01/07/2009

एड्स के क्रूर पंजों से लड़ रहा जिंदगी की जंग


आनन्द राय, गोरखपुर

एड्स के रोगी अपने रोग से कम समाज की चुभती निगाहों से रोज रोज मरते हैं। मगर सत्ताइस साल का हरेन्द्र एड्स के क्रूर पंजों से जिदंगी की जंग लड़ रहा है। अपनी जिंदगी के अंधेरे में अलख जगाने की उसकी मुहिम जारी है। उसके कंधों पर बूढ़े मां-बाप के साथ ही बेरोजगार भैया-भाभी और 13 साल के एक भतीजे की परवरिश की जिम्मेदारी है। एक तरफ वह अपनी सांसे सहेज रहा है और दूसरी तरफ घर और समाज की चुनौतियों का हिम्मत से मुकाबला कर रहा है। वह एड्स के खौफ से तिल तिल कर मरने वालों के लिए सबक बनना चाहता है। गोरखपुर जिले के बांसगांव विकास खण्ड के बघराई गांव के 27 वर्षीय हरेन्द्र उर्फ मिण्टू की जिंदगी कई झंझावातों में उलझी हुई है। उसका पूरा परिवार दुखों की एक दास्तान है। एड्स रोगी के रूप में हरेन्द्र का सफर कुछ साल पहले शुरू हुआ लेकिन उसके पहले भी कभी उसके हिस्से में सुख नहीं आया। होश संभाला तो गरीबी की आंच ने तपा दिया। फिर कुछ ऐसे गम मिले जिसकी आंच में उसका मोम का कलेजा पत्थर की तरह मजबूत हो गया। हरेन्द्र के सबसे बड़े भाई शेषनाथ मुम्बई में नौकरी करते थे। 13 साल पहले अचानक लापता हो गये। उसने भाई की तलाश शुरू की तो मुम्बई की गलियों में उलझ गया। पता नहीं किस कोने से अपने लिए एक जंजाल उठा लाया। छोटी उम्र में विक्रौली, भिवण्डी, थाने.. और किस किस ओर भटका। भाई नहीं मिला। हरेन्द्र घर लौट आया। गांव में मां-बाप, भैया-भाभी और लापता सबसे बड़े भाई शेषनाथ की पत्नी सरोजा देवी और उनके एक बेटे को पालने की चुनौती सामने खड़ी थी। उसने यह सब बर्दाश्त कर लिया लेकिन भाभी सरोजा की पहाड़ जैसी जिंदगी चुभने लगी। हरेन्द्र ने वर्ष 2003 में घर परिवार और समाज की मर्जी से सरोजा देवी से शादी कर ली। दुख तो उसके साथ साथ चल रहे थे। कुछ समय तक पति पत्नी के रूप में हरेन्द्र और सरोजा के दिन चैन से बीते लेकिन नियति को यह भी मंजूर नहीं हुआ। पति और पत्नी दोनों बीमार रहने लगे। बीएचयू में इलाज कराने पहंुचा तो पता चला कि उन दोनों को एड्स है। चार माह पहले अचानक एक दिन सरोजा देवी चल बसी। पत्नी की मौत ने हरेन्द्र को तोड़ दिया लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। एड्स के खौफ से तिल तिल कर मरने की बजाय उसने जिदंगी का रास्ता चुना। नियमित इलाज के साथ ही दोनों वक्त योग करने लगा। उसने ठान ली कि जब तक जिदंगी है तब तक शान से जियेंगे। गांव की सड़क पर गुमटी में पान और जनरल मर्चेट की दुकान खोल दी। हरेन्द्र ने किसी से अपना रोग छिपाया भी नहीं। पूरी जिंदादिली के साथ वह एड्स के खौफ से डरने वालों को नसीहत देने लगा। चेहरे पर छा गये दुखों के बादल को उसने अपनी हंसी से पिघला दिया। हरेन्द्र की जिंदगी और उसके दुखों को जानने वालों की आंखें भले नम हो जाये लेकिन अब उसकी मुस्कान पर कोई फर्क नहीं है। इलाज में पैसे खर्च हो रहे हैं लेकिन अपनी मेहनत से वह पाई पाई जोड़ रहा है। आर्थिक तंगी है फिर भी घर परिवार का बोझ उठाते हुये उसने एक नयी लकीर खींच दी है। कहता है- वैसे भी एक दिन सबकी जिदंगी की डोर टूट जानी है तो जब तक जियो जीने का अहसास रहना ही चाहिये। हरेन्द्र के साथ समाज की सहानुभूति है तो ताने भी। कुछ उससे जलते हुये सवाल करते हैं। कैसे एड्स हुआ । हमदर्दी की बजाय फिकरे कसते हैं। हरेन्द्र सिर्फ यही कहता कि सीरिंज से हो गया लेकिन उसे किसी फिकरे की परवाह नहीं है। उसे भीख की तरह मिलने वाली दया भी मंजूर नहीं है। वह तो अपने हौसलों के बल पर अपनी जिंदगी का सफर पूरा करना चाहता है।

1 टिप्पणी:

संगीता पुरी ने कहा…

प्रेरणास्‍पद आलेख .. पर हमारा समाज कब बदलेगा ?

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