13/07/2008

तुम कहाँ हो

कभी कभी हाथ से फिसलती हुई रेत की तरह सब कुछ लगता है। दिन महीने साल और फ़िर साल- दर-साल रिश्तों की उम्र। कंही बीच राह में डोर छूट गयी तो ........तो फ़िर नियति को कोसने के अलावा कुछ नही बचता। गुरूवार की मनहूस रात को कुछ ऐसा ही हुआ। बारात से लौट रहे पत्रकार मित्रों की सफारी एक ट्रक से टकरा गयी। मौके पर ही छायाकार वेद प्रकाश चौहान और पत्रकार कोमल यादव की साँस थम गयी। उनके चालक ने भी अपनी जान गँवा दी। पत्रकार विवेक पाण्डेय, टी पी शाही, मुकेश पाण्डेय और योगेश्वेर सिंहघायल हो गये। सबकी हालत नाजुक है। वेद और कोमल का जाना बहुत ही दुखदायी है। कच्ची गृहस्ती बीच राह में ही टूट गयी है। वेद गोरखपुर की मिडिया में एक दशक से अधिक समय से सक्रिय थे। राजघाट पर शुक्रवार की रात को उनके पिता ने जब फफकते हुए मुखाग्नि दी तो फ़िर कठोर शमशान भी रो पडा। उसी समय काशी में कोमल भी पञ्च तत्व में विलीन हो रहे थे। कोमल अभी जब गोरखपुर से अमर उजाला का प्रकाशन शुरू हुआ तो यहाँ आए थे। एक कार्यक्रम में उनसे मुलाकात हुई और फ़िर वे गाहे वगाहे मुझे फ़ोन करते थे। बेलौस बनारस की गंध उनके साथ हमेशा मौजूद रहती। कभी मजाक में भी बहुत गंभीर बात कह जाते और कभी मजाक में गंभीर से गंभीर बातों को हवा में उड़ा देते थे। कम समय में अपने इस अंदाज से वे लोगों के बीच पहचान बना लिए। अकेले रहते थे। कभी पूछा की बीवी को क्यों नही लाते हो- तो जवाब यही की घर की जिम्मेदारी है। यकीनन घर समाज और रिश्तों की जिम्मेदारी कोमल ने उठायी। काशी से लौटते समय दुर्घटना हुई। वे अपने अखबार के एक सहयोगी के बारात से ही लौट रहे थे। कोमल ने अपनी जान देकर हम सबसे कोई न कोई कीमत वसूल कर ली है। हर पल यही लग रहा है कुछ खो गया है। जीवन में कई कई लाशें देखी। अपने करीबी लोंगों की भी लेकिन इतनी बेचैनी पहले कभी नही हुई। वेद के न होने का अहसास तो ....... क्या कहूं। पहली बार राजीव केतन मेरे घर लेकर आए थे। तब वेद अखबार से जुड़े थे। फ़िर कोई मौका ऐसा नही की वेद मुझसे मिलने जुलने का सिलसिला आगे न बढाए हों। उनकी जिन्दादिली और दो टूक कह देने की आदत सबको पसंद थी। जब भी गोरखपुर प्रेस क्लब के चुनाव होते वेद मुझसे यह पूछने जरूर आते भइया क्या करना है। कौन किस खेमे है, कौन क्या कहानी कर रहा है, वे जरूर बताते। हमेशा यही कहते की प्रेस क्लब को ठीक से आपने खडा किया है। उसी प्रेस क्लब में श्रधांजलि देने के लिए मुझे बुलाया गया तो मेरी आवाज हलक में ही रह गयी। मैं रोक नही पाया। वेद के प्रति मेरे मन में बहुत ही स्नेह था। उसके रहते इस बात का अहसास नही था। सड़क पर दफ्तर जाते समय जब भी मुलाकात होती वेद के पास कोई नई सूचना जरूर होती। बहुत मुश्किल है आंखों से एक जलवे को पा लेना और होठों से खामोश हो जाना। वेद तो हर दिन आंखों से एक जलवे को कैद करते थे। उनकी आखिरी तस्वीर उन्हें श्रद्धा वश छापी गयी। खूबसूरत आसमान का दृश्य। पूरे आसमान को वेद ने अपनी आंखों में कैद कर लिया था। अब वेद के लिए आँखे प्यासी हैं। लेकिन प्यास का व्यापार करने वाले पानी का पता नही देते। वेद तुम कहा हो।

अभी किसी ने कहा है-



ये चमन यूँ ही रहेगा और हजारों जिन्दगी

अपनी अपनी बोलियाँ सब बोलकर उड़ जायेंगे।

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