20/11/2009

मन रे गा नहीं कहिये मन रे रो

आनन्द राय, गोरखपुर



 मुम्बई में दिहाड़ी पर हर दिन दो सौ रुपये कमाने वाला खोराबार का रामसुभग नरेगा की लालच में डेढ़ साल पहले काम छोड़कर लौटा तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि गांव लौटकर जिंदगी त्रिशंकु बन जायेगी। गांव के दबंगों की चिरौरी करके उसका कार्ड तो बन गया लेकिन रोजी छिन गयी। एक दिन भी काम नहीं मिल सका। रामसुभग की तरह बहुत से बेरोजगार हैं जो नरेगा के जाल में उलझ गये हैं। अभावों से जूझ रहे ऐसे लोग कहीं दया के पात्र हैं तो कहीं प्रधानों के बंधुआ मजदूर।
 पंचायती राज संस्थाओं के पचास साल पूरे होने पर जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम को महात्मा गांधी के नाम किया गया तब यह उम्मीद जगी कि यह नया नाम मनरेगा खुशियों की बहार लायेगा। पर हालत जस की तस है, और बिगड़ती जा रही है। फिर तो कहना ही होगा- मन रे गा नहीं अब मन रे रो। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 2005 में नरेगा की नींव डाली। गरीबों की जिंदगी से जुड़े इस कार्यक्रम को 2 फरवरी 2006 से लागू किया गया। शुरू में 200 जिलों में लागू यह योजना 1 अप्रैल 2008 से देश के सभी ग्रामीण जिलों में चल रही है। यह योजना कुप्रबंधन की काली छाया के अंधेरों से घिरी है। हालात को देखकर यह कहना सही लगता है- कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप, जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही। मनरेगा के लिए नारे गढ़े गये थे- मिला गांव में ही रोजगार, शहरों में जाना है बेकार। एक साथ में सौ दिन काम, दस हजार का है इंतजाम। पर ये नारे ब्लाक मुख्यालयों की दीवारों की शोभा बनकर रह गये हैं। हकीकत बयां करने के लिए राम सुभग जैसे लोग काफी हैं।
 जिले के उरुवा विकास खण्ड का भिटहा पाण्डेय गांव प्रदेश के उन्हीं गांवों की तरह है जहां कुप्रबंधन ने मनरेगा के उद्देश्य को भ्रष्टाचार से जकड़ दिया है। धुरियापार प्रतिनिधि से मिली जानकारी के मुताबिक भिटहां पाण्डेय गांव में वर्ष 2007 से ही जाब कार्ड धारक झिनकाई, पारसनाथ, मुरली, रामप्रताप, रामवृक्ष, पन्ने, गुनई, सुनैना, मोतीलाल, लालमती, रंजना देवी, प्रभावती, घुरई को न कोई काम मिला और न ही उनकी कोई सुनवाई हुई। भूख से जूझ रहे इन लोगों की बेबसी को शायद ही कोई समझ पाये। ग्राम पंचायत अरांव जगदीश के रामपलट, सोनबरसा, मालती, चन्द्रभान और हरिलाल का कहना है कि उनसे 8 दिन काम करवाया गया लेकिन भुगतान नहीं मिला। इनके जाब कार्ड भी प्रधान के पास हैं। मरवटिया गांव के सिंगारे, शंभू, चन्द्रकला, लाची, रामभजन का कहना है कि उनका कार्ड भी प्रधान के ही पास है। यह व्यथा सिर्फ इन लोगों की ही नहीं है।
गोरखपुर- बस्ती मण्डल के 14777 ग्राम सभाओं का यही हाल है। कहीं थोड़ी बहुत बेहतर स्थिति जरूर है लेकि न सच्चाई यही है कि अधिकांश लोगों के जाब कार्ड प्रधानों की आलमारी में बंद है। कुछ लोगों से समझौता है। उनके नाम की मजदूरी प्रधान और ब्लाक के अधिकारी अपने हवाले कर रहे हैं। उन्हें औना पौना दे दिया जाता है। जो प्रधान के विरोधी खेमे के लोग हैं वे अपना कार्ड लेकर काम को तरस रहे हैं। अफसरों की दलील है कि जाब कार्ड धारक काम मागेंगे तब तो काम मिलेगा।

 उत्तर प्रदेश में इस वित्तीय वर्ष में महात्मा गांधी के नाम की 3606.79 करोड़ के बजट की इस महत्वाकांक्षी योजना की तस्वीर यह है कि अभी तक 2371.65 करोड़ रुपये खर्च हो गये हैं लेकिन 294620 कामों में से सिर्फ 162862 काम पूरे हो पाये हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक लूट खसोट करने वालों का संजाल फैला है और तिकड़म से गरीबों की रोजी मारी जा रही है। गोरखपुर-बस्ती मण्डल के सातों जिलों में 55 हजार से अधिक परिवारों के जाब कार्ड पर लगभग 68 हजार लोग काम के अधिकारी हैं लेकिन किसी दिन चार फीसदी से अधिक लोग काम नहीं पाते हैं। कमिश्नर पी.के. महान्ति ने बार बार मातहतों को चेतावनी दी है लेकिन यह सही है कि योजना की पारदर्शिता कायम नहीं हो पायी है।

3 टिप्‍पणियां:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

नरेगा से लूट की यह कहानी तो गाँव-गाँव की है| मेरे गाँव के कुछ पढ़े-लिखे युवकों ने इस अन्धेरगर्दी के खिलाफ आवाज उठायी तो प्रधान जी ने उनके ऊपर हमला करा दिया। जुझारू नौजवानों ने हार नहीं मानी। सीडीओ साहब के खिलाफ़ ही जाँच बैठ गयी। प्रधान जी की शक्तियाँ छीन ली गयी। ऑउटलुक पत्रिका ने सचित्र समाचार प्रकाशित किया। खूब बवाल मचा था। लेकिन सारा बुलबुला कुछ दिन बाद बैठ गया।

आज वही प्रधान जी कोर्ट से स्टे लेकर बहाल हो गये हैं। दलित सरकार में दलित प्रधान का कोई क्या बिगाड़ सकता था। जो लाखो डकार चुके थे उसमें से कुछ ऊपर पहुँचा आये। कोर्ट में तगड़ा वकील रख लिया। बेरोजगार नौजवान चन्दा जुटाकर और घर का गेंहू बेचकर कितना लड़ पाते?

नतीजा- वही ढाक के तीन पात। लूट खसोट चालू आहे...।

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

बहुत जरूरी है नरेगा का सच भी सामने आये ताकि यह योजना अपनी पूरी उपयोगिता के साथ क्रियान्वित होवे..

हरि जोशी ने कहा…

हर सरकारी योजना का यही हश्र होता है। टैक्‍स पेयर के पैसे को लूटा और लुटाया जा रहा है। नरेगा भी ऐसी ही एक योजना है। योजना केंद्र की और लागू राज्‍य सरकार को करना होता है। अंत में सारी कमान नौकरशाहों पर आ जाती है और इस तंत्र में प्रधान, प्रमुख और इस मशीनरी के पुर्जे माल चट कर जाते हैं।

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