02/06/2009

औद्योगिक इकाइयों की गटर बनी सहायक नदियां



आनन्द राय गोरखपुर :

पूर्वाचल की सभी सहायक नदियां औद्योगिक इकाइयों और विभिन्न कस्बों के सीवर से निकले अपजल के चलते प्रदूषित हो गयी हैं। इनके प्रदूषण ने जन जीवन अस्त व्यस्त कर दिया है। कई नदियों को औद्योगिक इकाइयों ने अपना गटर बना लिया है। आमी नदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के सरयूपार मैदान में बड़ी नदियों की सहायक नदियां मंद गति से बहती हैं। पहले इन छोटी नदियों का जल निर्मल और शीतल था लेकिन अब वे दिन हवा हो गये हैं। इनमें बहने वाला मीठा जल जहरीला हो गया है। यहां आमी, मनोरमा, कठिनइया, बूढ़ी राप्ती, बानगंगा, घोघी, रोहिन, गोर्रा, मझना, तरैना, बांसी, वाणी जैसी नदियों के साथ हमारा गौरव जुड़ा है। बस्ती में हरैया के पास बहने वाली मनोरमा नदी जहां दशरथ के पुत्र कामेष्टि यज्ञ की साक्षी है तो कुशीनगर जिले की बांसी नदी जनकपुर से शादी करके लौट रहे भगवान श्रीराम के बारातियों को एक दिन अपने तट पर आश्रय देने वाली है। अतिक्रमणकारियों ने बांसी नदी की सूरत बिगाड़ दी है। आलम यह है कि नदी निरंतर पट रही है और एक इतिहास विलुप्त होने के कगार पर है। प्रशासन इस नदी की ओर से बेखबर है। देवरिया जिले के रुद्रपुर तहसील में गोर्रा नदी, बथुआ और मझना नाला भी सरकारी उदासीनता का शिकार हो गया है। इन छोटी नदियों के तट पर रहने वाले लोग इनकी दम तोड़ती स्थिति से हलकान हैं। सर्वाधिक त्रासद स्थिति तो राप्ती के छाड़न से निकली आमी नदी की है। सिद्धार्थनगर जिले के सोहनारा से निकलकर गोरखपुर जिले के सोहगौरा में 80 किलोमीटर के सफर के बाद मिलने वाली इस नदी का अस्तित्व मिटने के कगार पर है। इस नदी को गटर बना दिया गया है। इसके बदबू और प्रदूषण से तटवर्ती सैकड़ों गांवों के लोग अपना घर छोड़ने पर मजबूर हो गये हैं। हालांकि पिछले पांच महीने से आमी नदी की मुक्ति को लेकर सिलसिलेवार आंदोलन चल रहा है। आमी बचाओ मंच ने अपने आंदोलन की गति तेज की है लेकिन दूसरी किसी भी नदी के लिए कोई कारगर पहल नहीं हुई है।

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