08/09/2008

अब गंदा हो गया है राप्ती का पानी


गोरखपुर शहर राप्ती नदी के किनारे पता नही कबसे बसा है. इसी नदी के तट पर गुरू गोरक्षनाथ ने धुनी रमाई. इस शहर को सवारने में पता नही कितने संत और महात्माओ ने अपना योगदान दिया. गुरू गोरक्ष और सूफी संत रोशन अली शाह की परम्परा के इस शहर में हमेशा शांति के कबूतर उडते रहे हैं. 1962 में छात्रों के एक संघर्ष में इस शहर ने पहली बार कर्फ्यू का मंजर देखा था. तब राप्ती किनारे मेल्ह्ते हुए इस शहर में जुम्मन और अलगू ने एक दूसरे के घर सब्जी, दाल और नमक भिजवाया. तब इस शहर में सियासत ने फिरकापरस्ती का दामन नही पकडा था. उस दौर की सोचे और आज की सोचे तो बहुत कुछ बदल गया है. अब राप्ती का पानी गंदा हो गया है. अब कोई गोरक्ष यहाँ धूनी रमाने के लिये अपना चिमटा नही गाडता. अब जुम्मन और अलगू गल्बहिया करते चलने की कोशिश जरूर करते लेकिन शहर की फिजा तो पहले जैसी नही है. यह फिजा तो 1965 से ही बदल गयी है. अक्सर किसी न किसी सियासी जरूरतों के लिये अमन खतरे में पड जाता है. इस बार कहानी योगी आदित्यनाथ के ऊपर आज़मगढ़ में हुए हमले से शुरू हुई है. रविवार को एक सभा सम्बोधित करने गये योगी पर हमला हो गया. योगी का कहना है कि उन पर आतंकी हमला हुआ है. बस उसके बाद से शहर का माहौल खराब हो गया है. शहर की फिजा में अशांति का असर है. न चाहते हुए भी व्यापारियो ने अपनी दुकाने बंद कर दी हैं. पूर्वांचल बंद का आह्वान हो गया है. शहर के लोगो को यह डर सता रहा है कि फिर कही कर्फू न लग जाये. 1998 से लेकर अब तक जितनी बार कर्फू लगा उसके लिये योगी ही जिम्मेदार रहे हैं. योगी 1998 से ही इस शहर के सांसद हैं. 1965 में जब कर्फू लगा तब उसके लिये योगी के पितामह गुरू महंत दिग्विजय नाथ महराज जिम्मेदार ठहराये गये. कुछ लोग शहर में कर्फू और दंगे को सियासत से जोड्कर देखते हैं. बताते हैं कि आजादी के बाद जबसे चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई तभी से गोरक्ष मंदिर ने दखल देना शुरू कर दिया. महंत दिग्विजय नाथ ने 1952 में बांसगांव संसदीय सीट से अपनी किस्मत आजमायी. जनता ने उन्हे नकार दिया. फिर 1957 में वे गोरखपुर में चुनाव लडने आये. यहाँ भी उन्हे हार का सामना करना पडा. राजनीति में अपना प्रभाव न होते देख उन्होने हिंदू कार्ड खेला. वैसे भी गांधी की हत्या में उन पर गम्भीर आरोप लगे. सियासत के लिये इस शहर को खांचो में बांट दिया गया. फिर तो हिंदू और मुसलमान की सीमा खिंच गयी. 1965 से ही नफरत की दीवार खडी हो गयी. शाबाशी के हकदार तो आम शहरी हैं जो अमन बचाये हुए हैं वरना योगी तो अपनी उसी विरासत को सम्भाल रहे हैं. हिंदू हितो के नाम पर सियासत की उनकी खेती लहलहा रही है. सात बार कर्फू का दंश झेल चुके शहर को अपनी शांति और उन्नति की चिन्ता है. यह चिंता हर उस शख्स की है जिसने दंगे और फसाद में शहर को जलते हुए देखा है. योगी लोकसभा में बने रहने के लिये कुछ भी कर सकते हैं. उन्हे इस बात की कत्तई परवाह नही कि फसाद होते हैं तो गरीब की जान जाती है. उन पर हमला हुआ तो अमानुलाह नाम का जो मरने वाला है वह रोज मेहनत मशक्कत करके अपना और अपने घर का पेट भरता था. इसके पहले भी गोरखपुर शहर में दंगे के दौरान विनय और साबिर अपनी जान गन्वा चुके हैं. यह कहते हुए कही से मैं इस बात का समर्थन नही कर रहा कि जो आतंकवादी है उस पर कडी कारवाई न हो. उस पर तो कारवाई के लिये मुसलमानो ने भी पहल की है. इस पहल का स्वागत है और उन लोगो से एक अपील है कि अगर किसी से मुल्क को खतरा है तो मिल जुल कर एक लडाई लडी जाय. उन्हे कत्तई न बख्शा जाय जो इस देश की सरहद पर आंख लगाये हैं. लेकिन सियासत के लिये कौम को बांटने वालों को भी कत्तई फसाद करने की छूट न दी जाय. .

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