20/02/2008

मंडी एक हकीकत


मंडी एक उपन्यास है। वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश शुक्ल इसके सर्जक हैं। उत्तर प्रदेश की सियासत गुजरे दो दशक में जिस रूप में सामने आयी उससे हमारे गौरव को आघात लगा। अनगिनत शहादतों से मिली आजादी के बाद देश के महानायकों ने कल्पना भी नही की होगी की लोकतंत्र के मंदिरों पर कभी अपराधी भी जा बैठेंगें। लेकिन अब ये अपराधी देश की राजनीतिक दशा और दिशा को प्रभावित कर रहे हैं। मंडी के अंत में ब्रजेश शुक्ल ने अपनी बात लिखते हुए अनगिनत शहादतों से मिलने वाली आजादी का जिक्र करते हुए प्रतीक रूप उपन्यास की भाव भूमि उत्तर प्रदेश के सचिवालय व विधानसभा को बनाया है लेकिन यह भी कहा है यह कहानी तो कई विधान सभाओ और संसद की है। यह उन हत्यारों, बलात्कारियों ,लुटेरों, अपराधियों, जेबकतरों और दलालों की कथा है जो बाद में ये कें प्रकारेर विधायक और सांसद बन गए। यह उन मुख्यमंत्रियों की गाथा है जिनके लिए सत्ता बनाए रखने की बाजीगरी ही सबसे बड़ी सफलता है। .................................>ब्रजेश जी के इस भाव को शिछ्क नेता स्वर्गीय पंचानन राय एक सभा में सुना रहे थे। मेरी मुलाकात हुई तो उन्होंने छूटते ही पूछा- का हो ब्रजेश शुक्ल वाली मंडी देखला । मैंने पूछा छप गई क्या। असल में इस उपन्यास के बारे में ब्रजेश जी ने चर्चा की थी। पंचानन राय जी ने एक अध्यापक से मेरे पास उपन्यास भिजवाया। मैंने इसे दो बार पढ़ा और इसकी सबसे बड़ी खासियत यह जाना की मंडी केपात्र मायावी नही बल्कि दुनियावी हैं और कहीं भी ऐसा नही लगता की किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्व दिया गया है। यह ब्रजेश शुक्ल की लेखनी का कमाल है की उपन्यास पढ़ते समय प्रदेश की दी घटनाएँ दिमाग में दर्ज होती चली जाती हैं। तमाम तथ्य उपन्यास के बहाने हाजिर हो जाते हैं। एक पत्रकार के जीवन में धुप छांव के जो अनुभव होते हैं वे इसके देश काल में मिलते हैं। मंडी के कुछ दृश्य भी एक पात्र की तरह दिखते हैं और सरल भाषा के रंग तथा कथा कहने का बेहतरीन सलीका ये सब मिलाकर मंडी को सहज ही अनूठा और मनोहारी बनाते हैं।वाकई मंडी प्रतीक है उस सच का और आज के निर्मम यथार्थ का, जिसमें सत्ता और तंत्रसाँप सीरही के खेल खेलते हैं।

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