11/10/2009

उगने के साथ-साथ बिखरता रहा हूँ मैं

आनन्द  राय, गोरखपुर:





          स्वाइन फ्लू बीते दिनों सुर्खियों में था. अब भी है. पर पहले जैसी दहशत नहीं है. अखबार से लेकर चैनलों तक बस यही एक बीमारी थी. इससे मरने वालों की गणना करते मीडियाकर्मी कितने संवेदनशील थे मैं बता नहीं सकता. हां मन जरूर कचोटता था कि कोई भी, किसी माँ का बेटा है, किसी का भाई है, किसी का सुहाग है.......बस ऐसे ही. इस संवेदना का ख्याल आते हमारे दिल दिमाग में उत्तर प्रदेश के उस इलाके की तस्वीर ताजा हो जाती जहां के नौनिहाल पिछले ३१ वर्षों से हर साल मस्तिष्क ज्वर की चपेट में आकर काल कवलित हो रहे हैं . इस बीमारी से अब तक बीस हजार से अधिक बच्चे मौत की नींद सो चुके हैं. जो मस्तिष्क ज्वर के कहर से बच गए उनकी जिन्दगी तो दुखों का पहाड़ बन गयी है. पता नहीं क्यों सरकार या और भी तमाम जिम्मेदार लोग इस गंभीर बीमारी को लेकर गंभीर नहीं हो पाए हैं. बरसात के बाद हर साल गोरखपुर के मेडिकल कालेज में मस्तिष्क ज्वर से प्रभावित बच्चों की कतार लगती है और हरदिन मरने वालों की संख्या गिनी जाती है. ३१ वर्षों से इस आंकडे का वजन बढ़ता जा रहा है. स्वाइन फ्लू पर सरकार जितनी गंभीर हुई, यहाँ से लेकर अमरीका तक जितनी तेजी दिखाई गयी, काश उसका एक अंश मस्तिष्क ज्वर के लिए भी सोचा गया होता.
           मेरे एक जानने वाले हैं. प्राथमिक विद्यालय में हेड मास्टर हैं. उनकी पत्नी एक सरकारी दफ्तर में कलर्क हैं. अब रात को उन्हें नींद नहीं आती है. सबसे बड़े बेटे को देखकर उन सबकी आँखे पल पल गंगा यमुना हो जाती हैं. १४ साल का बेटा है जो पिछले ६ साल से विस्तर पर पडा है. मस्तिष्क ज्वर से प्रभावित वह बच्चा कंकाल बन चुका है. अपनी दैनिक क्रिया भी नहीं कर पाता. इस कहर से पता नहीं कितने बच्चे और उनके माँ बाप सिसक सिसक कर जी रहे हैं. इसके कुछ सरकारी आंकडे जरूर हैं लेकिन गोरखपुर मंडल से लेकर बिहार और नेपाल के कुछ हिस्सों में अनगिनत बच्चे हैं जिनके हाथों से पतंग की डोर छूट गयी है. जो अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेलते हुए धमाचौकडी करना भूल गए हैं. अब उनकी किलकारियां नहीं गूंजती. अब उनके होठों की मुस्कान पर पहरा लग गया है. नियति के क्रूर मजाक और निजाम की लापरवाही से वे दया के पात्र हो गए हैं. दया भी गली मुहल्ले के उन लोगों की, जिनकी संवेदना बच्चे के ही नहीं माँ बाप के दर्द को भी बढ़ा देती  है.

                           मस्तिष्क ज्वर के कीटाणु खून में मच्छर काटने से  प्रवेश करते हैं. जलभराव मच्छरों को पलने बढ़ने का वातावरण देता है. पूर्वांचल का यह इलाका बरसात के पानी से, नहरों के पानी से और नाली नाबदान के पानी से हमेशा भरा रहता है. मस्तिष्क ज्वर के ज्यादातर शिकार छोटे बच्चे होते हैं. १४साल तक के बच्चों को ख़तरा ज्यादा रहता है. इस बीमारी से जो बच्चे बच जाते हैं उनका स्नायु तंत्र गडबडा जाता है. ये बच्चे जिन्दगी भर के लिए मानसिक रूप से विकलांग हो जाते हैं. यकीनन काँटों का इतिहास भी उतना ही कदीम होगा जितना फूलों का, लेकिन इसके दर्द की शिद्दत किसी को तभी जान पड़ती है, जब कोई इसे अपने बदन पर झेलता है. वे बच्चे जो मानसिक विकलांग होकर विस्तर पर पड़े हैं, उनकी व्यथा जाननी हो तो उनके माँ बाप की आँखों में झांकिए. रात और दिन एक किये बेचैनी के आलम में वे सब उस मनहूस घड़ी को कोसते हैं जब उनके बेटे को जापानी बुखार ने दबोच लिया. जापनी बुखार यानी मस्तिष्क ज्वर का अंतहीन सिलसिला जारी है. बच्चे हर रात तड़पते रहते और उनकी माएं भी तड़प के साथ जागा करती. किसे ख्याल है कि पूर्वांचल के बहुतेरे घरों से रात को सिसकियों की गूँज आखिर क्यों सुनाई देती है. जिस लाल के  जन्म लेने पर सोहर गाती महिलायें खूब आशीष नवाजती थी, वही लाल दुनियावी जद्दोजहद में अपनी ही साँसों से जूझ रहा है. कई बच्चों को देखा उनकी चेतना काम नहीं करती पर उनकी आँखे कुछ टटोलती रहती हैं . मानो वे आँखों ही आँखों में पूछ रहे हों- हमसे का भूल हुई जो इ सजा हमका मिली.
              निदा फाजली ने अपने जीवन के किन लम्हों में अक्षर अक्षर जोड़ कर यह इबारत बनायी लेकिन दर्द के मारे इन बच्चों के लिए बहुत सटीक जान पड़ती है-

                                   देखा गया हूँ मैं, कभी सोचा गया हूँ मैं.
                                   अपनी नजर में आप तमाशा रहा हूँ मैं.
                                   मैं मौसमों के जाल में जकडा हुआ दरख्त.
                                  उगने के साथ-साथ बिखरता रहा हूँ मैं.

 रोज सुबह होती है, शाम हो जाती है और फिर दूसरा दिन शुरू हो जाता है. हम सब इस रोग से मरने वालों की संख्या गिन कर एक हल्की सांस लेकर रह जाते हैं. तीन दशकों से यूं ही वक्त गुजर रहा है. सियासी बाजीगर संजीदा नहीं हैं.  रिश्तों की आहट तो पता नहीं कबसे सुनाई देनी बंद हो गयी है. और रिश्ता भी कैसा. ये बच्चे तो उन घरों के हैं जहां सूरज की रोशनी भी नहीं जाती.

5 टिप्‍पणियां:

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

....मुझे तो सहसा विश्वास नहीं होता,,कि इतनी संवेदनशीलता कैसे है आपके पास,,एक पत्रकार जिसका पूरा दिन ही जाने कितने खबरों की क़तर-व्योंत में जाता है,,इस बीच संवेदना कैसे बचा लेते हैं आप....श्रीमन आपको बधाई......

पूर्वांचल के जो लाल इस बीमारी से काल-कवलित हो गए, शायद थोड़े से अंश में ही सही पर जिम्मेदार मीडिया भी है,,'जो हिट है वो फिट है'..ये ही तो चलता है लगभग.....

संगीता पुरी ने कहा…

एक ही क्षेत्र के इतने लोग मेननजाइटिस से प्रभावित होते होंगे .. इसकी जानकारी नहीं थी हमें .. एक संपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित की है आपने .. बहुत सही है आपके विचार !!

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन आलेख!!

हर्षवर्धन ने कहा…

आनंद जी बहुत जरूरी है कि इन मुद्दों पर जनजागरण जैसी चीज हो और ऐसी बीमारियों का भी इलाज ढूंढ़ा जा सके।

Manish Kumar ने कहा…

झारखंड मे भी ये बीमारी रह रह कर सर उठाती रही है। आशा है आपके लेख से इस बारे में लोगों का ध्यान जाएगा।

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