25/09/2009

अजातशत्रु वाली अपनी स्थापित छवि को तोड़ें परमानंद-अनिल


अशोक चौधरी , गोरखपुर

भोजपुरी और हिन्दी के साहित्यकार अरुणेश नीरन ने कहा है कि कवि परमानंद जीवन रस का आचमन होठों से नहीं हाथों से करते हैं, इसलिए वे आवेग नहीं संयम के कवि हैं। उनकी कवितायें उद्वेलित नहीं करती, विवेक को झकझोरती हैं। वे समय का प्रवाह तोड़ते हैं इसलिए वे हमेशा पुनर्नवा बने रहते हैं।बुधवार को गोरखपुर के शिवाय होटल के सभागार में दैनिक जागरण द्वारा आयोजित साहित्य से संवाद कार्यक्रम को बतौर मुख्य वक्ता सम्बोधित कर रहे थे। इस कार्यक्रम में भारत -भारती और व्यास सम्मान से पुरस्कृत कवि व आलोचक परमानंद श्रीवास्तव ने एकल काव्य पाठ किया। इसके पश्चात उनके रचनाकर्म पर विस्तृत विचार विमर्श किया गया। इसके पूर्व प्रदीप सुविज्ञ द्वारा निर्मित एक वृत्तचित्र गोधूलि के कवि परमानंद का भी प्रदर्शन हुआ। डा.नीरन ने कहा कि परमानंद ने जीवन भर अपनी तलाश की है,उनकी तलाश अभी खत्म नहीं हुई है। उनका जीवन गणना करने वाला नहीं बहने वाला है। बहने वाला जीवन समय को वर्तमान से जोड़ देता है। इसलिए परमानंद हमेशा अपने समय की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए दिखते हैं। डा.नीरन ने अपने वक्तव्य में उनके गीतों की प्रशंसा की। इसके पूर्व डा.शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने प्रो.परमानंद और अन्य अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि जागरणसमूह हमेशा साहित्य और संस्कृति के विकास और संवर्धन के लिए समर्पित रहा है। इसी उद्देश्य से साहित्य से संवाद की यह श्रृंखला शुरू की गयी है। विचार विमर्श की शुरूआत में अपना लिखित आधार वक्तव्य रखते हुए विवि के शिक्षक डा. अनिल राय ने कहा कि प्रो.परमानंद से अपेक्षा है कि अब वे सर्वप्रिय व अजातशत्रु वाली अपनी स्थापित छवि को तोड़ें। अभी भी उनका सर्वोत्तम आना बाकी है। जिसका सबको इंतजार है। कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता प्रो.अनंत मिश्र ने कहा कि परमानंद की कविता और आलोचना की प्रमुख चिंता यही है कि प्रेम और अपनापन कैसे बचाया जाय। यह चिंता शाश्र्वत है वेदों से लेकर परमानंद तक समान है। प्रो.चित्तरंजन मिश्र ने प्रो.परमानंद को साहित्य का होलटाइमर बताया। उनका रचनाकर्म समूचे परिदृश्य और समय के साथ साक्षात्कार करता है। कवि अष्टभुजा शुक्ल ने संस्कृत साहित्यकार राजशेखर का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी आलोचक की न्यूनतम अर्हता कवि या कविमना की होनी चाहिए। परमानंद एक कविमना आलोचक हैं तो आलोचना में एक आलोचकमना कवि हैं। वे घोषित आलोचक और अघोषित कवि हैं। आलोचक कपिलदेव ने कहा कि परमानंद ने आलोचना में अपनी श्रेणी नहीं तय की। कभी आलोचना के नाम पर फतवा नहीं दिया। जहां यह उनकी सीमा है यही उनकी अपनी ईमानदारी भी है। डा.जनार्दन ने कहा कि परमानंद की विशेषता उनकी गतिशीलता है। उनके आलोचनाकर्म को साहित्य की रूढि़यों के खांचे में फिट करना उनकी गतिशीलता को बाधित करना है। मेरी समझ से यह ठीक नहीं है। डा.सुरेन्द्र दूबे ने कहा कि परमानंद जी मूलत: कवि हैं इसीलिए कविमना आलोचक है लेकिन अब उन्हें चाहिए कि वे अपना सर्वोत्तम सामने लायें। वरिष्ठ पत्रकार सुजीत पाण्डेय ने कहा कि परमानंद की कविता भावनाओं के समंदर में गहरे तक ले जाती है। उन्होंने परमानन्द के रचना संसार पर विमर्श के दैनिक जागरण के आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि साहित्य की खबरें अखबारों में यदाकदा देखने को मिल जाती हैं लेकिन दैनिक जागरण एवं मेरे प्रिय डा. शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने ऐसे आयोजन के जरिए साहित्य, संस्कृति और कला पर मनन चिन्तन करने और रचनाओं के करीब आने का शानदार मौका उपलब्ध कराया है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। हमें विश्वास है कि वे ऐसे आयोजनों की निरंतरता बनाए रखेंगे। इस कार्य में मैं हर संभव सहयोग देता रहूंगा। कार्यक्रम का संचालन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्र ने कहा कि प्रो.परमानंद गोरखपुर के गौरव हैं। उनकी कविता आम और खास सबको संप्रेषित होती है। अंत में वरिष्ठ पत्रकार और शायर राजेश सिंह बसर ने कार्यक्रम में शामिल सभी लोगों का आभार व्यक्त किया। चन्द्रकांति रमावती देवी आर्य महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने सरस्वती वंदना एवं स्वागत गीत प्रस्तुत किया।

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छी रिपोर्ट.

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