24/08/2009

हमारी और आपकी साझा आवाज को जरूर समझेंगे


नजीर भाई ने मुझे मेल से एक पत्र भेजा है। दरअसल हमारी एक पोस्ट पर सिद्धार्थ भाई ने एक टिप्पणी दी और नजीर भाई और भावुक हो गए। उन्होंने वसीम वरेलावी की गजल भी भेजी है। मैं उसे पोस्ट कर रहा हूँ ।

भाई आनंद राय,

सिटी की आवाज के लोकार्पण अवसर पर आप आये। आपने बहुत कुछ कहा, बाद में लिखा भी। आपके ब्‍लाग पर सिटी की आवाज के हवाले से बहुत कुछ कहा गया है। जवाब देने का मन हुआ तो लगा शायद हम उन नाकारा पत्रकारांे की जमात में शामिल हैं, जो खुद को वक्‍त के साथ अपडेट नहीं कर पाये। वरना यह बातें कहने के लिए ई'मल क्‍यांे करता। सीधे आर्टिकिल पर टिप्‍पणी भेज देता। बहरहाल हमारे आप जैसे लोग समाज के उस प्रोगेसिव तबके का हिस्‍सा हैं, जो जहां भी जाते हैं, उनके साथ बदनामियों और रुसवाइयों के साये चला करते हैं। यही वजह है कि कभी मुझे मजहब के नाम पर दुखी होना पडता है तो आनंद राय जैसे लोगों को जाति के नाम पर बदनामियों के बोझ उठाने पडते हैं। अच्‍छी बात यही है कि हम मुद़दो और मूल्‍यांे को लेकर जमकर संघर्ष कर रहे हैं। एक दिन हमारा ही होगा। हम रहे न रहें हमारी पी‍ढियां हमें जरूर समझेंगी। जितेन्‍द्र पाण्‍डेय व अजीत सिंह जैसे तमाम अनुज इसे समझने की कोशिश कर रहे हैं, अधिकांश हमारी राह पर हैं, फिर भी तमाम भाई दिग्‍भ्रमित हैं, मगर यकींन है एक दिन वह हमारी और आपकी साझा आवाज को जरूर समझेंगे।

आते हैं असली बात पर आपकी भावनाओं को पढकर लगा कि आप मेरे बारे मंे लिखते हुए कुछ बेइमानी कर गये हैं। मुझे बहुत आदर दे दिया है। सच्‍चाई यह है कि मेरी उम्र बडी है, मगर कद तो आप ही का बडा है। एकाउंट अफसर व छोटे भाई सिद्धार्थशंकर त्रिपाठी ने जो मेरे बारे मे लिखा है, उन्‍हंे वह सब कुछ आपके बारे में लिखना चाहिए था। आपने बडे भाई वसीम बरेलवी की जिस गजल की पेशकश की है, दरअसल वह हिन्‍दुस्‍तान की वाहिद ( अकेली) गजल है जो हमारे आप जैसे लोगों के जज्‍बातों की तरजुमानी ( प्रतिनिधित्‍व) करती है। यह गजल योगी ही नहीं रोगी और भोगी को भी आगाह करती है, यह अलग बात है कि इस गजल को हिन्‍दुस्‍तान के 118 करोड लोगांे को पढा दी जाये तो भी जो योगी है, रोगी है, भोगी है, वह नही सुधरेगा, मगर कोशिश तो जारी रहनी ही चाहिए। पेश है आपकी मांगी गजल

' अपने चेहरे से जो जाहिर है, छुपाएं कैसे,

तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे।

घर सजाने का सलीका तो बहुत बाद का है

पहले तो यह तय हो इस घर को बचाएं कैसे।

लाख तलवारे बढी आती हैं, गरदन की तरफ,

सर झुकाना नहीं आता, तो झुकाएं कैसे।

कहकहा आंख का बरताव बदल देता है,

हंसने वाले तुझे आंसू नजर आएं कैसे।

फूल से रंग जुदा होना हंसी खेल नहीं,

अपनी मिटटी को भला छोडकर जायें कैसे।





नजीर मलिक

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस बढ़िया नज्म को पढ़वाने के लिए आभार।

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