02-02-2010

सोहगौरा- कभी फिजा में गूंजते थे वेदमंत्र मगर ..

आनन्द राय, गोरखपुर
पांच हजार साल पुराने ऐतिहासिक सोहगौरा गांव के पं. धनंजय राम त्रिपाठी 84 बसंत पार कर चुके हैं। देश के गणतंत्र होने पर उनके दिल में विकास की बेइंतहा उम्मीदें जगी मगर साठ साल बाद भी विकास की बयार उनके गांव को छू नहीं पायी। अब तो इस गांव के लोग खुद को स्थापित करने के लिए पलायन करने लगे हैं। कौड़ीराम से चार किलोमीटर दूर आमी और राप्ती नदी के संगम पर बसे सोहगौरा गांव में कुछ पुश्तैनी मकान टूटकर भव्य इमारतों में तब्दील हो गये हैं लेकिन बाकी खण्डहर हो रहे हैं।
गांव की युवा पीढ़ी रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर हो गयी है। इसीलिए गांव में सुबह और शाम को भी सन्नाटा दिखता है। दुनिया के सबसे पुराने इस गांव में अब पहले की तरह वेदमंत्रों की आवाज नहीं गूंजती है। बारुदी गंध ने यहां की फिजा बदल दी है। गैंगवार के चलते यहां अब तक 38 लोगों की जानें जा चुकी हैं। इसीलिए पण्डित धनंजय राम त्रिपाठी क्षोभ से भरे हैं। उनके पितामह पण्डित परमार्थी राम त्रिपाठी ने इच्छा मृत्यु पायी। यह कहते समय उनका चेहरा गौरवान्वित रहता है लेकिन गांव की बदहाली ने उन्हें दुखी कर दिया है। भारतीय इतिहास अनुसंधान केन्द्र के पूर्व चेयरमैन प्रोफेसर दयानाथ त्रिपाठी ने इस गांव में खुदाई करवाकर यहां की ऐतिहासिकता प्रमाणित की है।
 प्रोफेसर त्रिपाठी के मुताबिक सोहगौरा विश्र्व का प्राचीनतम ग्राम है जो 5000 वर्षो से एक ही स्थल पर अपने होने का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। इस गांव में खुदाई के समय चित्रित धूसर मृदभाण्ड, चन्द्रगुप्त मौर्य के समय का ताम्रपत्र, अकाल के समय दुर्भिक्ष को दान देने का प्रमाण और अन्य कई साक्ष्य मिले हैं। प्राचीन इतिहास के शोधार्थी आशुतोष राम त्रिपाठी कहते हैं कि पुरातत्व विभाग ने भी इस गांव को उपेक्षित कर दिया वरना यह तो पूरी दुनिया के लिए एक धरोहर है। इन दिनों गांव की आभा बिगड़ गयी है। दाग इतने लग गये कि गांव के लोग ही झेंपते हैं। बड़े बड़े जमींदारों और राजाओं को दीक्षा देने वाले इस गांव में अब बदनामी के निशान पड़ने लगे हैं। हालांकि 67 साल के शास्त्रार्थ महारथी कैप्टन रामचंद्र राम त्रिपाठी इसे खारिज करते हैं। उनका दावा है कि सोहगौरा के जीन में वेद है, संस्कार है और यह कभी खत्म नहीं हो सकता। लेकिन वे भी यह मानते हैं कि सरकार ने इस ऐतिहासिक गांव के लिए कुछ नहीं किया।
सचमुच इस गांव में प्रदूषण और पिछड़ेपन का पांव पसरता गया है। 20 गांवों के केन्द्र में होने के बावजूद यहां आठवीं के बाद कोई स्कूल नहीं है। लड़कियों को शिक्षा के लिए कौड़ीराम जाना पड़ता है। पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है। हैण्डपम्प में प्रदूषित जल आता है। कोई स्वास्थ्य केन्द्र भी नहीं बन पाया है। आमी-राप्ती की बाढ़ से तबाही आती ही है। बाढ़ न रहने पर कटान होने के बाद सैकड़ों एकड़ भूमि रेत में तब्दील हो जाती है। शिक्षक शिवाकर राम त्रिपाठी और युवा नेता राकेश राम त्रिपाठी गांव के बंधे पर बन रही पीएमआरवाई की अधूरी सड़क की ओर इशारा करते हैं। सरकार अभी तक एक मुकम्मल सड़क भी नहीं दे पायी है। गांव की बदहाली के अभी और भी किस्से बाकी हैं।

1 टिप्पणियाँ:

Kulwant Happy ने कहा…

जानकारी देता लेख। अद्भुत।


वैसे विकास के नाम पर गाँवों को मिटा दिया जाता है।

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