25/04/2009

आमी के प्रदूषण से टूटने लगी है डोर


आनंद राय, गोरखपुर

औद्योगिक इकाइयों के अपजल से आमी नदी प्रदूषित हुई तो तटवर्ती गांवों की सूरत बदल गयी। गरीबी व बदहाली भी बढ़ी पर इसी नदी के तट पर बसे गांव रामपुर गरथौली के विकास की रफ्तार नहीं थमी। दुनिया की दौड़ में गांव ने आगे निकलने की भरपूर कोशिश की। यहां सब कुछ बेहतर हुआ पर आमी के प्रदूषण की टीस हर चेहरे पर चस्पा हो गयी। इस गांव से अपने लोगों की ही डोर टूटने लगी है जिससे संस्कार भी छूट रहे हैं।
सिद्धार्थनगर जनपद के सोहनारा से निकली आमी नदी गोरखपुर जिले के सोहगौरा में मिल जाती है। पिछले दो दशकों में औद्योगिक इकाइयों के अपजल से नदी प्रदूषित हुई तो तट पर बसे लोगों का सुखचैन छिन गया। रामपुर गरथौली भी आमी के तट पर ही बसा है। यह गांव गोरखपुर से 27 किमी दूर है। कुआवल पुल से कटघर जाने वाली सड़क पर स्थित इस गांव की आबादी दो हजार के आसपास है। 1995 में अंबेडकर गांवों की सूची में इसे शामिल किया गया लिहाजा यहां चमक-दमक खूब दिखती है। इस राजस्व ग्राम के रामपुर गरथौली और लरबरी दो पुरवा हैं। रामपुर गरथौली में सीसी रोड और लरबरी में खड़ंजा है। रामपुर गरथौली में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं जबकि लरबरी में भी एक नया प्राथमिक विद्यालय बना है। इन विद्यालयों में लगभग साढ़े सात सौ बच्चों का नामांकन भी है। गांव की आबादी के हिसाब से इतने बच्चों की संख्या समझ से परे है।
रामपुर गरथौली में सैंथवार, कोइरी, गुप्ता, यादव और अनु.जाति के लोग हैं। अनु.जाति की आबादी 72 प्रतिशत है इसी वर्ग की जोखना देवी तीसरी बार ग्राम प्रधान बनी हैं। यहां से क्षेत्र पंचायत सदस्य डा. रामसहाय सिंह गांव के सक्रिय लोगों में एक हैं और आमी को प्रदूषणमुक्त करने की लड़ाई में लगे हैं। गांव की सम्पन्नता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता कि विभिन्न प्राथमिक विद्यालयों में यहां के दर्जन भर शिक्षक हैं, बीस से अधिक लोग सिपाही हैं, फोर्स में भी पांच-छह लोग हैं, तीन एसडीओ हैं। दिल्ली में रहकर इसी गांव के दो युवक आईएएस की तैयारी कर रहे हैं और प्री परीक्षा भी पास कर चुके हैं। सैंथवारों की खेती बारी ठीक है। पशुपालन और दूध के कारोबार से बहुतों की गृहस्थी चलती थी। अब उन घरों में सरकारी नौकरी का पैसा भी है। इस सबके बावजूद दिक्कतें भी कई हैं। अब तो न ही आमी की लहरों से कोई बच्चा अठखेलियां करता है और न ही पशु वहां पहुंचते हैं। अब तो ग्रामीण इसमें पैर भी नहीं डालते। बताते हैं कि नदी में पैर पड़ते ही फफोले पड़ जाते हैं। नदी में मछलियां भी नहीं हैं।
नदी में प्रदूषण के कारण बदबू व मच्छरों की फौज और इस तरह की कई पीड़ा लोगों के दिलों में घाव कर चुकी है। डा. रामसहाय सिंह बताते हैं कि नदी में प्रदूषण के कारण लोगों को मजबूरी में अंतिम संस्कार के लिए अयोध्या, बड़हलगंज और गोला तक जाना पड़ता है। मन को पीड़ा से भर देने वाली परिस्थिति के चलते ही लोग गांव से दूर होने लगे हैं। नयी पीढ़ी की तो बात ही कुछ और है। 18 वर्ष के जयप्रकाश और 22 वर्ष के सुभाष जल्दी नौकरी पाना चाहते हैं ताकि गांव की दिक्कतों से पीछा तो छूटे।

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