20/06/2009

संजीव चतुर्वेदी के जज्बे को बार बार सलाम

भारतीय वन सेवा २००२ बैच के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के जज्बे को सलाम। पर्यावरण की रक्षा और जीवों की सुरक्षा के लिए इस अफसर ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। अपने तेवर , जूनून और जिद से उन्होंने हरियाणा सरकार को भी झुकने पर मजबूर कर दिया। संजीव ने हार नही मानी। उन्होंने वन माफियाओं की ऐसी की तैसी कर दी। उन्हें इस वर्ष का मंजूनाथ स्मृति पुरस्कार मिला है। यह पुरस्कार उनके लिए प्रेरणा का सबक है और मन में विश्वास जगाने वाला एक हथियार। निसंदेह अच्छे कामों के लिए और कोई साथ हो या न हो अच्छे लोग जरूर रहते हैं।
एक शेर है-
हर नमाजी शेख पैगम्बर नही होता,
जुगनूओं का काफिला दिनकर नही होता
यह सियासत एक तवायफ का दुपट्टा है
यह किसी के आंसुओं से तर नही होता।
यकीनन संजीव को यह फलसफा मालूम था। उन्हें यह भी मालूम था की सरकार के आगे आंसू बहाने और फरियादी बन जाने से कुछ नही होगा इसलिए उन्होंने एक लम्बी लड़ाई लड़ी।
बात उन दिनों की है जब संजीव कुरूक्षेत्र में वन मंडल अधिकारी थे, तब निजी ठेकेदारों ने सरस्वती वन जीव अभ्यारण्य में हिरन की दुर्लभ प्रजाति का शिकार और वन की अवैध कटाई शुरू की थी। यह सिलसिला काफी पुराना था और इसमें बड़े बड़े लोग शामिल थे। संजीव ने इस पर अंकुश लगाने का काम शुरू किया। कानून के दायरे में रहकर इस अफसर ने माफियाओं की ऐसी की तैसी कर दी। फ़िर क्या था सब एक जुट हो गए। संजीव का तबादला फतेहाबाद कर दिया गया। यह तैनाती सजा के तौर पर थी लेकिन इसे उन्होंने बड़ी सहजता से लिया और फतेहाबाद में भी अपना अभियान जारी रखा। बस सरकार में बैठे लोगों को लगा यह तो आग है। छुटकारा पाने के लिए उन्हें निलम्बित कर दिया गया। २००७ में संजीव को बिना कारण बताये निलम्बित किया गया। निलंबन आदेश में स्पष्ट कारण का उल्लेख न होने से संजीव की त्योरी चढ़ गयी। उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत निलंबन की वजह जानने के लिए अर्जी डाली लेकिन सरकार ने इसे खारिज कर दिया। संजीव ने महामहिम राष्ट्रपति के यहाँ बात की । २००८ में उन्हें राहत मिली जब महामहिम के हस्तछेप पर उनका निलंबन रद्द कर दिया गया। इसके छह माह बाद तक उन्हें कोई तैनाती नही दी गयी और अब झझर में वे तैनात हैं।
मूलतः देवरिया जिले के गौरी बाजार इलाके के बलियांवा गाँव निवासी संजीव चतुर्वेदी की ईमानदारी और कर्तव्य निष्ठा की गूँज पूरे देश में सुनाई पड़ रही है। इसीलिये जब उन्हें इस वर्ष का मंजूनाथ स्मृति पुरस्कार दिया गया तो सिर्फ़ उनका ही नही ईमानदारी से काम करने वाले हर अफसर का हौसला बढ़ गया। इंडियन आयल कारपोरेशन के अधिकारी मंजूनाथ को कौन नही जानता। २००५ में पेट्रोल में मिलावट करने वालों के ख़िलाफ़ जब उन्होंने अभियान चलाया तो अपराधी तत्वों से उनकी ह्त्या करा दी गयी। उनकी ह्त्या के बाद भारतीय प्रबंध संसथान के छात्रों ने मिलकर मंजूनाथ ट्रस्ट की स्थापना की और उनकी स्मृति में यह पुरस्कार शुरू किया। संजीव को ही नही पूर्वांचल को भी इस बात का फख्र है की इस माटी के लाल ने अपने फर्ज के लिए सब कुछ कुर्बान करने का जज्बा रखते हुए सच का साथ निभाया। इसलिए संजीव के जज्बे को बार बार सलाम।

4 टिप्‍पणियां:

shubhi ने कहा…

हमारी भ्रष्ट नौकरशाही के लिए यह मिसाल की तरह है।

Vivek Rastogi ने कहा…

वाकई बहुत दबंगता के साथ अपने अधिकारों का उपयोग करने वाले अधिकारियों के साथ ऐसा ही होता है। क्योंकि सब जगह चोर बैठे हैं।

बी एस पाबला ने कहा…

मंजूनाथ व सत्येंद्र के साथ-साथ अन्य अज्ञात शहीदों की शहादत बेकार नहीं जाती दिख रही।

बेशक ज़रूरत है ऐसे लोगों की, किन्तु हम अपने स्तर पर क्या करते हैं?

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत ही प्रेरक पोस्ट है।सच है यदि कोई ठान ले तो क्या नही कर सकता।आभार।

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