24/03/2009

लोकतंत्र का कलेजा छलनी छलनी

aआनंद राय, गोरखपुर
चुनाव का मौसम है और हर तरफ़ एक आग लगी है। राजनीति के मायने बदल रहे हैं। पता नही वे कौन लोग हैं जो लोकतंत्र को अपने आप से जोड़ रहे हैं और उसके सवाल पर वोट मांग रहे हैं लेकिन इस बार तो पूरी तरह साफ़ हो गया है कि स्वार्थ भारी है। किसी के पास कोई मुद्दा नही हैं। किसी के पास कोई नैतिक बल नही है। दल बदलुओं की भीड़ है और शब्दों की जुगाली। बेशर्मी की हद है और ख़ुद की नजरो से भी सामना न कर पाने की बेबसी। पर उम्मीदवार हैं कि उनकी सेहत पर कोई असर नही है। एक से बढ़कर एक। बड़े बड़े वादे और बड़े बड़े दावे। पैसों का भी खूब खेल है। कल तक जिसे गाली देते नही थकते थे उसे भगवान कहने में ज़रा भी संकोच नही है। जिसे सुबह उठकर सलामी बजाने में कोई डेरी नही होती और जिसके सामने पूरी तरह नतमस्तक होते उसके ख़िलाफ़ बोलने में भी कोई संकोच नही है। शर्म उन्हें भले न आ रही हो लेकिन देखने और सुनने वालों की निगाह झुक जाती है।
यह कैसा चुनाव है। यह कैसा लोकतंत्र है। यह तो भारत की तकदीर से खिलवाड़ है। यह तो उनके के लिए अपमान है जिन्होंने अपना सब कुछ लुटा कर देश के लिए कुर्बानी दी। यह तो उनकी मर्यादा पर हमला है जिन्होंने इस देश की मर्यादा बचाई। ताल तिकड़म, हेर फेर, लूट खसोट, धोखा धडी , झूठ फरेब और न जाने कितने उपक्रम हो रहे हैं जिनसे भारतीय लोकतंत्र की आत्मा कराह रही है। जिस दल की राजनीति करते हैं उसी के ख़िलाफ़ षडयंत्र में लगे हैं। जिस दल का झंडा उठाये हैं उसी की सूचनाएँ विरोधी दल को दे रहे हैं। यह लोकसभा का चुनाव है। आने वाले विधानसभा के लिए कई लोग अपनी तकदीर बना रहे हैं। एक तीर से दो दो निशाने साधे जा रहे हैं। इस चुनाव में तो वे बेशर्म भी है जो अपनी ही पार्टी के ख़िलाफ़ झंडा उठाकर विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों को हराते रहे हैं और फ़िर उसी पार्टी की दुहाई देकर चुनाव में खड़े हैं। ये ऐसे तिकड़मी लोग हैं जो वोट के लिए भावनाओं की तिजारत करते हैं। ये अपनी ही पार्टी के लोगों को चुनाव हराते हैं और फ़िर अपने पास से विकल्प देते हैं। पार्टी उनके लिए नही खडी हो तो आंसू बहाते हैं और ख़ुद मौका पड़ने पर पार्टी की पीठ में छुरा भोंकते हैं। ऐसे लोगकी कमी नही है। ये अपनी कही हुई बातें याद भी नही रखते। अगर इन्हे कुछ याद दिला दीजिये तो फ़िर आपसे बड़ा इनका दुश्मन दूसरा कोई नही है। ये लोग तो वक्त के साथ अपना चेहरा बदल लेते हैं। वक्तके साथ इनका व्यवहार बदल जाता है। वक्त के साथ इनकी नजाकत बदल जाती है। आख़िर ऐसे लोगों के भुलावे में जनता क्यों आती है। यही वक्त का सबसे बड़ा सवाल है और जनता को इस सवाल का जवाब खोजना ही होगा वरना दल बदलुओं और अवसर वादियों से लोकतंत्र का कलेजा छलनी छलनी हो जायेगा। हाथ से रेत की तरह सब कुछ फिसल जायेगा और हम देखते रह जायेंगे।

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