30/05/2009

उनसे बेहतर तो राहुल ही


आनंद राय , गोरखपुर

दैनिक जागरण में एक रपट छपी - मंत्रीमंडल ऐसा दीजिये जामे कुटुंब समाय । यह उन लोगों के लिए था जिनके बाप दादे सरकार में रहे हैं। राहुल गांधी उन सभी लोगों से मुझे बेहतर लगे जो मंत्री पद पाने के लिए परेशान थे। किसी ने कहा कि राहुल तो सीधे प्रधान मंत्री पद के दावेदार हैं। एक भाई ने तो उन्हें यू पी के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत कर दिया। जो हो और राहुल जो चाहे बने लेकिन ऐसा नही है कि उनके परिवार में लोग सिर्फ़ प्रधानमंत्री पद ही सुशोभीत करते हैं। इंदिरा गांधी भी मंत्री रही हैं। राहुल की नजर संगठन पर है। यू पी में कमजोर हो चुकी कांग्रेस को मजबूत करना उनका इरादा है। उन्होंने मरी हुई कांग्रेस में जान डाली है। कांग्रेस उठ गयी है। राजीव गांधी की हत्या २१ मई १९९१ को हुई और उसके सात साल बाद सोनिया गांधी राजनीति में आयी। मैं तो ऐसे लोगों को भी जानता हूँ जिनके पति की लाश सामने रखी हो और वह राजनीति की पारी खेलने के लिए व्याकुल हो गयी हों। पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस के कई ऐसे मंत्री रहे जिनके पति के मौत का मातम मनाया जा रहा था और वे लोग राजनीति में अपनी जगह तलाश रही थी। बहरहाल जिन्हें सत्ता से प्रेम उन्हें सत्ता मुबारक हो लेकिन सच यही है कि यह भारत की जनता है और इसने किसी को भी असमय नही धोया है। जिनके बेटी बेटे और पोते पोती राजनीति में अबकी मुकाम पाये उनमे से भी कई ऐसे रहे जिन्हें जनता ने सिंहासन से उतार फेंका।

मंत्रिमंडल ऐसा दीजिए, जामे कुटुंब दिल्ली, जागरण ब्यूरो : मंत्रियों की सूची है या वंशबेलि का ब्यौरा? बेटे, बेटी,स छोडि़ए यहां तो नेता परिवारों की तीसरी पीढ़ी तक टीम मनमोहन को धन्य कर रही है। इस टीम में ससुर और दामाद भी एक साथ शामिल हैं। कहने को कोशिश युवा चेहरे लाने की है लेकिन दरअसल इस मंत्रिमंडल से भारतीय राजनीति का वंशवादी चेहरा बड़ा होकर सामने आ गया है। गांधी परिवार के युवराज राहुल का मंत्रिमंडल में न आना तो उनकी पारिवारिक सियासत का तकाजा है लेकिन उनके अलावा उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सभी प्रमुख राजनीतिक परिवारों के नए नुमाइंदे मंत्रिमंडल में शामिल हैं। उत्तर से शुरू करें तो गुरुवार को फारूक अब्दुल्ला कैबिनेट मंत्री पद की शपथ लेकर परिवारवाद का बड़ा ही रोचक नजारा पेश कर रहे होंगे। क्योंकि उनके दामाद सचिन पायलट ( स्व. राजेश पायलट के बेटे) भी उनके साथ ही राज्यमंत्री पद के लिए शपथ लेंगे। कभी कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती देकर खूब नाम कमा चुके स्व. जितेंद्र प्रसाद के उत्तराधिकारी जितिन प्रसाद भी पिछली बार की तरह राज्यमंत्री का पद संभालेंगे। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पत्नी परनीत कौर भी टीम मनमोहन में राज्यमंत्री होंगी। मध्य भारत से स्व. माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया और मध्यप्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के बेटे अरुण यादव राज्यमंत्री की शपथ लेकर परिवारवाद का परचम लहराएंगे तो पश्चिम से पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. माधव सिंह सोलंकी के बेटे भरत सिंह सोलंकी व गुजरात के मुख्यमंत्री रहे अमर सिंह चौधरी के पुत्र तुषार भाई चौधरी भी राजनीति में परिवारवाद की अलख जगाते नजर आएंगे। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटिल के पौत्र प्रतीक पाटिल भी नेताओं की तीसरी पीढ़ी के प्रतीक बन कर आए हैं। एन.टी. रामाराव की पुत्री डी. पुरंदेश्वरी फिर मंत्रिमंडल में होंगी तो द्रमुक प्रमुख एम. करुणानिधि के ज्येष्ठ पुत्र एम.के. अझागिरी और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. मुरासोली मारन के पुत्र व करुणानिधि के भतीजे दयानिधि मारन भी कैबिनेट का हिस्सा होंगे। जी.के. मूपनार के पुत्र जी.के. वासन भी कैबिनेट दर्जे के मंत्री बन गए हैं। पी.ए. संगमा की युवा पुत्री अगाथा भी टीम मनमोहन का हिस्सा बनी हैं।

4 टिप्‍पणियां:

Abhishek Mishra ने कहा…

Sahi kaha aapne.

surya goyal ने कहा…

भाई साहब बहुत अच्छी बात लिखी है आपने की राहुल गाँधी उन लोगो से हट कर है जो मंत्री पद पाने की लालसा रखते है लेकिन फिर आपने कहा की राहुल जी तो संगठन को मजबूत करने में लगे है . ठीक है आपकी बात लेकिन अब जनता यह देखना चाहती है की उनकी सर्कार के 100 दिन के अजेंडे में उनकी क्या भूमिका रहती है . फिर भी आपका लेखन सहरानीय है . बधाई
मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है . www.gooftgu.blogspot.com

वेद रत्न शुक्ल ने कहा…

मन्त्री बन कर ही राहुल क्या प्राप्त कर लेते जो अब उन्हें नहीं प्राप्त है। पिता की तरह ही सीधे प्रधानमन्त्री बनेंगे (ऐसी कोशिश है)। इसमें त्याग जैसी कोई बात नहीं है। हालांकि यह बात अवश्य है कि पद इस परिवार के लिए अब अहमियत नहीं रखता। भारतीय जनता की महान कृपा से यह लोग अब पद से ऊपर उठ चुके हैं। राजतन्त्र के जीते-जागते, हंसते-खिलखिलाते सुबूत हैं ये।
आपका कॉलम दो हिस्सों में टूटा हुआ क्यों है?

हर्षवर्धन ने कहा…

आनंदजी
बेवजह आप राहुल को खंभे पे चढ़ा रहे हैं। जब वीटो पावर प्रधानमंत्री से ऊपर का हो तो, कोई भला क्यों मिनिस्टर बनके उनके साथ खड़ा होना चाहेगा जो, उनके रहमोकरम पर ही लालबत्ती का सुख भोगने जा रहे हैं। बाकी आपने सब ठीक लिखा है

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