29 फ़र॰ 2008
अपनी सरहद की सुरछा ख़ुद करें
आज फ़िर अशोक चौधरी ने मुझे टोका। उनकी मंशा है मैं फ़िल्म फेस्टिवल पर कुछ लिखूं। क्या लिखूं, कैसे लिखूं और किसको लिखूं। बस इसी सवाल से टकरा रहा हूँ। भाई मनोज सिंह इस बार उत्सव के संयोजक थे। बहुत अच्छा प्रयास रहा। मैं तो अशोक और मनोज से सिर्फ़ इस बात से प्रभवित हुआ की इन लोगों ने अच्छा विषय चुना। मेरे गुरु जी कहते हीं जहाँ रहो अपनी सरहद की सुरछा ख़ुद सोचो। गोरखपुर में आयोजित तीसरा फ़िल्म फेस्टिवल विस्थापन और बंटवारे का दर्द समेटे था। अपना गोरखपुर जिस दौर से गुजर रहा है वहाँ भी कुछ ऐसा ही दर्द है। १९६५ से पहले गोरखपुर में कभी दंगे फसाद नही हुए। १९६५ में सियासत ने कुछ ख़राब हालत पैदा किए तो फ़िर कहानी किस्से बदल गए। अब तो ४३ साल में यह शहर ७ बार कर्फू झेल चुका है। मंगलेश डबराल ने अपने सम्पादकीय उद्बोधन में लिखा है- सच यह है की एक बार विस्थापित हुआ मनुष्य या उसका समाज फ़िर कंही उस तरह नही बस पाता, वह हमेशा विस्थापित ही रहता है और भौतिक ही नही, मानसिक और संवेदनातमक स्तर पर बहुत कुछ सदा के लिए खो चुका होता है। यहाँ बिभाजन भौतिक तो नही हुआ लेकिन मानसिक स्तर पर हम बहुत बट गए। कितनी दीवारें खडी हो गई हैं। कितनी खाई ख़ुद गई है। कितने लोगों ने बाद लगा दी है। रिश्ते और उनकी परिभाषाएं बदल गई हैं। कोई तो सोचे। कई तो जाने। कोई तो समझे। अशोक और मनोज ने उसे समझा। वे समझ रहे हैं। मैं तो इसी बात से खुश हूँ। तीन बार इस शहर में कर्फूं के घाव को हमनेशब्दों में पिरोया है। औरकभी- कभी हवाएं बहती हैं तो दर्द की टीस भी होती है। इस टीस को भरने के लिए जन सिनेमा ने मरहम का काम किया है। फ़िल्म उत्सव के प्रेसिडेंट प्रोफेसर रामकृष्ण मणि त्रिपाठी ने फ़िल्म उत्सव की शुरूआत को किसी बड़े शुरूआत की संभावना बताया और यकीनन हम भी इसे बड़ी शुरूआत मानते हैं। पिछली बार के पहले जब यहाँ दंगा हुआ तो दो लाशें गिरी। विनय और साबिर। एक हिन्दू और एक मुसलमान। पिछली बार कर्फू लगा तो हम शहर-ऐ-काजी मौलाना वलिउल्लाह के पास गए थे। वे बोले तो बहुत कुछ पर हमने सिर्फ़ एक बात सूनी। न तुम हमको मारो, न हम तुमको मारें। बात काजी की ही नही बात तो हमने बहुतों की सूनी पर क्या क्या सुनाएँ। अलगू और जुम्मन के शहर में उठी हुई दीवारों को अगर कोई गिरा रहा है तो मेरे लिखने और न लिखने से कुछ नही होगा। जो लोग ख़ुद को शब्दों का, शहरों का, सबूतों का, संबंधों का, सिलसिलों का और शहदतों का मसीहा समझते होंगें उनके लिए ऐसे आयोजनों का कोई मतलब भले न हो पर मैं तो इसका मतलब निकलता हूँ। मेरे लिए तो गर्म हवा एक संदेश देती है। क्योंकि मैं जलते हुए शहर में हूँ। मेरे लिए यह भी तो सोचने का विषय है- राज ठाकरे और बाला ठाकरे जैसों की सियासत साथ नही देती तो वे हिन्दू को भी बांटते हैं। तो उनके लिए हिन्दुओं में भी मराठी और यू पी बिहारी का भेद होई जाता है। वे यू पी और बिहार वालों को मुम्बई से भगाने लगते हैं। फ़िर तोएक सवाल उठता ही है पूर्वांचल और बिहार के लाखों लोग मुम्बई में रोजी रोटी कमाते हैं। उनके पेट के लिए कोई तो आवाज उतनी चाहिए। अबू आसिम आजमी का नाम कुछ लोगों ने खांचों में बात दिया है। मेरे लिए तो उस आदमी का नाम उन कई संतों और महंथों से बेहतर है जो कुछ कहते भी हैं तो उसकी राजनीतिक लकीरें जरूर खींच जाती है। वोट बुरी आत्मा का नाम है। इसकी परछाई हमारेमाहौल को नुकसान कर रही है। हमे कहना सिर्फ़ इतना है की अशोक और उनके सभी साथियों ने मिल कर बड़ा काम किया है। यह प्रयास ऐसे ही चलता रहे। मैं अपने इन्ही भावों के जरिये मंगलेस डबराल, एम् एस सत्त्हू, विरेन डंगवाल, परनाब मुखर्जी, लाडली, बल्ली सिंह चीमा, जहूर आलम और पंकज चतुर्वेदी के साथ ही उन सभी लोगों के प्रति शुक्रगुजार हूँ जिन लोगों ने अपना सहयोग दिया। मैं विशेष रूप से राम जी राय के प्रति अपनी भावना व्यक्त करना चाहता हूँ जिनसे १५ साल पहले मैं दिल्ली में मिला था। उस समय वे वहीं से समकालीन जनमत निकलते थे, साम्प्रदायिकता कितनी घातक है इसका अर्थ उन्होंने मुझे तभी समझाया था। आयोजन से जुड़े सभी साथियों को धन्यबाद।
फिराक को याद करेगा प्रेस क्लब
28 फ़र॰ 2008
भाई की मौत पर हाय-हाय करते फिराक
इसी आने वाले तीन मार्च को फिराक गोरखपुरी को गुजरे २६ साल हो जायेंगें। उनकी गजलों और नज्मों ने हिन्दी उर्दू में अपना अलग मुकाम बनाया है। वे साहित्य की दुनिया में मील के पत्थर हैं। गोरखपुर को इस बात का गर्व है की वे इस माटी के सपूत हैं। फिराक पर भारत को ही नही पूरी दुनिया को गर्व है। फिराक के जीवन से जुड़े कुछ ऐसे संदर्भ हैं जो उनकी रचनाओं में उतरें हैं। बात तबकी है जब १९२२ में असहयोग आन्दोलन के जुर्म की सजा में वे कैद काट रहे थे। बमुश्किल २१-२२ वर्ष की आयु में उनके छोटे भाई की मौत हो गई। जेल में फिराक को उस भाई की मौत का समाचार मिला जिसे वे बीमार छोड़ कर गए थे। भाई को टीबी थी। उन्होंने अपने भाई के लिए जो अशआर लिखे वे मशहूर तो हुए लेकिन यह कम लोग जानते हैं की फिराक इसे लिखते हुए खून के आंसू रोये। ख़ास बात यह भी की भाई के मरने के तुरंत बाद की गई rachnaa१९३५ में सार्वजनिक हुई।
घाट पर जलने- जलाने के हैं सामां हाय-हाय
किस कद्र खामोश है शहर-ऐ- ख्मोशा हाय-हाय
मिटती जाती है उफक से सुर्खिये-ऐ- रंग शफक
बढ़ता जाता है स्वाद-ऐ-शाम-ऐ- जिंदा हाय-हाय
वो सुकुते-ऐ-गम वो एक हंगामा बे-शोरोशर
याद आके कुछ वो उठना दर्द-ऐ-हिजरां हाय-हाय
एक सन्नाटे का आलम है दरों-दीवार पर
शाम-ऐ- जिन्दान अब हुई तो शाम-ऐ-जिंदान हाय-हाय
यह चमकते दर्द, यह जुल्मत, यह दिल उमड हुए
यह छलकते जाम यह बज्मे चिरागा हाय-हाय
अब कहाँ है खून रोने वाले मेरे दर्द पर
खाक में मिल जाने वाले लाला कारा हाय-हाय
निजा में देखा था वो चेहरा उतरते अहले दिल
उस शकिस्ट-ऐ-रंग के आइना दारा हाय-हाय
उफ़ बगूलों का यह आलम बाढ़ ऐ सर सर का यह जोश
खाक उडाता है तेरे गम में बयाँबा हाय-हाय
मरने वाले याद आती है जन्वामरगी तेरी
उठ गया दिल में लिए तूं दिल के अरमान हाय-हाय
याद आयेगी किसी शोरीदा सर वह्शातें
देख कर गुल्कारिये दीवारे जिंदा हाय-हाय
सोने वाले ख़ाक वीरानों में उड़ती है तेरी
बादऐ सर सर है तेरी गह्वारा-ऐ- जुम्बा हाय-हाय
यह घड़ी भी आयी और जीता हूँ मैं हिर्मानसीब
छूटता है हाथ से दामान-ऐ-जाना हाय-हाय
नश्तर-ऐ-गम उज्लते जज्ब-ऐ-निहां की दाद दे
कर लिया तुझको भी पैवस्त-ऐ-रग-ऐ-जान हाय-हाय
मेरी किस्मत में तुझे कान्धा भी देना जब न था
दिल ने यों बांधा था तुझसे अह्दो पैमा हाय-हाय
अलविदा ऐ जोर-ऐ-बाजू प्यारे भाई अल फिराक
अब तो मैं हूँ और तेरे दाग-ऐ-हिजरां हाय-हाय
कैद में जी खोल के रोना भी मुश्किल हो गया
अब मैं समझा माँअनी-ऐ-तंगी-ऐ-जिंदा हाय-हाय
आह! यह आदाब-ऐ-जिंदा यह शआर-ऐ-जब्त-ऐ-गम
यह वफूर-ऐ-दर्द यह हाल ये परीशान हाय-हाय
अपने मरने पर मेरा रोना था तुझको गवार
इतना कब था मुझको पास-ऐ-अहल-ऐ-जिंदा हाय-हाय
शर्म आती है मुझे जीने से तुझको खो के आह!
इस तरह करना न था तुझको पशेमा हाय-हाय
कैद में भी परदादाआरी गम की मुश्किल हो गई
खुल गया राज-ऐ-दरों- दीवार-ऐ-जिंदा हाय-हाय
घर को मैं क्या मुंह दिखाउंगा रिहा होकर फिराक
मैं असीर और उनके यह हाल-ऐ-परेशा हाय-हाय
घाट पर जलने- जलाने के हैं सामां हाय-हाय
किस कद्र खामोश है शहर-ऐ- ख्मोशा हाय-हाय
मिटती जाती है उफक से सुर्खिये-ऐ- रंग शफक
बढ़ता जाता है स्वाद-ऐ-शाम-ऐ- जिंदा हाय-हाय
वो सुकुते-ऐ-गम वो एक हंगामा बे-शोरोशर
याद आके कुछ वो उठना दर्द-ऐ-हिजरां हाय-हाय
एक सन्नाटे का आलम है दरों-दीवार पर
शाम-ऐ- जिन्दान अब हुई तो शाम-ऐ-जिंदान हाय-हाय
यह चमकते दर्द, यह जुल्मत, यह दिल उमड हुए
यह छलकते जाम यह बज्मे चिरागा हाय-हाय
अब कहाँ है खून रोने वाले मेरे दर्द पर
खाक में मिल जाने वाले लाला कारा हाय-हाय
निजा में देखा था वो चेहरा उतरते अहले दिल
उस शकिस्ट-ऐ-रंग के आइना दारा हाय-हाय
उफ़ बगूलों का यह आलम बाढ़ ऐ सर सर का यह जोश
खाक उडाता है तेरे गम में बयाँबा हाय-हाय
मरने वाले याद आती है जन्वामरगी तेरी
उठ गया दिल में लिए तूं दिल के अरमान हाय-हाय
याद आयेगी किसी शोरीदा सर वह्शातें
देख कर गुल्कारिये दीवारे जिंदा हाय-हाय
सोने वाले ख़ाक वीरानों में उड़ती है तेरी
बादऐ सर सर है तेरी गह्वारा-ऐ- जुम्बा हाय-हाय
यह घड़ी भी आयी और जीता हूँ मैं हिर्मानसीब
छूटता है हाथ से दामान-ऐ-जाना हाय-हाय
नश्तर-ऐ-गम उज्लते जज्ब-ऐ-निहां की दाद दे
कर लिया तुझको भी पैवस्त-ऐ-रग-ऐ-जान हाय-हाय
मेरी किस्मत में तुझे कान्धा भी देना जब न था
दिल ने यों बांधा था तुझसे अह्दो पैमा हाय-हाय
अलविदा ऐ जोर-ऐ-बाजू प्यारे भाई अल फिराक
अब तो मैं हूँ और तेरे दाग-ऐ-हिजरां हाय-हाय
कैद में जी खोल के रोना भी मुश्किल हो गया
अब मैं समझा माँअनी-ऐ-तंगी-ऐ-जिंदा हाय-हाय
आह! यह आदाब-ऐ-जिंदा यह शआर-ऐ-जब्त-ऐ-गम
यह वफूर-ऐ-दर्द यह हाल ये परीशान हाय-हाय
अपने मरने पर मेरा रोना था तुझको गवार
इतना कब था मुझको पास-ऐ-अहल-ऐ-जिंदा हाय-हाय
शर्म आती है मुझे जीने से तुझको खो के आह!
इस तरह करना न था तुझको पशेमा हाय-हाय
कैद में भी परदादाआरी गम की मुश्किल हो गई
खुल गया राज-ऐ-दरों- दीवार-ऐ-जिंदा हाय-हाय
घर को मैं क्या मुंह दिखाउंगा रिहा होकर फिराक
मैं असीर और उनके यह हाल-ऐ-परेशा हाय-हाय
26 फ़र॰ 2008
तुम कौन अपिरिचित घर आए

टैगोर और गीतांजली। नाम सुनते ही एक अलग अनुभूति होती है। महेश चन्द त्रिपाठी ने इसका हिन्दी में अनुवाद किया है। पढ़ कर बहुत सुख मिलता है। भाव का बड़ा धरातल सामने दिखने लगता है। एक कविता है- तुम कौन अपिरिचित घर आए। रविन्द्र नाथ टैगोर की गीतांजलि का अनुवाद करते हुए महेश जी ने इसे सबसे पहला स्थान दिया है।
तुम कौन अपिरिचित घर आए
दर्शन न दिए, सुख पंहुचाये
मन का तम भाग गया सारा
फैला अंतस में उजियारा
उर में उग आए अगडित रवि
लख न सका तेरी मोहक छवि
पर तुम मन मन्दिर में छाये
तुम कौन अपिरिचित घर आए
तुम को पा जीवन बदल गया
जीवन में सब कुछ नया नया
तुम संग संग करते बिहार
अपना जीवन तुम पर निसार
कर धन्य हुए, हम हर्शाये
तुम कौन अपिरिचित घर आए।
गुनाह और बंजारे, ज़रा आप भी विचारें
मैत्रेयी पुष्पा ने अल्मा कबूतरी उपन्यास लिखा है। जन जातियों और कबीलों में रहने वाले खानाबदोश लोंगों की कहानी है। कहानी में खास तौर पर पुलिस द्वारा ऐसे लोगों को अपराधी बनाए जाने की पड़ताल है। कई निर्दोष लोगों को गुनाह के दलदल में धकेले जाने की गाथा है। बहुत पहले नागेश मिश्रा ने मुझे यह उपन्यास पढने को दिया था और मुझे बेहद पसंद आया। असल में पुलिस की नौकरी में नागेश को कई अनुभव हासिल हुए और उन्होंने माना की कई बार मजबूरी बस इनपर कार्रवाई करनी पड़ती है। कल पुलिस ने एक अपराधी के जीवन की हस्तरेखा मिटा दी। जिस आदमी को पुलिस ने कल गोलियों से भून दिया उसके घर की कहानी वेदनाओं से भरी है। आजादी केबाद इस खानाबदोश परिवार का बुधिराम दाढी बनकटिया गांव के नन्दलाल केवट की निगाह में आया। उस जमाने में बुधिराम पहलवान था। बंजारों की तरह कभी यहाँ तो कभी वहा अपने लोगों को लिए वह घूमता रहता।घर कीमाहिलायेंसाथ में होती और उन पर सबकी निगाहें होती। एक बार ऐसे ही किसी जलती हुई निगाह को अपने घर के अंदर बुधिराम ने जाते हुए देखा तो उसका खून खौल गया। बुधिराम ने उस आदमी को अधमरा कर दिया। बलशाली बुधिराम को नंदलाल ने अपनी जमीन में जगह दी और फ़िर उन सबकी जिन्दगी बनकटिया में गुजरने लगी। केवट परिवार ने दाढी परिवार की ताकत और हुनर का खूब इस्तेमाल किया। बुधिराम के दूसरी पीढी के बलशाली जवान मारपीट और चोरी में आगे निकल गए। दाढी परिवार की यह दूसरी पीढ़ी भी केवट परिवार की वफादार रही। तीसरी पीढ़ी में सुंदर और स्मार्ट लड़के हुए। उसी तरह की लडकियां भी। बस दोनों परिवारों में एक दरार पड़ने लगी। जर और जमीन तो झगडे की वजह नही बन सकी लेकिन जोरू आदे आ गई। बुधिराम की तीसरी पीढ़ी में पन्ने और श्रीपत नाम के दो जवान हुए। अपराध की राह पर परिवार पहले से था लेकिन ये दोनों आधुनिक हो गए। चोरी और नक्ब छोड़ कर लूट करने लगे। यह हुनर केवट परिवार की छाया में सीखे। श्रीपत की बहन की अस्मत और लूटी हुई एक गाड़ी के लिए केवट परिवार के महेन्द्र से तकरार बढ़ी तो एक दिन श्रीपत और पन्ने ने महेन्द्र को मार गिराया और उसकी बंदूक लूट लिए। फ़िर सिलसिला मौत का शुरू हुआ। दोनों परिवारों में लाश गिरने लगी। केवट परिवार के चार लोग मारे गए और दाढ़ी परिवार के भी आधा दर्जन से अधिक लोग। फर्क यही की केवट परिवार दाढ़ी परिवार की गोलियओं का निशाना बना और दाढ़ी परिवार पुलिस की गोलियों का। कल जिस शिवप्रसाद दाढी को पुलिस ने सहजनवा में अपनी गोलियों का शिकार बनाया वह अपराधी था इससे इनकार नही किया जा सकता। शिवप्रसाद समेत इस परिवार के पन्ने, श्रीपत, प्रकाश, शिवमूरत पुलिस की गोली के शिकार बन गए हैं। पन्ने के बाप तेजमन को एक गाँव में नकबजनी के दौरान लोगों ने काट डाला। १० फरवरी १९९८ को श्रीपत कोराजधानी में पुलिस ने मारा था। अपराध की राह पर चलते हुए श्रीपत इतना शातिर हो गया की उसने गोल बनाकर अपराध से राजनीति में गए बाहुबली विधायक ओंप्रकाश पासवान की हत्या कर दी। चुनाव प्रचार के दौरान श्रीपत और उसके साथियों ने देशी बम से एक दर्जन लोगों कोउड़ा दिया। पर उसके बाद श्रीपत के घर में अगर किसी ने चैन की जिन्दगी गुजारने की सोची भी तो पुलिस ने अपराध की राह पर चलने को मजबूर कर दिया। यह एक ऐसे व्यथित परिवार की गाथा है जिसका इतिहास स्याह है। पर एक सच्चाई यह भी है की एक जांबाज परिवार को ग़लत राह पर धकेल कर उनकी उर्जा बरबाद कर दी गई।
यकीनन! कभी कभी सड़कों, गलियों में घुमते या अपराध सुर्खियों में दिखायी देने वाले कंजर,दाढी, करवाल, सांसी, नत, मदारीसपेरे, बंजारे, बावरिया, कबुत्राए, न जाने कितनी जातियाँ हैं जो सभ्य समाज के हाशिये पर डेरा लगाए सदियाँ गुजार देती हैं। हमारा उनसे चौकन्ना सम्बन्ध सिर्फ़ कामचलाऊ ही बना रहता है। उनके लिए हम सब सभ्य और उनका इस्तेमाल करने वाले शोषक- उनके अपराधों से डरते हुए, मगर उन्हें अपराधी बनाए जाने के आग्रही। हमारे लिए वे ऐसे छापामार गुरिल्ले हैं जो हमारी असावधानियों की दरारों से झपट्टा मार कर वापस अपनी दुनिया में जाकर छिप जाते हैं। ऐसे लोग या तो जेल में रहतें हैं या फ़िर अपराध के सफर में, इनके घरों की महिलाएं शराब की भट्टियों पर या सभ्य कहे जाने वालों के बिस्तरों पर। यह परिवार तो एक नजीर है लेकिन ऐसे बहुत से परिवार पूर्वांचल में भटक रहे हैं और उनके हाथों अपराध हो रहे हैं। फूलन देवी, मान सिंह, मलखान सिंह, ब्रजेश और राजन जैसों को राजनीतिक दल पनाह देकर उन्हें वोट के कारोबार में उतारते हैं और माननीय बना देते हैं। सुनील पाण्डेय और मुन्ना शुक्ला जैसों को विधान सभा में जगह मिल जाती है। अन्नत सिंह बंदूकें लहराता है और सरेशाम मौत का फरमान जारी कर देता है लेकिन उन पर पुलिस के हाथ नही पंहुच पाते। ये बंज्जारे हैं। थके हारे। पता नही कबसे अपनी छाती में इतिहास का दर्द छिपाये .........अपराध पर अपराध करते जा रहे हैं। इनकी व्यथा को समझने के लिए तो कोई जयप्रकाश नारायण चाहिए, कोई सुब्बा राव चाहिए, मगर उत्तर परदेश अथवा इस देश की पुलिस में ऐसे लोगों की बात दूर, ऐसा सोचने वाले भी नही हैं और अगर किसी ने सोचा तो आपख़ुद नतीजा सोच सकते हैं।
यकीनन! कभी कभी सड़कों, गलियों में घुमते या अपराध सुर्खियों में दिखायी देने वाले कंजर,दाढी, करवाल, सांसी, नत, मदारीसपेरे, बंजारे, बावरिया, कबुत्राए, न जाने कितनी जातियाँ हैं जो सभ्य समाज के हाशिये पर डेरा लगाए सदियाँ गुजार देती हैं। हमारा उनसे चौकन्ना सम्बन्ध सिर्फ़ कामचलाऊ ही बना रहता है। उनके लिए हम सब सभ्य और उनका इस्तेमाल करने वाले शोषक- उनके अपराधों से डरते हुए, मगर उन्हें अपराधी बनाए जाने के आग्रही। हमारे लिए वे ऐसे छापामार गुरिल्ले हैं जो हमारी असावधानियों की दरारों से झपट्टा मार कर वापस अपनी दुनिया में जाकर छिप जाते हैं। ऐसे लोग या तो जेल में रहतें हैं या फ़िर अपराध के सफर में, इनके घरों की महिलाएं शराब की भट्टियों पर या सभ्य कहे जाने वालों के बिस्तरों पर। यह परिवार तो एक नजीर है लेकिन ऐसे बहुत से परिवार पूर्वांचल में भटक रहे हैं और उनके हाथों अपराध हो रहे हैं। फूलन देवी, मान सिंह, मलखान सिंह, ब्रजेश और राजन जैसों को राजनीतिक दल पनाह देकर उन्हें वोट के कारोबार में उतारते हैं और माननीय बना देते हैं। सुनील पाण्डेय और मुन्ना शुक्ला जैसों को विधान सभा में जगह मिल जाती है। अन्नत सिंह बंदूकें लहराता है और सरेशाम मौत का फरमान जारी कर देता है लेकिन उन पर पुलिस के हाथ नही पंहुच पाते। ये बंज्जारे हैं। थके हारे। पता नही कबसे अपनी छाती में इतिहास का दर्द छिपाये .........अपराध पर अपराध करते जा रहे हैं। इनकी व्यथा को समझने के लिए तो कोई जयप्रकाश नारायण चाहिए, कोई सुब्बा राव चाहिए, मगर उत्तर परदेश अथवा इस देश की पुलिस में ऐसे लोगों की बात दूर, ऐसा सोचने वाले भी नही हैं और अगर किसी ने सोचा तो आपख़ुद नतीजा सोच सकते हैं।
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