाना पड़ा है। इसमें सबसे बड़ी वजह टिकट का बंटवारा था। नेताओं के भविष्य की गारण्टी का सवाल भी कुछ हद तक कारण बना। इन्हीं दो बिन्दुओं पर टिकी महत्वाकांक्षा ने सपा के कई पाये खिसका दिये। पार्टी में रहकर भी कई लोग असंतुष्ट ही दिखे। मतदान खत्म होने के बाद कइयों की त्यौरियां चढ़ी हैं। यूं तो सपा ने कई उतार चढ़ाव देखे लेकिन इस बार के चुनाव में कुछ ऐसे लोगों ने भी पार्टी को अलविदा कहा जिनके नाम से पार्टी का चेहरा उभरता था। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के लिए 22 साल से झण्डा-डण्डा उठा रहे जफर अमीन डक्कू को यह चुनाव रास नहीं आया। इसकी कई वजहें थी। पर उन्होंने मुलायम और कल्याण की दोस्ती को मुद्दा बनाकर पार्टी से रिश्ता तोड़ लिया। 22 साल तक डक्कू जिस डोर से बंधे रहे उसे तोड़ने की टीस तो उन्हें हुई लेकिन मुसलमानों की उपेक्षा का सवाल उठाकर उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं को कटघरे में खड़ा कर दिया। उनके पहले टिकट न मिलने से नाराज पूर्व मंत्री रामभुआल निषाद सपा छोड़ बसपा में चले गये। श्री निषाद ने सपा को लगातार निशाने पर रखा। उन्होंने तो यह भी कहा कि भले ही वह सपा सरकार में साढ़े तीन साल मंत्री रहे लेकिन उनका दम घुटता रहा। उन्हें मनोज तिवारी मृदुल को टिकट दिये जाने का मलाल था। टिकट की ही वजह से पूर्व विधायक कमलेश पासवान ने भी सपा छोड़ी। वैसे तो शुरूआत में मुलायम सिंह यादव ने कमलेश के नाम की घोषणा कर दी। पर जब यह बात चली कि सपा और कांग्रेस में समझौता होगा तो पासवान को लगा कि समझौते में सिटिंग सांसद और बडे़ कद के नाते निश्चित ही महावीर प्रसाद होंगे। सो वे भी भाजपा में शामिल हो गए। में अपना निशाना साधा और तीर सही जगह जाकर बैठ गया। उनकी मां बांसगांव की पूर्व सांसद सुभावती पासवान ने सपा छोड़ने का एलान तो नहीं किया लेकिन अपने बेटे को चुनाव जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। यही हाल सलेमपुर में भी हुआ। सपा के पूर्व सांसद हरिवंश की जिद थी कि सिटिंग एमपी हरिकेवल प्रसाद की जगह उनको टिकट दिया जाय। उनके समर्थकों की माने तो नेताजी ने आश्र्वासन भी दिया था। लेकिन आखिरी क्षण में उन्हें टिकट की सूची से बाहर कर दिया गया। नाराज सहाय ने बसपा का दामन थाम लिया और वे वर्षो जिस पार्टी में रहे उसके खिलाफ खूब गरजे-बरसे। पड़रौना के सांसद बालेश्र्वर यादव की नजर तो परिसीमन के बाद से ही देवरिया पर टिकी थी। उनकी इच्छा थी कि नेताजी सिटिंग एमपी मोहन सिंह का जगह उनको टिकट दें। पिछली बार महराजगंज से सपा छोड़कर राजद के साथ कुछ समय तक रहने वाले पूर्व सांसद कंुवर अखिलेश सिंह ने बाद में सपा के साथ निभाने की बात कही लेकिन चुनाव के दौरान पता नहीं क्या हुआ कि उन्होंने रहस्यमय चुप्पी ओढ़ ली। बाद में पता चला कि सपा से तो वे बेहद नाराज थे और उनका झुकाव कहीं और था। पिछली बार सपा के टिकट पर पनियरा विधानसभा से चुनाव लड़ने वाले सेठ बद्री प्रसाद जायसवाल की ओर देखें तो वे और उनके पुत्र पूर्व मंत्री जितेन्द्र जायसवाल उर्फ पप्पू भैया भी इस बार बसपा में शामिल हो गये। बद्री प्रसाद तो हमेशा दलीय राजनीति करते रहे लेकिन निर्दल विधायक होने वाले पप्पू भैया ने एक ही हार के बाद दल का बैनर लगाना जरूरी समझा और बसपा का दामन थाम लिया। गोरखपुर से मेयर का चुनाव लड़ने वाले सीताराम जायसवाल भी चुनाव के दौरान सपा में महत्व न मिलने से योगी की शरण में चले गये।

सूरज ढलने के बाद सुकून छीन लेती आमी

आनंद राय , गोरखपुर :
कस्बाई और गंवई संस्कृति से मिला जुला हरपुर गांव विकास की दौड़ में शामिल है। इस गांव के लोगों को रोजी रोटी का संकट नहीं है। पर औद्योगिक इकाइयों के अपजल से प्रदूषित आमी नदी सूरज ढलने के बाद लोगों का सुकून छीन लेती है। यहां के लोग आमी के प्रदूषण के खिलाफ आर पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। गोरखपुर से हरपुर की दूरी तीस-बत्तीस किलोमीटर है। दस साल तक यहां की प्रधान रहीं लीलावती देवी के पुत्र मदन मुरारी गुप्ता अब यहां के प्रधान हैं। आमी को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए अपने गांव के हर घर से लोगों को जोड़ रहे हैं। उन्हें इस बात पर गर्व है कि उनके गांव के रामकृष्ण शुक्ल बहुत समय तक सहजनवा के ब्लाक प्रमुख रहे और पूरे जवार में उनके नाम का सिक्का चलता था। अब वे नहीं हैं लेकिन उनके तेवर की चर्चा पूरे गांव में है। मदन मुरारी गुप्ता आमी की मुक्ति के लिए उसी तरह का तेवर गांव के हर सदस्य में लाना चाहते हैं। दो हजार की आबादी वाले इस गांव में अनुसूचित जाति, ब्राह्मण, मुस्लिम, कंहार, कोंहार, यादव, कचेर समेत कई जातियां निवास करती हैं। हरपुर गांव से नदी लगभग 800 मीटर दूर है। इस गांव को शंकर की नगरी कहा जाता है। आमी नदी के प्रदूषित होने से गांव पर असर पड़ा है। नदी तट पर किसान अपनी गाय भैंस चराते थे। आमी का पानी जहरीला हुआ और पशु उससे दूर होने लगे तो फिर नदी तट से गांव के लोगों की दूरी बन गयी। लोग बाग उधर जाना बंद कर दिये। अब तो सूरज ढलने के साथ ही बदबू बढ़ जाती है। बदबू भी ऐसी कि बर्दाश्त करना मुश्किल। इन दिनों मच्छर बढ़ रहे हैं। मच्छरों ने लोगों का सुख चैन छीन लिया है। इससे बीमारी भी बढ़ रही है। गांव के 85 वर्षीय शिवसम्पत शुक्ल, 88 साल के अछैवर दास और महातम शुक्ल कहते हैं कि पहले तो यहां का पानी अमृत जैसा था और शाम को नदी तट पर पहंुचते ही मन आह्लादित हो जाता था। शिवसम्पत कृषि, अछैवर दास और महातम शुक्ल रेलवे में काम करते थे। नौकरी के दिनों में वे लोग घर लौटते तो नदी में घण्टों तैरते थे। अब तो यह उनके लिए सपने जैसा है। उनकी पीढि़यां इस सुख से वंचित हैं। हरपुर चौराहे पर बहुत सी नयी चीजें आ गयी हैं लेकिन यहां की सबसे बड़ी पहचान गायब हो गयी है। हरपुर में आमदनी की किल्लत नहीं है। सुविधाएं भी हैं लेकिन दुख सिर्फ आमी के प्रदूषण का है।

अनंतपुर गांव के हर पुरवे में आमी की यादों का झोंका

आनंद राय, गोरखपुर :
अनंतपुर गांव के हर पुरवे में आमी की यादों का झोंका है। मगर प्रदूषण की मार से आमी से बंधे रिश्ते की डोर टूट गयी है। आमी से बिछुड़ जाने की टीस हर चेहरे पर दिखती है। इस गांव में दस-ग्यारह साल के बच्चे आमी की ओर वितृष्णा से देखते हैं लेकिन बुजुर्गो के लिए तो आमी की व्यथा उनकी अपनी व्यथा की तरह है। आमी पर सबकी आंखें डबडबा जाती हैं। सिद्धार्थनगर के सोहनारा से निकली और गोरखपुर के सोहगौरा में राप्ती नदी में विलीन हो गयी लगभग 80 किलोमीटर लम्बी आमी नदी औद्योगिक इकाइयों के अपजल से जहरीली हो गयी है। लगभग दो दशकों से यह नदी तिल तिल कर मर रही है। इस नदी का दर्द बुजुर्गो के बीच जाने पर ही पता चलता है। गोरखपुर से अनंतपुर की दूरी लगभग तीस किलोमीटर है। इसी गांव में आमी नदी पर बना कुआवल पुल भी है। जिगिना, सिसवा, दरघाट और अनंतपुर को मिलाकर 4500 की आबादी वाले इस ग्राम सभा में अब परदेस की महक है। बहुतेरे घरों के जवान लुधियाना, मुम्बई और अन्य बड़े शहरों में अपना जिस्म तपा रहे हैं। गांव के प्रधान सुभाष चंद निषाद भी लुधियाना में कौडि़यों के भाव अपना श्रम बेचकर लौट आये हैं और अब गांव की सेवा में लगे हैं। पर मुन्दि्रका निषाद, उमाकांत निषाद, रामकरन, दुर्गविजय यादव जैसे जवान तो अभी भी अपने घर परिवार की रोटी के लिए लुधियाना में ही जूझ रहे हैं। आमी के प्रदूषण से गांव वालों का रोजगार छिन गया है। मल्लाह, यादव, पासी और दलित बहुल इस ग्राम सभा के 80 फीसदी लोग कभी आमी पर ही आश्रित थे। अब उनका आश्रयदाता बीमार है इसलिए उन सबकी सेहत पर असर पड़ा है और वे पलायन को मजबूर हो गये हैं। गांव में पलायन की सबसे बड़ी छाया सौ साल के होलरी निषाद के घर दिखती है। अपने बाजुओं के भरोसे अकेले होलरी ने एक बड़े परिवार की रोटी आमी की गोंद से निकाली। पर अब उनका भी परिवार लुधियाना की राह पकड़ चुका है। होलरी चलते फिरते हैं और उन्हें कोई आर्थिक संकट नहीं है लेकिन आमी नदी की बीमारी उनके लिए सबसे बड़े दुख का कारण है। उनकी भावनाओं को समझने के बाद जगजीत की गायी एक गजल बरबस याद आती है- दुनिया जिसे कहते हैं, बच्चों का खिलौना है। मिल जाये तो मिट्टी है, खो जाये तो सोना है। होलरी को साफ लगता है कि अपने जमाने में जिसे वे खिलौना समझते थे अब वही सोना हो गयी है। सब लोग तलाश रहे हैं। उसे पाने के लिए आमी बचाओ मंच आंदोलन कर रहा है। महायात्रा निकाली जा रही है लेकिन उसका पता नहीं चल रहा है। शासन-प्रशासन चुप है। सौ साल के होलरी अपनी कातर निगाहों से कभी दूषित हो गयी आमी को देखते और कभी अपने 11 साल के उस प्रपौत्र को, जो उनकी चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधि होकर भी आमी से दूर है। होलरी को अपने पक्के घर में भी सुकून नहीं है। होलरी की तरह ही जिगिना के 90 साल के शिवलाल हैं। उनकी भी चौथी पीढ़ी खड़ी है मगर आमी से उसका कोई रिश्ता नहीं बन पाया है। आमी के तट पर वे सब जाते तो नाक पर हाथ लगा लेते हैं। ग्राम प्रधान सुभाष चंद निषाद कहते हैं- हम सब आमी के प्रदूषण से तबाह हो गये हैं। हमारे यहां का हुनर मर गया है। रोजगार खत्म है। वे अपने गांव के राममूरत और रामदुलारे की बात करना नहीं भूलते। ये दोनों नदी में 40 मिनट तक डूबे रह सकते हैं। पर यह हुनर औरों को नहीं मालूम। बाढ़ के दिनों में जब लोग डूबते हैं तो इन दोनों का हुनर जान बचाने के काम आता है। आमी उस लायक नहीं रही कि कोई इतने समय तक डूब कर रियाज बना सके।

घर पर रख दी नाव


आनंद राय , गोरखपुर :

धनईपुर गांव आमी नदी के किनारे बसा है। गांव से नदी तट लगभग एक किलोमीटर दूर है। दो दशक पहले तक गांव के बच्चे, बड़े और बूढ़े इस नदी से पूरी तरह जुड़े थे। औद्योगिक इकाइयों के अपजल से नदी जहरीली हुई तो सब इससे दूर होते गये। जो आमी में नाव चलाकर लोगों को पार उतारते थे उनकी नाव अब घर पर बंधी है। और वे लोग मुम्बई और सूरत में अपने लिए रोटी तलाश रहे हैं। गोरखपुर से धनईपुर की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। भटवली से बमुश्किल दो किलोमीटर दूरी पर नदी तट है। इस गांव की आबादी 1600 है और यहां निषादों की बहुलता है। 80 फीसदी निषादों के इस गांव में यादव और राजपूतों के अलावा कुछ छिटपुट जातियों के लोग भी बसे हैं। गांव में सन्नाटा है। आमी नदी से बिछुड़ जाने की टीस है। रोजी रोटी और सुख शांति छिन जाने का दर्द है। सुदर्शन और सुदामा निषाद के घर पर बंधी नाव को देखकर लगता है कि नदी से इनका रिश्ता टूट गया है। बाढ़ के दिनों में भले कभी यह नाव उठकर नदी तक पहंुच जाये लेकिन बाकी दिनों में इसकी तन्हाई साफ पढ़ी जा सकती है। पहले यही नाव लोगों को उस पार भेजती थी। धनईपुर के सामने नदी के दूसरे छोर पर बरवलमाफी गांव है। उस पार भी गांव के लोगों की खेती बारी थी। आमी नदी धनईपुर के लोगों की रोजी रोटी से जुड़ी रही है लेकिन जबसे यह नदी प्रदूषित हुई तबसे यहां की कहानी बदल गयी है। पहले गांव के कुछ लोग नदी तट पर ही छप्पर डालकर रहते थे। उनमें अब बहुत से लोग अपने घर पर रहते हैं और उनका समय काटे नहीं कटता। 75 साल के मंगली निषाद, रामसेवक और बूने अपने पुराने दिनों की याद करते तो उनका दर्द उभर जाता है। नदी तट पर रहते हुये कब उनका दिन बीत जाता पता ही नहीं चलता था। भटवली महाविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष अरुण कुमार सिंह धनईपुर के ही रहने वाले हैं और आमी बचाओ आंदोलन से जुड़े हैं। अरुण बताते हैं कि आमी के प्रदूषण से पूरे गांव का सुख चैन छिन गया है। इसलिए गांव के बच्चे बूढ़ों से लेकर महिलाएं भी निर्णायक संघर्ष का मन बना चुकी हैं। धनईपुर गांव के प्रधान रामाज्ञा यादव भी आमी के प्रदूषण से आक्रोशित हैं। इस समस्या से गांव की सूरत बदल गयी है। पूरे गांव में आक्रोश है। लोग मुम्बई, बंगलौर और सूरत में कमाने चले गये हैं। ज्यादातर निषाद मुम्बई और सूरत की गलियों में अपना श्रम बेच रहे हैं। गांव में 18 साल के ऊपर के नौजवानों को खोजना मुश्किल है। गांव के मल्लाहों को इस बात का मलाल है कि नदी के प्रदूषित होने से उन्हें परदेस जाना पड़ रहा है। बताते हैं कि जिन दिनों नदी साफ सुथरी थी उन दिनों एक व्यक्ति दस से पन्द्रह किलोग्राम मछली पकड़ता था और उनके इस कारोबार से रोजी रोटी अच्छे तरीके से चल जाती थी। अब तो खेतों की उपज पर भी असर पड़ा है और इसीलिए गांव में दुश्र्वारियां बढ़ गयी हैं।

आमी के प्रदूषण से टूटने लगी है डोर


आनंद राय, गोरखपुर

औद्योगिक इकाइयों के अपजल से आमी नदी प्रदूषित हुई तो तटवर्ती गांवों की सूरत बदल गयी। गरीबी व बदहाली भी बढ़ी पर इसी नदी के तट पर बसे गांव रामपुर गरथौली के विकास की रफ्तार नहीं थमी। दुनिया की दौड़ में गांव ने आगे निकलने की भरपूर कोशिश की। यहां सब कुछ बेहतर हुआ पर आमी के प्रदूषण की टीस हर चेहरे पर चस्पा हो गयी। इस गांव से अपने लोगों की ही डोर टूटने लगी है जिससे संस्कार भी छूट रहे हैं।
सिद्धार्थनगर जनपद के सोहनारा से निकली आमी नदी गोरखपुर जिले के सोहगौरा में मिल जाती है। पिछले दो दशकों में औद्योगिक इकाइयों के अपजल से नदी प्रदूषित हुई तो तट पर बसे लोगों का सुखचैन छिन गया। रामपुर गरथौली भी आमी के तट पर ही बसा है। यह गांव गोरखपुर से 27 किमी दूर है। कुआवल पुल से कटघर जाने वाली सड़क पर स्थित इस गांव की आबादी दो हजार के आसपास है। 1995 में अंबेडकर गांवों की सूची में इसे शामिल किया गया लिहाजा यहां चमक-दमक खूब दिखती है। इस राजस्व ग्राम के रामपुर गरथौली और लरबरी दो पुरवा हैं। रामपुर गरथौली में सीसी रोड और लरबरी में खड़ंजा है। रामपुर गरथौली में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं जबकि लरबरी में भी एक नया प्राथमिक विद्यालय बना है। इन विद्यालयों में लगभग साढ़े सात सौ बच्चों का नामांकन भी है। गांव की आबादी के हिसाब से इतने बच्चों की संख्या समझ से परे है।
रामपुर गरथौली में सैंथवार, कोइरी, गुप्ता, यादव और अनु.जाति के लोग हैं। अनु.जाति की आबादी 72 प्रतिशत है इसी वर्ग की जोखना देवी तीसरी बार ग्राम प्रधान बनी हैं। यहां से क्षेत्र पंचायत सदस्य डा. रामसहाय सिंह गांव के सक्रिय लोगों में एक हैं और आमी को प्रदूषणमुक्त करने की लड़ाई में लगे हैं। गांव की सम्पन्नता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता कि विभिन्न प्राथमिक विद्यालयों में यहां के दर्जन भर शिक्षक हैं, बीस से अधिक लोग सिपाही हैं, फोर्स में भी पांच-छह लोग हैं, तीन एसडीओ हैं। दिल्ली में रहकर इसी गांव के दो युवक आईएएस की तैयारी कर रहे हैं और प्री परीक्षा भी पास कर चुके हैं। सैंथवारों की खेती बारी ठीक है। पशुपालन और दूध के कारोबार से बहुतों की गृहस्थी चलती थी। अब उन घरों में सरकारी नौकरी का पैसा भी है। इस सबके बावजूद दिक्कतें भी कई हैं। अब तो न ही आमी की लहरों से कोई बच्चा अठखेलियां करता है और न ही पशु वहां पहुंचते हैं। अब तो ग्रामीण इसमें पैर भी नहीं डालते। बताते हैं कि नदी में पैर पड़ते ही फफोले पड़ जाते हैं। नदी में मछलियां भी नहीं हैं।
नदी में प्रदूषण के कारण बदबू व मच्छरों की फौज और इस तरह की कई पीड़ा लोगों के दिलों में घाव कर चुकी है। डा. रामसहाय सिंह बताते हैं कि नदी में प्रदूषण के कारण लोगों को मजबूरी में अंतिम संस्कार के लिए अयोध्या, बड़हलगंज और गोला तक जाना पड़ता है। मन को पीड़ा से भर देने वाली परिस्थिति के चलते ही लोग गांव से दूर होने लगे हैं। नयी पीढ़ी की तो बात ही कुछ और है। 18 वर्ष के जयप्रकाश और 22 वर्ष के सुभाष जल्दी नौकरी पाना चाहते हैं ताकि गांव की दिक्कतों से पीछा तो छूटे।

21/04/2009

अव्यवस्था से उपजी ऊब

आनंद राय, गोरखपुर
लोकतंत्र के उत्सव को सजाने संवारने की इस बार खूब कोशिश हुई लेकिन कारगर साबित नहीं हुई। कहीं निजी जरूरतें भारी पड़ीं तो कहीं अव्यवस्था से उपजी ऊब। जिनके दम से जम्हूरियत जिंदा है वही उदास दिखे। अपनी बेचैनी और ऊब छिपाते हुए कुछ बूथ तक पहुंचे भी मगर दूसरों के लिए प्रेरणा का सबब नहीं बन सके। पंद्रहवीं लोकसभा के गठन की रस्मअदाएगी पूरी हो गई।
बैसाख की तपती दोपहरी में वोट की फसल उगाने की खूब कोशिश हुई। उड़न खटोले से उड़कर आए रहनुमाओं ने बड़ा जोर दिया, लेकिन वोट प्रतिशत देखें तो आधे से अधिक लोग अपने घरों से नहीं निकले। सुबह मौसम अनुकूल रहने के बाद भी गति बहुत धीमी थी। निर्वाचन संपन्न कराने में लगे गीडा के मुख्य कार्यपालक अधिकारी पीके श्रीवास्तव से सुबह नौ बजे बातचीत की तो पता चला गोरखपुर जिले में सिर्फ सात फीसदी वोट पड़े थे। सड़क के किनारे मतदान केंद्रों पर जुटे कुछ लोगों को देखा लेकिन हर बार की तरह कतार नहीं दिखी। 11 बजे तक गोरखपुर जिले में सिर्फ 16.3 प्रतिशत वोट पड़े थे। प्राथमिक विद्यालय बिशुनपुर में भगवा रंग में रंगे रामदरश और रामसेवक मिले। वोट पड़ने की रफ्तार कम क्यों है यह पूछने पर उनका कहना था- कटिया दंवरी का मौसम है इसलिए लोग अपना काम निपटा रहे हैं। फिर भी वोट पड़ रहे हैं।
कौड़ीराम कस्बे में अधिकांश दुकानें खुली थी तो माहौल गुलजार था लेकिन बांसगांव पहुंचने पर सन्नाटे ने स्वागत किया। सन्नाटे को चीरते छह साल के दो छोटे बच्चे गलबहियां करते हुए अपने घर आ रहे थे। आदित्य और सत्यम नाम के ये बच्चे वोट का मेला देखने गए थे। लगा कि बड़ों से बेहतर तो यही बच्चे हैं। नगर क्षेत्र बांसगांव के ही प्राथमिक विद्यालय मरवटिया के बूथ का सन्नाटा लोकतंत्र के इस पर्व को मुंह चिढ़ा रहा था। पास के परिषदीय विद्यालय के शिक्षक संजय सिंह ने जब यह आशय समझा तो बोल पड़े- सुबह तो ठीक वोट पड़ा है। बगल की चाय की दुकान पर बैठे ड्राईवर लालू गौड़ समेत कई अन्य लोग हार जीत की गणित में मशगूल थे लेकिन उनकी आवाज में कोई सियासी ताप नहीं था। आगे बढ़ने पर सरहद बदल गई और बभनौली से संतकबीरनगर लोकसभा क्षेत्र के खजनी विधानसभा क्षेत्र की सीमा शुरू हो गई।
माल्हनपार की ओर जाने वाली सड़क पर कलकत्ता और कटिहार से आये मजूरे काम करते मिले। उन्हें इस पर्व का कोई मतलब ही नहीं मालूम। इनमें कक्षा पांच तक पढ़े दस साल के फर्रुख और उसी की उम्र के जबेरुद्दीन, कासिम, अंसार उल जैसे बच्चों के पेट की आग सियासी तापमान पर भारी थी। कुछ दूर के सफर के बाद फिर चुनावी क्षेत्र शुरू हो गया। यह इलाका पहले धुरियापार का था जो अब चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र में शामिल है। प्राथमिक विद्यालय देवापार में डेढ़ बजे तक सन्नाटा था। प्राथमिक विद्यालय गजपुर में वोट डालते लोग कोशिश में थे सभी लोग घर से निकल जाएं लेकिन बैसाख की आंच बहुतों की राह रोके थी। हरिलालपुरा का भी हाल कुछ ऐसा ही था। प्राथमिक विद्यालय कूड़ाभरत में तो दोपहर डेढ़ बजे तक 400 वोट पड़ चके थे। लेकिन गांव के बच्चन त्रिपाठी जैसे लोगों की चिंता यही थी कि अब वोट के प्रति लोग उत्साहित नहीं हैं। प्राथमिक विद्यालय देईडिहा में भी खामोशी ओढ़े मतदान कर्मी ऊंघ रहे थे। गोपालपुर आदि जगहों की भी स्थिति कुछ बेहतर नहीं थी। गोला जैसे कस्बे में 18 प्रतिशत वोट पड़ा था और यहां मैाजूद रणविजय चंद वोट कम पड़ने पर चिंता जता रहे थे। बड़हलगंज के उत्साही नौजवान गौरव दुबे खुद तो सक्रिय थे ही वे दूसरों को भी सूचनाएं दे रहे थे। प्राथमिक विद्यालय गाजेगड़हा में कुल 1167 वोटर हैं। पर 2.10 बजे तक यहां सिर्फ 340 वोट पड़े थे। उदासी का यह मंजर तो इसी से प्रमाणित होता है कि एक बजे तक बांसगांव में 22 प्रतिशत और गोरखपुर में 28 प्रतिशत वेाट पड़े थे। अलबत्ता शाम को मतदान में थोड़ी तेजी आई।
प्राथमिक विद्यालय सोनइचा में भुवनेश्वर दुबे ने टिप्पणी दी- इ चुनाव के मौसम थोड़े हवे, सब आपन फसल काटि कि वोट रखाई। मन के किसी कोने में कोई तल्खी थी जो कुरेदते ही जुबां पर आ गयी। रमेश ने भी खेती किसानी की बात चलाई। प्राथमिक विद्यालय नेवादा में सवा तीन बजे तक 35 प्रतिशत वोट मिले थे। मतदान संपन्न कराने आए अधिकारी दरकते हुए लोकतंत्र को गौर से देख रहे थे और इवीएम पर टिकी उनकी निगाहें उनकी पीड़ा बयां कर रही थी। गगहा से गोरखपुर तक हर पोलिंग स्टेशन की कहानी कुछ हेर फेर के साथ एक जैसी ही दिखी। शाम पांच बजे पीके श्रीवास्तव ने बताया कि गोरखपुर में 49 प्रतिशत और बांसगांव में 40.06 प्रतिशत मतदान हुआ है। कुछ लोगों से इसकी वजह जाननी चाही तो उनका यही कहना था कि बांसगांव में सभी प्रत्याशी एक ही वर्ग के हैं इसलिए यहां तो जातीय उत्साह भी नहीं बन पाया।

07/04/2009

राही मासूम और आज की राजनीति




आनंद राय, गोरखपुर


बात 1953 की है. राही मासूम रजा के पिता बशीर हुसैन साहब उन दिनों ग़ाज़ीपुर कचहरी के नामी वकील हुआ करते थे. वह भी जमीदार परिवार से आए वकील. तब ग़ाज़ीपुर में नगर पालिका का चुनाव हो रहा था. काँग्रेस ने बशीर साहब को अपना उम्मीदवार बनाया. उनके खिलाफ वामपंथियों ने आम आदमी के बीच से पब्बर राम को अपना उम्मीदवार बनाया. राही मासूम रजा और उनके भाई मुनीश रजा ने पब्बर राम का समर्थन किया. अपने पिता के खिलाफ पब्बर के साथ खड़े रहे और दिलचस्प यह कि पब्बर भाई चुनाव जीत गये. उसी ग़ाज़ीपुर जिले में चुनाव हो रहा है और वहां अंसारी परिवार चुनाव मैदान में डटा है. अफ्जाल अंसारी और मुख्तार अंसारी ग़ाज़ीपुर और वाराणसी सीट से चुनाव मैदान में हैं. पूरा खानदान जोर आजमाईश में लगा है. बगल में बलिया सीट पर नीरज शेखर अपने पिता चंद्रशेखर की विरासत के लिए जूझ रहे हैं. उसके बगल की सलेमपुर सीट पर उनके ही परिवार के रविशंकर भी मैदान में हैं. संतकबीर नगर में भाजपा अध्यक्ष रमापति राम अपने पुत्र शरद के लिए परेशान हैं. यहाँ पिछली बार सांसद रहे कुशल तिवारी के लिए उनके पिता और लोकतांत्रिक काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यकश हरिशंकर तिवारी ने भी अपनी ताकत लगायी है. बांसगांव में पूर्व सांसद सुभावती पासवान अपने पुत्र कमलेश पासवान के लिए जी जान से जुटी हैं. कुशीनगर में सपा के ब्रह्मा शंकर, बसपा के स्वामीनाथ और भाजपा के विजय डूबे के पुत्र उनका प्रचार कर रहे हैं. यहाँ काँग्रेस के आर पी एन सिंह अपने पिता की विरासत पाने के लिए जूझ रहे हैं. गोरखपुर में महंत अवेद्य नाथ अपने उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ के लिए चुनावी रणनीति बनाने में जूटे हैं।

बस्ती में प्रदेश के मंत्री रामप्रसाद चौधरी भी अपने भतीजे अरविंद चौधरी को संसद में भेजने की जुगत लगा रहे हैं. महराजगंज में अजीतमानी अपने भाई अमरमणि का खडाऊ लेकर चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसे माहौल में राही मासूम रजा का याद आना लाजिमी है. फैज़ की वह रचना बेहद मौजू हो जाती है. लाजिम है कि हम भी देखेंगे, हम देखेंगे हम देखेंगेजब ताज उछले जायेंगे और तख्त गिराये जायेंगे हम देंखेंगे हम देंखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगे................................................................................................

01/04/2009

सियासत का खेल और धर्म


जीवन में जो सक्रिय सत्ता है, जीवन को बदलने का जो सक्रिय आंदोलन है, जीवन को चलाने और निर्मित करने की जो व्यवस्था है, उस सबका नाम राजनीति है. राजनीति के भीतर अर्थ भी है, शिक्षा भी है. राजनीति के भीतर हमारे पारिवारिक सम्बन्ध भी हैं. लेकिन भारत का दुर्भाग्य समझा जाना चाहिये कि हजारों वर्षों से राजनीति और धर्म के बीच कोई सम्बन्ध नहीं रहा. भारत में राजनीति और धर्म दोनों जैसे विरोधी रहे हैं- एक दूसरे की तरफ़ पीठ किए खड़े हैं. भगवान रजनीश ने यह बात कहीं थी. और यह आज की ही बात नहीं है, हजारों वर्षों से ऐसा हुआ है और उसका परिणाम हमने भोगा है. एक हजार वर्ष की गुलामी उसका दुष्परिणाम है. अभी गोरखपुर शहर में भी धर्म और राजनीति को लेकर बहस हो रही है. कुछ लोग चुनाव में इसे बहस बनाते हैं और कुछ लोग ता जीवन इसी में लगे रहते हैं. देश की सबसे बड़ी पंचायत के लिए कुल 14 बार चुनाव हुए हैं. इसमे 7 बार गोरक्षपीठ के महंथ और उनके उत्तराधिकारी का कब्जा रहा है. गोरक्षपीठ देश में आस्था का एक बड़ा केंद्र है और जाहिर है राजनीति में इसका लाभ पीठ से जुड़े लोगों को मिलता है. इस पीठ के ब्रहमलीन महंथ दिग्विजय नाथ 1967 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गये. इसके पहले तीन चुनावों में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. अभी इस बार बहुजन समाज पार्टी ने विनय शंकर तिवारी को उम्मीदवार बनाया है. विनय इस बार विकास और सांप्रदायिकता के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं. विनय तर्क देते है कि सत्ता में बने रहने के लिए इन लोगों ने साम्प्रदायिकता का खेल खेला. अपने तर्क को बल देने के लिए वे अतीत की कुछ घटनाये गिनाते हैं. विनय का कहना है कि 1952, 1957 और 1962 का चुनाव महंथ जी हार गए. 1965 में गोरखपुर में पहला साम्प्रदायिक दंगा हुआ और इस दंगे को सुनियोजित रुप से कराया गया. महंथ जी चुनाव जीत गये. 1971 में उनके शिष्य और बाद के महंथ अवेद्यनाथ जी महाराज चुनाव मैदान में उतरे और कांग्रेस के नरसिंह नारायन पांडेय से चुनाव हार गये. फिर 1989 तक लोकसभा का चुनाव नहीं लडे. यह बात इसलिए ख़ास है क्योंकि विनय शंकर तिवारी का यह भी तर्क है कि शहर में सात बार दंगा फसाद और कर्फू लगा और सात बार उन लोगों को संसद में जाने का अवसर मिला. 1989, 1991 और 1996 में महंथ अवेद्यनाथ और 1998, 1999 और 2004 में योगी आदित्यनाथ को संसद में जाने का मौका मिला. योगी हिंदुत्व की रक्षा की दुहाई देते हैं. वे विनय शंकर तिवारी के खिलाफ आग उगलते हैं और इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदुत्व के विकास के साथ ही माफियाओ का दमन उनका लक्ष्य है. पर वे आजमगढ में माफिया समझे जाने वाले पूर्व सांसद रमाकांत यादव की सभा में जाते हैं. उन्हें शाबाशी देते है और उनके लिए वोट माँगते हैं. उनकी राजनीति के इस सियासी धर्म को रजनीश के नजरिये से देखे तो घालमेल साफ़ दिखता है. रमाकांत पर अपराध के इतनें आरोप हैं कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती. मेरी मंशा विनय शंकर तिवारी के पक्ष में कुछ कहने की नहीं है बल्कि उनके दिए गए तर्को के आधार पर यह जरूर कहना है कि नफरत की दीवार उठकर अगर संसद में जगह मिलती हो तो ऐसी जगह को लात मार देना चाहिये. कम से कम धार्मिक आस्था से जुड़े व्यक्ति के लिए सियासी सत्ता का कोई मतलब नहीं होता.

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