08/10/2009

फिर कोई मिर्जा, कोई माजिद पैदा कर देंगी भारत विरोधी ताकतें

 आनन्द  राय, गोरखपुर




 माजिद मनिहार कौन है. यह सवाल बहुत से लोगों ने तब पूछा जब उसकी मौत हो गयी. नेपाल के एक होटल के कमरे में उसे मौत की नीद सुला दी गयी. माजिद नेपाल में रहकर जाली नोटों के कारोबार, अंडरवर्ल्ड के हथियार और आई एस आई के खिलौने के रूप में काम कर रहा था. उसके मरने के बाद यह भी पूछा जाने लगा कि उसे किसने मारा है. कुछ पत्रकार साथियों ने अटकलें भी लगाई. कुछ ने दावे भी किये. कुछ ने भरोसे का हवाला दिया. खैर अपराध की राह पर चलने वालों का जो हश्र आज तक होता आया है, उसका भी वही हश्र हुआ.
        माजिद के बारे में जहां तक मैं सोचता हूँ तो उसे सोचने के लिए माजिद के ही गुरू मिर्जा दिलशाद बेग की याद ताजी हो जाती है. मिर्जा दिलशाद बेग गैराज मिस्त्री था. उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के एक गाँव से उठकर वह नेपाल के कृष्णानगर तक पहुंचा. पहले चोरी की गाड़ियों की खरीद फरोख्त शुरू की और बाद में इस पेशे में वह छा गया. उसे राजनीतिक सरंक्षण भी मिले और देखते ही देखते एक दिन वह नेपाल की सियासत का अहम् शूरमा बन गया. नेपाल सरकार में मंत्री बनने का सौभाग्य भी मिला. मिर्जा १९९८ में एक दिन काठमांडू में मारा गया. मिर्जा के जिंदा रहते ही माजिद का नेपालगंज में ठीक ठीक प्रभाव होने लगा था. उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के भिनगा इलाके के रहने वाले माजिद ने भी एक कपडे की दूकान में नौकर बनकर अपना कैरियर शुरू किया. नेपालगंज में दो दशक में उसकी तूती बोलने लगी. जब मिर्जा मारा गया तब यह सवाल उठा कि अब मिर्जा के बाद सरगना कौन! जाहिर है इसके लिए कोई ताजपोशी नहीं हुई लेकिन माजिद के हाथों में काले कारोबार का रिमोट आ गया. माजिद लोगों की निगाह में था. एक तरफ भारतीय खुफिया एजेंसियां उसे तलाश रही थी तो दूसरी तरफ कुछ पेशेगत दुश्मन उसकी फिराक में थे. मिर्जा की तरह वह भारतीय अपराधियों में लोकप्रिय बनने की जुगाड़ में हमेशा रहता था इसलिए माओवादी भी उस पर टेढी नजर रखते थे. हो सकता है वह इनमे से ही किसी की गोली का निशाना बना हो. यह भी हो सकता है कि कोई उसका ऐसा दुश्मन हो जो बहुत मामूली हो और अब उभर जाए. क्योंकि माजिद के एक साथी हारून खान को भी गोली लगी है. भारतीय मूल का हारून अगर बच जाए तो उसकी भी बंदूकें गर्जेगी. क्यूंकि वही जानता है कि हमलावर कौन हैं. जरायम की बादशाहत भी उसकी ही होनी है. इसलिए अभी से यह कह देना कि माजिद को किसने मारा, थोड़ी जल्दबाजी होगी.
        माजिद को लेकर जो सबसे ख़ास बात मेरे मन में गूँज रही है, वह यह कि क्या माजिद जैसे बेरोजगार ही नेपाल में जाकर अपराध की बादशाहत हासिल करेंगे. मिर्जा हो या माजिद, क्यों इन्हें दूसरी धरती पर वह ताकत मिल जाती है जो अपनी धरती पर नहीं मिलती. ऐसा कौन सा हुनर परवान चढ़ जाता है कि दूसरे मुल्क में इनकी दहशत चलने लगती है. इनका सिक्का चलने लगता है, इनकी तूती बोलने लगती है. असल में मिर्जा और माजिद जैसे शातिर, फुर्तीले और सुगठित लोगों के तेवर पर उनकी कद्र होती जो भारत विरोधी अभियान के लिए इन्हें इस्तेमाल करना चाहते हैं. कंधा इनका होता, बन्दूक कोई और रखता, निशाना कोई और लगाता है. मुझे याद है जनवरी १९९३ में गोरखपुर के मेनका टाकीज में नाना पाटकर की तिरंगा फिल्म लगी थी. उस दिन सिनेमा हाल में भीड़ भी खूब थी. २३ जनवरी को अचानक विस्फोट हुआ और दो लोग मारे गए. इस विस्फोट में मिर्जा और गोरखपुर के गामा का नाम आया. यह विस्फोट आई एस आई के इशारे पर हुआ था. तब देश में हिन्दू मुस्लिम राजनीति खूब हो रही थी और लोग जलते हुए देश में अपने हाथों से हवन कर रहे थे.
                 दरअसल मिर्जा को मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किया गया. उसके काम को यहीं के गामा ने दिया. गामा भी अचानक मारा गया. कुछ लोग कहते हैं कि मिर्जा को गामा से ख़तरा हो गया था. उसकी लोकप्रियता नेपाल में बढ़ रही थी. कुछ लोगों को अंदेशा है कि गामा अपने कुछ साथियों की गद्दारी का शिकार हो गया. बहरहाल मेनका बम काण्ड में गोरखपुर के जिलानी समेत कई अभियुक्त बनाए गए. इस मामले में मिर्जा को यहाँ की पुलिस तलाश रही थी. पर वह कभी हाथ नहीं आया. एक बार तो कुशीनगर में इंडो-नेपाल बार्डर के अधिकारियों की बैठक हो रही थी. तब वहां के एक अहम् पुलिस अधिकारी थापा से हमने पूछा कि एक तरफ आप लोग दोनों देशों की मित्रता के लिए बैठकें करते हैं और दूसरी तरफ मिर्जा दिलशाद बेग को सरंक्षण देकर भारत विरोधी गतिविधियों में सक्रीय करते हैं तो उनका कहना था कि यहाँ के लोगों ने कभी हमारे देश से मिर्जा को माँगा ही नहीं है.
                    मिर्जा, गामा या माजिद मनिहार जैसे बहुत से लोग हैं जो नेपाल में पनाह लिए हैं और उनमे कई उनकी तरह शूरमा बनने की राह पर हैं. निसंदेह इन पर किसी की ताकत लगती है. मीडिया का बड़ा नेटवर्क चलाने वाला नेपाल सरकार के एक पूर्व अफसर का बेटा, जो जाहिरा तौर पर दाऊद इब्राहिम का पार्टनर भी है. माजिद जैसों को ताकत मुहैया कराकर उन्हें डान के रूप में स्थापित करता है. नेपाल और भारत के बीच पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीमा पर ऐसे बहुत से गाँव हैं जो अपनी गरीबी और रोजमर्रा की जरूरतों में उलझे हैं. इन गाँवों में भले किसी की नजर न हो लेकिन माजिद और हारून जैसे लोगों का डेरा लगता और इन गरीबों के ईमान की परीक्षा लेकर उन्हें अपने मकसद का औंजार बनाया जाता है. बिडम्बना यह है कि भारत के सीमावर्ती गाँवों के विकास की योजनाये मूर्त रूप नहीं पा रही हैं. उनके पैसों की लूट खसोट होती है. माजिद जैसों के मर जाने के भारत की खुफिया एजेंसियां चाहे जितना खुश हो लें, पुलिस को चाहे जितनी राहत मिली हो, अर्थ व्यवस्था को लेकर भले लग रहा हो कि जाली नोटों के कारोबार पर अंकुश लगेगा लेकिन हमें तो यही लगता कि वे ताकतें जो रिमोट अपने हाथ में रखती, फिर कोई माजिद पैदा कर देंगी.

1 टिप्पणी:

वेद रत्न शुक्ल ने कहा…

आपकी चिंता जाइज है। सीमा पर आईएसआई की सक्रियता को भी राज्य और केन्द्र सरकार लगातार नजरअंदाज करती रही हैं। जानकारी भरा आलेख पढ़वाने के लिए धन्यवाद।

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