आज २६ तारीख है. देश की छाती पर आतंकियों ने इसी तारीख को पिछले साल ऐसा जख्म दिया जिसके घाव अभी तक हरे हैं. यह एक ऐसी विडंबना है जिस पर न तो आंसू बहा सकते और न ही अपने गम को छुपा सकते. यह भारत की बुलंद तस्वीर को बचाए रखने की गाथा भर नहीं है, यह तारीख तो हमें बार बार सजग होने का पैगाम भी है. यह तारीख इस बात का सबूत भी है कि अगर हम चुके तो हमारी हस्ती को मिटाने वाले आगे बढ़ जायेंगे. यह अलग बात है कि भारत की धरती वीरों से खाली नहीं है. यहाँ हमेशा अर्जुन का गांडीव अपनी प्रत्यंचा चढ़ाए है. यहाँ वीर परशुराम के फर्शे की धार पैनी बनी हुई है. यहाँ राम की धनुष और कृष्ण का चक्र दुश्मन का सर काटने के लिए तैयार बैठा है. बस सियासत में पहुंचकर सो जाने वालों को जगाने की जरूरत है. बाकी तो पूरे मुल्क की आँखे निगहबान है.
जहांगीर को नहीं भूलता होटल ताज का मंजर
जगनैन सिंह नीटू, गोरखपुर
जहांगीर के जेहन में मुम्बई की आंतकी घटना पैबस्त है। इस घटना में उसके तीन अपने भी शिकार हुए थे। जो ताज होटल में तत्कालीन सांसद लालमणि से मिलने गये थे। रोजी रोटी के लिए परदेश में आकर अपनों को गंवाना ताजिंदगी का घाव बन जाता है और नासूर बन कर जीवन भर रिसता है। जहांगीर के लिए वह घटना एक घाव ही है जिसका दर्द वह भुला नहीं पाये। जिसे याद कर हर पल उनकी रूह कांपती रहती है। संत कबीरनगर जनपद के निमावा गांव का 32 वर्षीय जहांगीर शेख बचपन में ही रोजी रोटी की तलाश में मुंबई गये थे। जहांगीर आजकल मुंबई के माहिम इलाके में रहते हैं। जहांगीर के 42 वर्षीय चाचा मकसूद अहमद शेख ,उनके दोस्त 45 वर्षीय एखलाक अहमद व 30 वर्षीय फिरोज अहमद किसी जमाने में मुंबई रोजगार के लिए पहुंचे थे। इनकी जिंदगी सुकून से गुजर रही थी लेकिन तकदीर के पन्नों पर कुछ और ही लिखा था। 26 नवम्बर 2008 को मुंबई के ताज होटल के वाकये की जहांगीर ने तफसील से दूरभाष पर जानकारी दी। उनका बयान रूह को कंपा देने जैसा था। जहांगीर ने बताया कि ताज होटल में अपने बस्ती जनपद के सांसद लालमणि प्रसाद आए हुये थे। इस बात की सूचना जब चाचा मकसूद अहमद शेख को मिली तो उनकी खुशी का ठिकाना नही था। सांसद से चाचा की जान पहचान थी सो मारे खुशी के वे अपने दोस्त एखलाक व फिरोज के साथ ताज होटल में मिलने चले गए। वहां पहुंचे तो काफी देर तक मेल मिलाप व चायपान हुआ। सांसद के कमरे में बातचीत के दौरान टीवी के एक चैनल पर समाचार आया कि वीटी स्टेशन पर गोली बारी हुई है। थोड़ी देर बात दूसरी ब्रेकिंग न्यूज थी कि कोई साम्प्रदायिक वारदात हो गयी है। इस खबर के बाद चाचा ने सांसद से फिर मिलने की बात कहकर होटल से निकलने की इजाजत ली। तीनों लोग सांसद से विदा लेकर जैसे ही पहले माले की सीढि़यों से उतरने लगे तो सामने हथियारों से लैस कुछ लोगों को बेतहाशा फायरिंग करते देखा। कुछ सोचते इससे पहले ही आतंकियों की गोली ने चाचा और फिरोज को मौत की नींद सुला दी। एखलाक पीछे थे और फायरिंग देखकर दीवार की ओर छलांग लगा दी मगर बच नही सके क्योंकि तभी आतंकियों ने एक ग्रेनेड उनकी ओर फेंक दिया और उनकी भी कहानी खत्म हो गयी। जहांगीर ने रूंधे गले से बताया कि हमलोग मुतमईन थे सांसद से मिलकर देर सवेर आ ही जाएंगे लेकिन क्या पता था कि वह आखिरी मुलाकात है। जहांगीर बताते हैं कि 26 की रात में जब हम लोगों को पता चला कि ताज होटल में लगातार गोलीबारी हो रही है ,हमारे घरों में चूल्हा नही जला। सब यही दुआ कर रहे थे सब ठीक ठाक से हों । मगर 28 नवंबर को जब आपरेशन खत्म हुआ और लाशें जे.जे. हास्पीटल में भेजे जाने लगी तो उनमें तीन लाशें चाचा, एखलाक व फिरोज की भी थीं। बकौल जहांगीर घटना के बाद सरकार ने तीनों मृतकों के परिजनों को 11-11 लाख रुपये करी आर्थिक सहायता दी है लेकिन उस रात की घटना का एक पल भी आज तक हम नही भूले। रूह कांप जाती है।
उमर के जन्नतनशीं होने के बाद उजड़ गया परिवार
नजीर मलिक, सिद्धार्थनगर
जिले के बांसी कोतवाली क्षेत्र के ग्राम जनियाजोत निवासी 28 वर्षीय उमर का कसूर यह था कि वह बेकसूर था। उसने न तो किसी आतंकी का विरोध किया न ही उसे इस बारे में अधिक मालूमात ही थी, मगर दुर्दात आतंकियों ने उसकी टैक्सी भाड़े पर ली और मौके पर उतरने के बाद उन्होंने गाड़ी में विस्फोटक छोड़ दिया। नतीजतन आतंकियों के जाने के कुछ ही देर बाद टैक्सी में विस्फोट हुआ और उमर जन्नतनशीं हो गया। इसके साथ उजड़ गया उसका भरा पूरा परिवार। 26/11 के हादसे को बुधवार को ठीक एक साल हो गये। एक साल पूर्व जब उसकी मौत की खबर उसके गांव जनियाजोत आयी थी, तो गांव ही नहीं पूरा जिला मर्माहत हो गया था। तकरीबन सभी दलों के बड़े नेता उसके मां- बाप से मिले और उनके लिए बहुत कुछ करने का दावा किया, मगर वक्त के थपेड़ों में उनके दावे हवा हो गये। आज उमर के मां-बाप, उसकी पत्नी दो मासूम बच्चे व तीन शादी योग्य बहनों का कोई पुरसा हाल नहीं है। उमर के पिता अखलाक की मानें तो उनका इकलौता बेटा ही परिवार का एक मात्र सहारा था। आज उमर की पत्नी मोमिना उसके तीन छोटे बच्चे कमर, फैसल व अफजल यतीम हो चुके हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर उनके परिवार की जिंदगी अचानक कठिन क्यों हो गई। सबसे बड़ी दिक्कत उमर की तीन जवान बहनों अफसाना, राफिया व सालेहा के साथ है। भाई की मौत के बाद उनकी शादी कैसे हो? यह एक बड़ा सवाल बन गया है। बकौल मोमिना, जिस घर में खाने के लाले हों, वहां शादी की बात कैसे सोची जाए। उमर की मां इस मुद्दे पर फफक पड़ती हैं। कहती हैं कि कातिलों (आतंकी) ने उनके जवान बेटे की जान क्यों ली। खुद को मुर्स्लिम कह कर कत्ल करने वाले ऐसे कातिलों के खिलाफ कलमा पढ़ने वाले हर मुसलमान को खड़ा होना पड़ेगा। उमर के परिवार को सबसे बड़ा शिकवा सियासतदानों और सरकार से है। पिता एखलाक के मुताबिक उमर की मौत की खबर पर तमाम नेताओं ने उनकी मदद का वादा किया, मगर मामला ठंडा होने के बाद कोई लौट कर उनके घर नहीं आया। जहां तक रही प्रशासन की बात तो आज तक कोई अफसर उनके घर झांकने तक नहीं आया। इस बारे में बांसी क्षेत्र के विधायक लालजी यादव का कहना है कि पीडि़त परिवार के मुआवजे के लिए उन्होंने केन्द्र व प्रदेश सरकार को कई पत्र लिखा, मगर कहीं से भी आशाजनक जवाब नहीं आया। गौर तलब है कि मुम्बई में टैक्सी चलाने वाले उमर की टैक्सी 26/11 के दिन कुछ आतंकियों ने भाड़े पर लिया था। घटना के पूर्व गंतव्य पर उतरने के बाद आतंकियों ने टैक्सी में विस्फोटक छोड़ दिया था। बाद में मुम्बई के बिले पार्ले में उक्त टैक्सी में विस्फोट हो गया था, जिसमें उमर के साथ एक सवारी की जान भी चली गई थी।
क्रूर टेलीफोन संदेश की याद से कांप उठती है रूह
महेन्द्र कुमार त्रिपाठी, देवरिया:


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