02/06/2009

इस्लाम में सात फेरे लेना गैर शरई

जागरण , देवबंद
: गोरखपुर में एक मुस्लिम जोड़े द्वारा हिंदू रीति रिवाज से शादी करने को उलेमा ने अमान्य करार दे दिया है। उलेमा ने कहा है कि इस्लाम में सात फेरे लेना गैर शरई है और ऐसा करने वाला मुस्लिम गुनाहगार है। शरीयत के मुताबिक शादी के वास्ते निकाह करना जरूरी है। शनिवार को गोरखपुर में 27 जोड़ों की सनातन परंपरा के अनुसार दहेज रहित सामूहिक शादियां हुई हैं। इनमें एक जोड़ा मुस्लिम था। जंगल कौडि़या इलाके में आयोजित इस समारोह में मोहम्मदपुर के अकबल अली पुत्र मोहम्मद यासीन और खलीलाबाद के मजबुल्लाह की बेटी तराबुन निसां ने हिंदू रीति रिवाज से विवाह रचाकर सात जन्म तक साथ रहने का संकल्प लिया। दोनों के परिवारों की प्रतिक्रिया है, इंसानियत मजहब से बड़ी चीज है और अल्लाह सभी का एक ही है। इस प्रकरण पर देवबंद के उलेमा ने साफ कर दिया कि इस्लाम धर्म गैर शरई काम की इजाजत नहीं देता। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य और वक्फ दारुल उलूम के नायब मोहतमिम मौलाना मुहम्मद सूफियान कासमी ने कहा कि मुस्लिम लड़का-लड़की का हिंदू रीति रिवाज से शादी करना गैर शरई है। ऐसी शादी की शरीयत के मुताबिक कोई मान्यता नहीं है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार दूल्हा-दुल्हन के मध्य निकाह का करार जरूरी है। जब तक दोनों का निकाह नहीं होता, तब तक शादी नहीं मानी जायेगी। फतवा विभाग के नायब प्रभारी मुफ्ती अहसान कासमी, वरिष्ठ प्रवक्ता मौलाना अब्दुल लतीफ कासमी, मौलाना इब्राहिम कासमी आदि उलेमा ने कहा कि इस्लाम धर्म के मुताबिक शादी के लिए शरई मान्यताओं का पालन करना जरूरी होता है, जो लोग ऐसा नहीं करते है वे गुनाहगार हैं। दूसरे धर्म की मान्यताओं को स्वीकार करना तथा उन पर अमल करना गैर इस्लामिक कार्य है, जिनकी इस्लाम धर्म में कोई गुंजाइश नहीं है। गोरखपुर की उक्त शादी पूर्ण रुप से गैर शरई है तथा मजहब-ए-इस्लाम के मुताबिक उनकी शादी नहीं हुई है।

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