२६-११-२००९

बार बार सजग होने का पैगाम


आनन्द राय, गोरखपुर
आज २६ तारीख है. देश की छाती पर आतंकियों ने इसी तारीख को पिछले साल ऐसा जख्म दिया जिसके घाव अभी तक हरे हैं. यह एक ऐसी विडंबना है जिस पर न तो आंसू बहा सकते और न ही अपने गम को छुपा सकते. यह भारत की बुलंद तस्वीर को बचाए रखने की गाथा भर नहीं है, यह तारीख तो हमें बार बार सजग होने का पैगाम भी है. यह तारीख इस बात का सबूत भी है कि अगर हम चुके तो हमारी हस्ती को मिटाने वाले आगे बढ़ जायेंगे. यह अलग बात है कि भारत की धरती वीरों से खाली नहीं है. यहाँ हमेशा अर्जुन का गांडीव अपनी प्रत्यंचा चढ़ाए है. यहाँ वीर परशुराम के फर्शे की धार पैनी बनी हुई है. यहाँ राम की धनुष और कृष्ण का चक्र दुश्मन का सर काटने के लिए तैयार बैठा है. बस सियासत में पहुंचकर सो जाने वालों को जगाने की जरूरत है. बाकी तो पूरे मुल्क की आँखे निगहबान है.

जहांगीर को नहीं भूलता होटल ताज का मंजर
जगनैन सिंह नीटू, गोरखपुर

जहांगीर के जेहन में मुम्बई की आंतकी घटना पैबस्त है। इस घटना में उसके तीन अपने भी शिकार हुए थे। जो ताज होटल में तत्कालीन सांसद लालमणि से मिलने गये थे। रोजी रोटी के लिए परदेश में आकर अपनों को गंवाना ताजिंदगी का घाव बन जाता है और नासूर बन कर जीवन भर रिसता है। जहांगीर के लिए वह घटना एक घाव ही है जिसका दर्द वह भुला नहीं पाये। जिसे याद कर हर पल उनकी रूह कांपती रहती है। संत कबीरनगर जनपद के निमावा गांव का 32 वर्षीय जहांगीर शेख बचपन में ही रोजी रोटी की तलाश में मुंबई गये थे। जहांगीर आजकल मुंबई के माहिम इलाके में रहते हैं। जहांगीर के 42 वर्षीय चाचा मकसूद अहमद शेख ,उनके दोस्त 45 वर्षीय एखलाक अहमद व 30 वर्षीय फिरोज अहमद किसी जमाने में मुंबई रोजगार के लिए पहुंचे थे। इनकी जिंदगी सुकून से गुजर रही थी लेकिन तकदीर के पन्नों पर कुछ और ही लिखा था। 26 नवम्बर 2008 को मुंबई के ताज होटल के वाकये की जहांगीर ने तफसील से दूरभाष पर जानकारी दी। उनका बयान रूह को कंपा देने जैसा था। जहांगीर ने बताया कि ताज होटल में अपने बस्ती जनपद के सांसद लालमणि प्रसाद आए हुये थे। इस बात की सूचना जब चाचा मकसूद अहमद शेख को मिली तो उनकी खुशी का ठिकाना नही था। सांसद से चाचा की जान पहचान थी सो मारे खुशी के वे अपने दोस्त एखलाक व फिरोज के साथ ताज होटल में मिलने चले गए। वहां पहुंचे तो काफी देर तक मेल मिलाप व चायपान हुआ। सांसद के कमरे में बातचीत के दौरान टीवी के एक चैनल पर समाचार आया कि वीटी स्टेशन पर गोली बारी हुई है। थोड़ी देर बात दूसरी ब्रेकिंग न्यूज थी कि कोई साम्प्रदायिक वारदात हो गयी है। इस खबर के बाद चाचा ने सांसद से फिर मिलने की बात कहकर होटल से निकलने की इजाजत ली। तीनों लोग सांसद से विदा लेकर जैसे ही पहले माले की सीढि़यों से उतरने लगे तो सामने हथियारों से लैस कुछ लोगों को बेतहाशा फायरिंग करते देखा। कुछ सोचते इससे पहले ही आतंकियों की गोली ने चाचा और फिरोज को मौत की नींद सुला दी। एखलाक पीछे थे और फायरिंग देखकर दीवार की ओर छलांग लगा दी मगर बच नही सके क्योंकि तभी आतंकियों ने एक ग्रेनेड उनकी ओर फेंक दिया और उनकी भी कहानी खत्म हो गयी। जहांगीर ने रूंधे गले से बताया कि हमलोग मुतमईन थे सांसद से मिलकर देर सवेर आ ही जाएंगे लेकिन क्या पता था कि वह आखिरी मुलाकात है। जहांगीर बताते हैं कि 26 की रात में जब हम लोगों को पता चला कि ताज होटल में लगातार गोलीबारी हो रही है ,हमारे घरों में चूल्हा नही जला। सब यही दुआ कर रहे थे सब ठीक ठाक से हों । मगर 28 नवंबर को जब आपरेशन खत्म हुआ और लाशें जे.जे. हास्पीटल में भेजे जाने लगी तो उनमें तीन लाशें चाचा, एखलाक व फिरोज की भी थीं। बकौल जहांगीर घटना के बाद सरकार ने तीनों मृतकों के परिजनों को 11-11 लाख रुपये करी आर्थिक सहायता दी है लेकिन उस रात की घटना का एक पल भी आज तक हम नही भूले। रूह कांप जाती है।

उमर के जन्नतनशीं होने के बाद उजड़ गया परिवार
नजीर मलिक, सिद्धार्थनगर

 जिले के बांसी कोतवाली क्षेत्र के ग्राम जनियाजोत निवासी 28 वर्षीय उमर का कसूर यह था कि वह बेकसूर था। उसने न तो किसी आतंकी का विरोध किया न ही उसे इस बारे में अधिक मालूमात ही थी, मगर दुर्दात आतंकियों ने उसकी टैक्सी भाड़े पर ली और मौके पर उतरने के बाद उन्होंने गाड़ी में विस्फोटक छोड़ दिया। नतीजतन आतंकियों के जाने के कुछ ही देर बाद टैक्सी में विस्फोट हुआ और उमर जन्नतनशीं हो गया। इसके साथ उजड़ गया उसका भरा पूरा परिवार। 26/11 के हादसे को बुधवार को ठीक एक साल हो गये। एक साल पूर्व जब उसकी मौत की खबर उसके गांव जनियाजोत आयी थी, तो गांव ही नहीं पूरा जिला मर्माहत हो गया था। तकरीबन सभी दलों के बड़े नेता उसके मां- बाप से मिले और उनके लिए बहुत कुछ करने का दावा किया, मगर वक्त के थपेड़ों में उनके दावे हवा हो गये। आज उमर के मां-बाप, उसकी पत्‍‌नी दो मासूम बच्चे व तीन शादी योग्य बहनों का कोई पुरसा हाल नहीं है। उमर के पिता अखलाक की मानें तो उनका इकलौता बेटा ही परिवार का एक मात्र सहारा था। आज उमर की पत्‍‌नी मोमिना उसके तीन छोटे बच्चे कमर, फैसल व अफजल यतीम हो चुके हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर उनके परिवार की जिंदगी अचानक कठिन क्यों हो गई। सबसे बड़ी दिक्कत उमर की तीन जवान बहनों अफसाना, राफिया व सालेहा के साथ है। भाई की मौत के बाद उनकी शादी कैसे हो? यह एक बड़ा सवाल बन गया है। बकौल मोमिना, जिस घर में खाने के लाले हों, वहां शादी की बात कैसे सोची जाए। उमर की मां इस मुद्दे पर फफक पड़ती हैं। कहती हैं कि कातिलों (आतंकी) ने उनके जवान बेटे की जान क्यों ली। खुद को मुर्स्लिम कह कर कत्ल करने वाले ऐसे कातिलों के खिलाफ कलमा पढ़ने वाले हर मुसलमान को खड़ा होना पड़ेगा। उमर के परिवार को सबसे बड़ा शिकवा सियासतदानों और सरकार से है। पिता एखलाक के मुताबिक उमर की मौत की खबर पर तमाम नेताओं ने उनकी मदद का वादा किया, मगर मामला ठंडा होने के बाद कोई लौट कर उनके घर नहीं आया। जहां तक रही प्रशासन की बात तो आज तक कोई अफसर उनके घर झांकने तक नहीं आया। इस बारे में बांसी क्षेत्र के विधायक लालजी यादव का कहना है कि पीडि़त परिवार के मुआवजे के लिए उन्होंने केन्द्र व प्रदेश सरकार को कई पत्र लिखा, मगर कहीं से भी आशाजनक जवाब नहीं आया। गौर तलब है कि मुम्बई में टैक्सी चलाने वाले उमर की टैक्सी 26/11 के दिन कुछ आतंकियों ने भाड़े पर लिया था। घटना के पूर्व गंतव्य पर उतरने के बाद आतंकियों ने टैक्सी में विस्फोटक छोड़ दिया था। बाद में मुम्बई के बिले पार्ले में उक्त टैक्सी में विस्फोट हो गया था, जिसमें उमर के साथ एक सवारी की जान भी चली गई थी।

क्रूर टेलीफोन संदेश की याद से कांप उठती है रूह
महेन्द्र कुमार त्रिपाठी, देवरिया:
 पिछले साल यानी 26/11 (नवम्बर 2009) को मुम्बई में आतंकवादियों के खतरनाक खूनी खेल के एक वर्ष बीत गया। लेकिन बरियारपुर गांव के पोटरिहवां टोला निवासी गरीब कुशवाहा की झोपड़ी में पिछले साल आए टेलीफोन के कू्रर संदेश को याद कर परिजनों की रूह कांप उठती है। लोग कहते हैं कि भगवान किसी को यह क्रूर टेलीफोन संदेश पहुंचाने का दिन न दिखाए। देवरिया शहर से करीब दस किमी. दूर स्थित बरियारपुर गांव के पोटरिहवां टोला निवासी गरीब कुशवाहा के आंसू बुधवार को थमने का नाम नहीं ले रहा था। जागरण टीम को देखते ही गरीब के घर में चीत्कार उठने लगी। सभी को साल भर पहले मुम्बई में आतंकी हमले में गोली के शिकार हुए नौजवान मिश्रीलाल के मौत की खबर 26 नवम्बर 08 शाम की याद आ गयी। दरवाजे पर बैठे वृद्ध गरीब कुशवाहा और उनकी पत्‍‌नी चन्द्रावती के आंखों से आंसू भरभरा रहे थे। सभी को अपने बेटे मिश्रीलाल के मौत का गम था। 26 नवम्बर 2008 से पहले यानी एक दिन पूर्व 25 नवम्बर 08 को मिश्रीलाल ने अपने माता-पिता से टेलीफोन पर खूब बतियाया था। उसकी हर बातें अब बूढ़े मां-बाप को टीस रही हैं। घर का एक मात्र कमाऊ पूत और मिलनसार व्यक्तित्व के नहीं रहने से मां-बाप को पुरानी यादें साल रही हैं। बातचीत में आंसू के धार के बीच चन्द्रावती कहती हैं मिश्री बाबू हमारे कलेजा के टुकड़ा थे। अब वो कहां होंगे। यह हम सभी को अन्दर ही अन्दर साल रहा है। मुम्बई आतंकी हमला के एक साल बीतने के बाद भी पोटरिहवां टोला में अभी तक न तो प्रदेश सरकार के कोई अफसर ही उसके दरवाजे पर कुशलक्षेम पूछने गए और न ही यहां के जनप्रतिनिधि। इस वक्त तंगी की जिन्दगी मिश्रीलाल की विधवा गुड्डी व उसके तीन नौनिहाल रीतिक (2), रंजीता (7) व अमृता (डेढ़ वर्ष) गांव में गुजर बसर कर रहे हैं। मिश्रीलाल की विधवा गुड्डी को रेलवे ने नौकरी देने का भरोसा दिया है। उसके लिए वह साल भर से रेलवे का चक्कर लगा रही है। अभी तक कोई उम्मीद नहीं जगी है। उसे अभी भी सरकारी इनायत का इंतजार है। बताते है कि मुम्बई में मिश्रीलाल का छोटा भाई जयश्री व रामविलास भी साथ रहता था। लेकिन हादसा के बाद जयश्री घर पर ही रह गया। उसका हिम्मत नहीं जुट रहा है। गौरतलब है कि बरियारपुर के पोटरिहवां टोला निवासी गरीब कुशवाहा का बड़ा बेटा मिश्रीलाल जो मुम्बई में आटो रिक्शा चालक था। जो बीते 26 नवम्बर 08 को मुम्बई सी.एस.टी. रेलवे स्टेशन पर अपनी बहन विजया देवी को ट्रेन में बैठाने के लिए गया था। उसी बीच आतंकवादियों की तरफ से चली गोली का शिकार हो गया और मौके पर ही मौत हो गयी। जबकि उसकी बहन विजया के पैर में गोली लगी और वह घायल हो गयी जो मुम्बई में अभी भी इलाज करा रही है।
dainik jagran se sabhar

२०-११-२००९

मन रे गा नहीं कहिये मन रे रो

आनन्द राय, गोरखपुर



 मुम्बई में दिहाड़ी पर हर दिन दो सौ रुपये कमाने वाला खोराबार का रामसुभग नरेगा की लालच में डेढ़ साल पहले काम छोड़कर लौटा तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि गांव लौटकर जिंदगी त्रिशंकु बन जायेगी। गांव के दबंगों की चिरौरी करके उसका कार्ड तो बन गया लेकिन रोजी छिन गयी। एक दिन भी काम नहीं मिल सका। रामसुभग की तरह बहुत से बेरोजगार हैं जो नरेगा के जाल में उलझ गये हैं। अभावों से जूझ रहे ऐसे लोग कहीं दया के पात्र हैं तो कहीं प्रधानों के बंधुआ मजदूर।
 पंचायती राज संस्थाओं के पचास साल पूरे होने पर जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम को महात्मा गांधी के नाम किया गया तब यह उम्मीद जगी कि यह नया नाम मनरेगा खुशियों की बहार लायेगा। पर हालत जस की तस है, और बिगड़ती जा रही है। फिर तो कहना ही होगा- मन रे गा नहीं अब मन रे रो। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 2005 में नरेगा की नींव डाली। गरीबों की जिंदगी से जुड़े इस कार्यक्रम को 2 फरवरी 2006 से लागू किया गया। शुरू में 200 जिलों में लागू यह योजना 1 अप्रैल 2008 से देश के सभी ग्रामीण जिलों में चल रही है। यह योजना कुप्रबंधन की काली छाया के अंधेरों से घिरी है। हालात को देखकर यह कहना सही लगता है- कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप, जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही। मनरेगा के लिए नारे गढ़े गये थे- मिला गांव में ही रोजगार, शहरों में जाना है बेकार। एक साथ में सौ दिन काम, दस हजार का है इंतजाम। पर ये नारे ब्लाक मुख्यालयों की दीवारों की शोभा बनकर रह गये हैं। हकीकत बयां करने के लिए राम सुभग जैसे लोग काफी हैं।
 जिले के उरुवा विकास खण्ड का भिटहा पाण्डेय गांव प्रदेश के उन्हीं गांवों की तरह है जहां कुप्रबंधन ने मनरेगा के उद्देश्य को भ्रष्टाचार से जकड़ दिया है। धुरियापार प्रतिनिधि से मिली जानकारी के मुताबिक भिटहां पाण्डेय गांव में वर्ष 2007 से ही जाब कार्ड धारक झिनकाई, पारसनाथ, मुरली, रामप्रताप, रामवृक्ष, पन्ने, गुनई, सुनैना, मोतीलाल, लालमती, रंजना देवी, प्रभावती, घुरई को न कोई काम मिला और न ही उनकी कोई सुनवाई हुई। भूख से जूझ रहे इन लोगों की बेबसी को शायद ही कोई समझ पाये। ग्राम पंचायत अरांव जगदीश के रामपलट, सोनबरसा, मालती, चन्द्रभान और हरिलाल का कहना है कि उनसे 8 दिन काम करवाया गया लेकिन भुगतान नहीं मिला। इनके जाब कार्ड भी प्रधान के पास हैं। मरवटिया गांव के सिंगारे, शंभू, चन्द्रकला, लाची, रामभजन का कहना है कि उनका कार्ड भी प्रधान के ही पास है। यह व्यथा सिर्फ इन लोगों की ही नहीं है।
गोरखपुर- बस्ती मण्डल के 14777 ग्राम सभाओं का यही हाल है। कहीं थोड़ी बहुत बेहतर स्थिति जरूर है लेकि न सच्चाई यही है कि अधिकांश लोगों के जाब कार्ड प्रधानों की आलमारी में बंद है। कुछ लोगों से समझौता है। उनके नाम की मजदूरी प्रधान और ब्लाक के अधिकारी अपने हवाले कर रहे हैं। उन्हें औना पौना दे दिया जाता है। जो प्रधान के विरोधी खेमे के लोग हैं वे अपना कार्ड लेकर काम को तरस रहे हैं। अफसरों की दलील है कि जाब कार्ड धारक काम मागेंगे तब तो काम मिलेगा।

 उत्तर प्रदेश में इस वित्तीय वर्ष में महात्मा गांधी के नाम की 3606.79 करोड़ के बजट की इस महत्वाकांक्षी योजना की तस्वीर यह है कि अभी तक 2371.65 करोड़ रुपये खर्च हो गये हैं लेकिन 294620 कामों में से सिर्फ 162862 काम पूरे हो पाये हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक लूट खसोट करने वालों का संजाल फैला है और तिकड़म से गरीबों की रोजी मारी जा रही है। गोरखपुर-बस्ती मण्डल के सातों जिलों में 55 हजार से अधिक परिवारों के जाब कार्ड पर लगभग 68 हजार लोग काम के अधिकारी हैं लेकिन किसी दिन चार फीसदी से अधिक लोग काम नहीं पाते हैं। कमिश्नर पी.के. महान्ति ने बार बार मातहतों को चेतावनी दी है लेकिन यह सही है कि योजना की पारदर्शिता कायम नहीं हो पायी है।

१७-११-२००९

लालटेन की रोशनी में चमक रहे अक्षर

आनन्द राय, गोरखपुर


                           यह कथा उन बच्चों की है जो गरीबी की कोख में पल रहे हैं। पढ़ने में होनहार हैं लेकिन उनके पास संसाधनों का अभाव है। लालटेन की रोशनी में आंख टिकाये लगातार पढ़ रहे हैं। न तो उन्हें इनवर्टर की दरकार है और न ही उनका कोई नखरा है। उनका रिश्ता तो सिर्फ अक्षरों से जुड़ा है। वे सिर्फ अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं।

             वर्ष 2007 में यूपी बोर्ड हाईस्कूल की परीक्षा टाप करने वाली हरिप्रिया को अभी कौन भूल पाया है। जब उसने 88 फीसदी अंक हासिल कर प्रदेश के लाखों छात्र छात्राओं को पीछे छोड़ दिया तो वह गोरखपुर की लाडली बन गयी। इस साल वह इण्टरमीडिएट परीक्षा की तैयारी कर रही है। महानगर के दुग्धेश्र्वरपुरम के दो कमरे के मकान में रहने वाली कार्मल ग‌र्ल्स इण्टर कालेज की यह छात्रा स्कूल के अलावा घर पर सात से आठ घण्टे पढ़ रही है। बिजली की आंख मिचौली कभी उसके हौसलों पर भारी नहीं पड़ी।

                प्राथमिक विद्यालय बनकटीचक में कक्षा पांच में पढ़ने वाला विशाल थापा और शैलेश इतने मेधावी हैं कि कभी कभी विद्यालय के हेडमास्टर ब्रजनन्दन यादव विस्मित रह जाते हैं। उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि इन गरीब बच्चों को कैसे बेहतर मुकाम मिले लेकिन विशाल और शैलेश के हौसलों को दाद देनी होगी। कंदराई के प्रधान देवेन्द्र यादव अपने गांव के बलवंत का उदाहरण देते हैं। सामान्य घर में पैदा हुआ बलवंत पढ़ने के प्रति समर्पित है। बिजली तो वैसे भी गांव में नहीं आती है। वह लालटेन की रोशनी में पढ़ने बैठता है तो कई बार लोगों को मना करना पड़ता है। महुआडाबर जूनियर हाईस्कूल में कक्षा आठ में पढ़ने वाले इस बच्चे का सपना बड़ा होकर उन लोगों की तरह बनना है जिनके पीछे दुनिया भागती है।

             कुछ शिक्षक राजकीय जुबली कालेज गोरखपुर में कक्षा दस बी में पढ़ने वाले अमरनाथ मिश्रा की नसीहत देते हैं। इस बच्चे में पढ़ने के प्रति जो ललक है उसे कोई अड़चन प्रभावित नहीं कर पाती। यह तो कुछ गिने चुने बच्चों की बानगी भर है। ऐसे अनगिनत बच्चे हैं जो अभाव में पल रहे हैं। उनके पिता मेहनत मजदूरी करके किसी तरह दो जून की रोटी लाते हैं मगर अपने बच्चे को कुछ बनाना चाहते हैं। ये बच्चे अपने पिता की दिक्कतों को समझते हुये अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हैं। इनकी तकदीर इन्हें कहां ले जायेगी कहा नहीं जा सकता लेकिन इनके जज्बों को देखकर यही लगता है कि एक न एक दिन सफलता इनका कदम चूम लेगी।

१६-११-२००९

मुलायम, कल्याण और संघ नया गुल खिलाने की तैयारी में

आनन्द राय , गोरखपुर


यह मेरा अपना विचार है. हो सकता है यह सिर्फ मेरी आशंका हो, यह भी हो सकता है कि यह बिल्कुल सच हो. मैं कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव की नूरा कुश्ती की बात कर रहा हूँ. यद्यपि भारत की जनता जिस तरह ताजा चीजों को ही याद रखती है उस हिसाब से कब कल्याण सिंह को लाभ मिल जाय और कब मुलायम सिंह यादव बाजी मार लें, कहा नहीं जा सकता. मुझे अबकी बार पता नहीं क्यूँ लग रहा है कि मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह और संघ के कुछ ख़ास लोगों की योजना कुछ नया गुल खिलाने की है. फिर से कुछ  खिचडी पक रही है.
     कल्याण सिंह ने दो बार भाजपा छोडी और दोनों बार उनके जो बयान सामने आये यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है. मुलायम सिंह यादव की सरकार भाजपा ने बनवाई. इधर जब मुसलमान सपा की सारी असलियत जान गए तबसे इन सभी नेताओं का पेट खराब है. कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद काण्ड में हिन्दुओं और मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों का दिल जीता था. इस बुनियाद पर दोनों नेतओं ने लम्बी पारी खेली. दोनों एक दूसरे का हित साधते रहे. दोनों ने जब यह जाना कि मुसलमानों का मिजाज बदल रहा है तो फिर से एक नया प्लान तैयार किया गया. लोक सभा चुनाव के दौरान जब  बिहार के शूरमा लालू यादव और राम बिलास पासवान के साथ कल्याण सिंह को लेकर मुलायम घूम रहे थे तब  आज़म खान का भूत उनका पीछा कर रहा था. सबने मुस्लिम मतदाताओं पर जोर न देकर पिछडा कार्ड खेला. एक तरफ कांग्रेस को टिकट बंटवारे में उसकी औकात बताने का दंभ और दूसरी तरफ डेढ़ दशक तक एक दूसरे को गरियाने वालों की गलबहियां, यह मंच जनता के दिलों में नहीं उतर सका. यह पिछडा
 कार्ड सिर्फ यू पी में ही नहीं, बिहार में भी नहीं चल पाया.
      लालू यादव की जमीन दरक गयी. पासवान साफ़ हो गए. मुलायम सिंह यादव की ताकत सिमट गयी और कल्याण सिंह बेचारे हो गए. लोहिया के वंशवाद विरोधी झंडे के ध्वजवाहक मुलायम सिंह यादव ने जब भाई, भतीजा और बेटे के बाद बहू के लिए भी सीट सुरक्षित करने की सोची तो उन्हें कल्याण सिंह से भी उम्मीदें थी. राजबब्बर की आंधी और समर्पित कार्यकर्ताओं की वेदना ने मुलायम के परिवारवाद की राह रोक ली. न तो उनकी खूबसूरत बहू का जादू चला और कल्याण सिंह ही कोई करिश्मा कर पाए.   मुलायम को लगा कि अब उनके तरकश में कोई तीर नहीं बचा है. उन्हें अपने उत्थान के दिन याद आये. उन्हें परिंदा पर नहीं मार सकता वाला अपना डायलाग याद आया, उन्हें तब अपने उत्थान के सबसे ख़ास सूत्रधार कल्याण का पुराना रूप  याद आया  और कल्याण का वह नारा- राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे, याद आया. मुलायम और उनके कुनबे को लगा कि हमारी राजनीति तो नफरत की आंधी में परवान चढ़ती है. ऐसी  आंधी बहाने वाला तो हमारे घर में घिरा हुआ है. बस
 यहीं से एक नए खेल की शुरूआत हो गयी.

  सियासत की धुरी बने रहने की आकांक्षा ने मुलायम सिंह यादव की सोच और राजनीति की दिशा बदल दी. उन्हें लगा कि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक विचारधारा इतने टुकडों में बनती है कि यहाँ पिछडा कार्ड नहीं खेला जा सकता है. वह भी हाल के पांच सात वर्षों में तो सभी जातियों के शूरमाओं ने अपने अपने नाम की पार्टी बना ली है. सिर्फ हिन्दू मुसलमान की राजनीति ही इनके मंसूबों को आगे ले जा सकती है. इस सोच के तहत कल्याण  और मुलायम सिंह यादव की नूरा कुश्ती फिर से शुरू हुई है. अब केशरी नाथ त्रिपाठी जैसे बुनियादी भाजपाई चिल्लाते रहें कि मेरा वश चले तो मैं कल्याण सिंह को पार्टी में नहीं लूंगा लेकिन परदे के पीछे से राजनाथ सिंह और बाहर से  कलराज मिश्रा और रमापति राम त्रिपाठी जैसों ने तो फिर से गोटियाँ बिछानी शुरू कर दी है. संघ  के भी कुछ  ख़ास लोग ताना बाना तैयार करने लगे हैं. वह दिन दिखने को आ सकता है जब कल्याण की भाजपा में ससम्मान वापसी हो और नये सिरे से राम मंदिर आन्दोलन की गूँज सुनाई पड़े. भाजपा और सपा की सफलता का सबसे गहरा राज तो यही है...... यह याद  रहे अभी कल्याण सिंह अमर सिंह पर कुछ बोलने परहेज कर रहे हैं.
       यह सजग होने का वक्त है. यह इन नेताओं का कच्चा चिट्ठा खोलने का वक्त है. यह भारत की जनता को साम्प्रदायिकता की आंच से बचाने का वक्त है. यह समय रहते जाग जाने का वक्त है. यह संघ के उन नेताओं को और आगे करने का वक्त है जो मतभेद भुला कर उलेमाओं के गले मिल रहे हैं. वरना सत्ता में बने रहने की यह  आकांक्षा देश और दुनिया के सबसे ऐतिहासिक प्रदेश को फिर से दंगों की आंच में धकेल देगी. हालांकि मुझे इस बात की भी उम्मीद है कि गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले कल्याण सिंह के किसी बयान से अब कोई हलचल नहीं उठेगी. उनके किसी बयान से कोई रोमांच नहीं होगा.. राम मंदिर को अपने जीवन का  लक्ष्य बताने का उनका नारा शब्दों  की जुगाली भर लगता है. अब उनके इस नारे से किसी हिन्दू की कोई भुजा नही फड़कती. अब तो किसान अपने खेत खलिहान, खाद पानी और रोजमर्रा की जरूरतों में ही परेशान है. राम करें लम्बे समय से शांत चल रहे उत्तर प्रदेश को इन लोगों की नजर न लगे.

१५-११-२००९

भूख ने चाहतों से जुदा कर दिया

आनन्द राय, गोरखपुर




छोटी उम्र में बड़ा बोझ उठाने वाले बचपन को गौर से देखिये तो वे आपके अपने बच्चों से अलग नजर नहीं आयेंगे। वे सब भी पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बनना चाहते हैं मगर भूख ने इन्हें चाहतों से जुदा कर दिया है। इनके दिल के अरमानों पर पहरा लगा दिया है।

         कठउर गांव के 9 साल के शिव की कहानी सुनिये। बात सोमवार की है। कक्षा चार में पढ़ने वाले शिव ने स्कूल जाने की तैयारी शुरू की मगर पिता सिद्धू ने कह दिया आज स्कूल नहीं जाना है। सिद्धू ने अपने बेटे के हाथ में ठेला पकड़ा दिया और कठउर से छह किलोमीटर पैदल चलकर पिता के साथ अमरूद बेचते वह सिविल लाइंस पहंुचा। शिव के साथ अक्सर ऐसा होता है। इस बारे में उससे पूछा गया तो होठों पर चुप्पी थी। हर बार कुरेदने पर बाप की ओर सहमी हुई नजरें उठ गयीं। कई बार जोर देने पर बस इतना ही कह पाया कि स्कूले जाइल चाहत रहलीं, बाकी इ मना कर दिहलें..। अब सिद्धू की दलील सुने तो यही कि पढ़ लिखकर पेट थोड़े भरेगा।
          
            यही हाल पप्पू का है। पादरीबाजार में रहने वाला पप्पू पहले एक होटल में काम करता था। अब उसने अपने 12 साल के बेटे फिरोज को भी उसी होटल में लगवा दिया है और खुद भाड़े का रिक्शा चला रहा है। फिरोज ने तो दो चार बार स्कूल का मंुह देखा लेकिन तीन भाई बहनों का पेट भरने के लिए उसने यही रास्ता अपना लिया। कचरे के ढेर में अपने पूरे परिवार की रोटी तलाश रही 8 साल की लक्षमिनिया और मारे डर के अपना नाम न बताने वाली उसकी एक सहयोगी, इन दोनों को देखकर नियति के विधान पर दुख हुआ। उनकी आंखों में सांझ भी थी और जब भी कचरे में कुछ मिल जाता तो भोर की चमक भी। उन सबके लिए दया, पुचकार और प्यार के बोल बेगानी बातें हैं। शहर में रहते हुये भी पूरा दिन कचरे के ढेर में कुछ ढूंढ़ते हुये गुजर जाता है। बस इतना ही कह पाती हैं कि यह तो हमारा रोज का काम है।

                    मन्नू, जितेन्द्र, पिण्टू,सुंदर, राजा, गोमा, गुडडू, छोटे, अर्जुन, अकलू, हरमेश, नाटे और सेवक जैसे न जाने कितने बच्चे हैं जो किसी होटल, किसी गैराज, किसी चाय की दुकान और किसी के घर की नौकरी करके अपना बचपन बिता रहे हैं। बदले में इन सबको किसी तरह दो जून की रोटी मिल जाती है। पेट भर कर ये अपना सबसे अनमोल समय कौडि़यों के भाव बेच रहे हैं। अनदेखे सपनों के बीच इनके कुम्हलाये चेहरों को देखें तो साफ साफ शाम की उदासी दिखती है। और कुछ भले न हो लेकिन यह तो सही है कि असमय इन बच्चों के बड़े हो जाने से बुनियाद कांप रही है। इसका अहसास निजाम को भले न हो। इनमें कुछ ऐसे भी बच्चे हैं जिन्हें अपने सपनों, ख्वाबों के व्यर्थ हो जाने और अस्तित्व की निरर्थकता का अहसास है।

                       गोरखपुर मण्डल में शैक्षणिक सत्र के शुरूआती दिनों में जब 6 से 14 साल के बच्चों का सर्वेक्षण हो रहा था तब 29 लाख बच्चे चिन्हित किये गये। बेसिक शिक्षा विभाग ने अपने आंकड़ों में 22 हजार बच्चों को आउट आफ स्कूल दिखाया। इनमें से अधिकांश किसी न किसी स्कूल में एडमिशन भी पा चुके हैं। पर यह सिर्फ आंकड़ों का खेल है। उनकी पढ़ाई भी शिव की तरह हो रही है। शहर से लेकर गांव तक शायद ही कोई जगह हो जहां जिंदगी से जूझते हुये शिव जैसे बच्चे न मिलें। इन बच्चों की तरक्की के लिए हर साल रस्मी उपाय ढ़ूंढे जाते हैं और सब कुछ कागजों में निपटा कर इतिश्री कर ली जाती है। राजेश सिंह बसर ने ऐसे ही हालात पर लिखा है-
 दिल में अरमान यूं तो कई थे मगर,
भूख ने चाहतों से जुदा कर दिया।
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