04/07/2009

बेटे की शहादत ने नहीं सरकार ने रुला दिया


आनन्द राय, गोरखपुर

केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल में दरोगा रहे देव शरण पाण्डेय ने 1962 में एक गोली एक दुश्मन की ट्रेनिंग ली। मातृभूमि की रक्षा में उनके कितने साथियों की जान गयी और कितने दुश्मनों को उन्होंने निशाना बनाया, इसकी गिनती उन्हें याद नहीं है। इतना भर याद है कि जब इन्दिरा गांधी ने पाक के खिलाफ मोर्चा खोला तो अरगतला से ढाका तक उन्होंने पैदल मार्च किया। राजीव गांधी ने जब श्रीलंका में शांति सेना भेजी तो वे जाफना भी गये। 12 साल तक श्रीनगर में सरहद की हिफाजत करते रहे। जो काम वे नहीं कर पाये उनके बेटे संतोष ने कर दिखाया। 9 साल पहले श्रीनगर डलगेट पर आतंकवादियों से मुठभेड़ करते हुये उनके बेटे ने अपनी शहादत दे दी। बेटे की शहादत पर देवशरण नहीं रोये लेकिन सरकारी रवैये ने उन्हें रुला दिया है। इसके बावजूद वे अपने दूसरे बेटे को सेना में भेजना चाहते हैं ताकि उनका खून मातृभूमि के काम आ सके। गोरखपुर जिले का हरदिया गांव फौजी हनक से लबरेज है। इसी गांव में देवशरण पाण्डेय का घर है। शहीद बेटे की बहादुरी और सरकारी आश्र्वासनों के इंतजार में वे अपना दिन काट रहे हैं। कुछ भी कहने से पहले यह कहना नहीं भूलते कि अगर अब भी सरकार उन्हें सरहद पर भारत की रक्षा के लिए बुलाये तो हर गोली से एक दुश्मन मारेंगे। 18 सितम्बर 2000 को 92 बटालियन सीआपीएफ में तैनात उनके बड़े बेटे संतोष पाण्डेय की डलगेट पर आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान मौत हो गयी। उस समय देवशरण की तैनाती त्रिपुरा में थी। देश की रक्षा के लिए बेटे की शहादत ने उनका सीना गर्व से चौड़ा कर दिया। बेटे की शहादत को सलामी देने अपने गांव लौटे तो पूरा प्रशासनिक अमला उनका इंतजार कर रहा था। प्रशासन ने उनका मान बढ़ाया और सरकार की ओर से वादों की झड़ी लगा दी। उन्हें पेट्रोल पम्प या गैस एजेंसी देने, घर तक सीसी रोड बनाने, शहीद के भाई को स्पोर्टस कालेज में नि:शुल्क पढ़ाई करवाने और शहीद के नाम पर स्कूल खोलने की घोषणा कर दी गयी। प्रशासन की ओर से जब यह बात कही गयी तब प्रदेश सरकार के मंत्रियों के साथ ही कई प्रमुख राजनीतिक लोग भी मौजूद थे। देवशरण पाण्डेय कहते हैं कि हमने एजेंसी के लिए सभी औपचारिकता पूरी करके फाइल भेजी लेकिन वह वापस लौट आयी। सड़क आज तक नहीं बनी। छोटे बेटे को स्पोर्टस कालेज भेजने के लिए कोई सहायता नहीं मिली। और सबसे दुख की बात यह कि गांव के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय की दीवारों पर शहीद बेटे का नाम लिखवा दिया गया लेकिन कागज में ये विद्यालय अभी भी उनके नाम पर नहीं है। देवशरण पाण्डेय कहते हैं कि मैं स्वार्थी नहीं हूं। मैं तो अपने दूसरे बेटे को भी भारत मां की हिफाजत के लिए सेना में भेजना चाहता हूं। पर दुख तो इस बात का है कि सरकार उन जवानों के साथ छल करती है जो सरहद की रखवाली के लिए अपने प्राणों की आहुति देते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और रक्षा मंत्री समेत कई प्रमुख लोगों को पत्र भी लिखा है लेकिन अब सरकार से उन्हें कोई आस भी नहीं है।

3 टिप्‍पणियां:

गिरिजेश राव ने कहा…

यह उपेक्षा और अपमान हमारे भ्रष्ट तंत्र के आवश्यक अंग हैं। आश्चर्य नहीं होता। माया तो पता नहीं किन किन के नाम हजारों करोड़ फूँकने में लगी हैं। आँख में खर पड़ गया है, निकट का सच नहीं दिखता।

गाँव वाले क्या कर रहे हैं? गरीब ही सही कुछ तो करें।

वेद रत्न शुक्ल ने कहा…

Aapki is Khabar ko Jagran.com par padha, tab socha jaane kisne likha hai. Bada hi marmik. jhakjhorne wala. Blog par aaya to pata chala ki Aapka lekhan hai. Badhai nahi Dhanyavaad is Khabar ke liye, ek cheej thodi kam lagi. Agar Shahadat ke baad Fashion ke taur par Ghadiyali Aansoo bahane jo neta pahuche the agar seedhe unka naam likhkar benaquaab kar diye hote to bada achha hota. Haalanki wahan bada chutila vyangya kiya hai Aapne. Ek baar fir se Dhanyavaad.

Nirmla Kapila ने कहा…

नमन है उन् शहीदों को अर उनके माँ बाप को् हमारे भीेक करीबी की यही दुख से भरी दास्तान देख चुकी हूम्म इस लिये आश्चर्य नहीं हुआ मगर क्या किया जा सकता है इस भ्रश्ट तंत्र का आभार्

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