14/08/2009

पचपन साल से फाइलों में दबी है जलकुण्डी परियोजना


आनन्द राय, गोरखपुर

पूर्वाचल के 17-18 जिलों में कहीं सूखा है तो कहीं बाढ़ का खौफ सिर चढ़ कर बोल रहा है। सिद्धार्थनगर और महराजगंज जैसे जिले बाढ़ से प्रभावित हो गये हैं। इन दिनों अफवाहों की उड़ान बहुत ऊंची हो गयी है। जनप्रतिनिधियों से लेकर अभियंताओं तक को पड़ोसी देश नेपाल की याद आ रही है। अक्सर यह बात सुनायी देती कि नेपाल ने अपने यहां उफनायी नदियों का पानी भारत में छोड़ दिया। ऐसी सूचना से लोग सावधान रहते हैं। फिर तो जलकुण्डी परियोजना की चर्चा जरूर होती है। वाकई यह परियोजना वजूद में होती तो कम से कम पूर्वाचल के लाखों लोग हर साल बाढ़ से बेघर नहीं होते। जल कुण्डी परियोजना भारत और नेपाल के अस्तित्व और विकास से जुड़ी है। पर बेहतर समाधान न निकलने की वजह से यह अधर में पड़ी है। 1954 में भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू और नेपाल के राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह देव के बीच वार्ता के बाद इस परियोजना के प्रस्ताव पर मुहर लगी। उन दिनों इसका परिव्यय 34 करोड़ रुपये अनुमोदित किया गया। 55 साल बीत गये मगर सियासी उपेक्षा के चलते इस परियोजना को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। तकनीकी विशेषज्ञों की दलील है कि अब पांच अरब खर्च करके भी इसको पूरा नहीं किया जा सकता। अस्तित्व में आने पर जलकुण्डी परियोजना पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए वरदान साबित हो सकती है। प्रस्ताव के मुताबिक नेपाल के भालू बांध नामक स्थान के निकट सिलिम पर 56 मीटर ऊंचा बांध बनाया जाना है। इसके अलावा नेपाल से निकली राप्ती नदी एवं उसकी सहायक झिरमुख, खोला आदि नदियों के संगम पर नागौरी के निकट 163 मीटर ऊंचा बांध बनाये जाने का प्रस्ताव है। इन दोनों तटबंधों को अस्तित्व में लाकर दो बड़े जलाशय बनाये जाने हैं। योजना के मुताबिक इन दोनों जलाशयों में राप्ती और उसकी सहायक नदियों का पानी भण्डारण किया जाना है। इन जलाशयों की क्षमता 0.16 और 0.37 ए.एम.एफ. होगी। इस परियोजना के अस्तित्व में आने से बलिया, गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, देवरिया, कुशीनगर, गोरखपुर, महराजगंज, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संत कबीर नगर, बहराइच, गोण्डा, श्रावस्ती और बलरामपुर जैसे जिलों में प्रतिवर्ष होने वाले व्यापक सैलाब पर अंकुश लगेगा और इन जलाशयों से सौ एवं पचास मेगावाट बिजली उत्पादन होगा। इसके तिरिक्त नेपाल के 76 हजार 400 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई भी प्रस्तावित है। बिजली का उपभोग दोनों देशों को बराबर बराबर करने की सहमति बनी है। यह महत्वाकांक्षी परियोजना 55 साल से वजूद में आने को तरस रही है। प्रस्ताव बनने के बाद 1974 में इस परियोजना को लेकर इण्डो-नेपाल डच कमीशन की एक बैठक हुई लेकिन कोई कारगर नतीजा नहीं निकला। फिर 1982 में नेपाल सरकार ने इस पर एक आलेख प्रस्तुत किया। उसमें कई तकनीकी बिन्दु उठाये गये। फिर दोनों देशों के बीच संयुक्त तकनीकी समिति बनी। 1991 में फिर बैठक हुई फिर भी कोई कारगर नतीजा नहीं निकला। बाद में प्रदेश सरकार के मंत्री स्व. धनराज यादव ने इसके लिए सरकार में पहल की। तब तत्कालीन प्रमुख सचिव सिंचाई को वार्ता के लिए काठमाण्डू भेजा गया लेकिन तब भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। अब सब कुछ ठण्डे बस्ते के हवाले हो गया है।

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