कभी कभी हाथ से फिसलती हुई रेत की तरह सब कुछ लगता है। दिन महीने साल और फ़िर साल- दर-साल रिश्तों की उम्र। कंही बीच राह में डोर छूट गयी तो ........तो फ़िर नियति को कोसने के अलावा कुछ नही बचता। गुरूवार की मनहूस रात को कुछ ऐसा ही हुआ। बारात से लौट रहे पत्रकार मित्रों की सफारी एक ट्रक से टकरा गयी। मौके पर ही छायाकार वेद प्रकाश चौहान और पत्रकार कोमल यादव की साँस थम गयी। उनके चालक ने भी अपनी जान गँवा दी। पत्रकार विवेक पाण्डेय, टी पी शाही, मुकेश पाण्डेय और योगेश्वेर सिंहघायल हो गये। सबकी हालत नाजुक है। वेद और कोमल का जाना बहुत ही दुखदायी है। कच्ची गृहस्ती बीच राह में ही टूट गयी है। वेद गोरखपुर की मिडिया में एक दशक से अधिक समय से सक्रिय थे। राजघाट पर शुक्रवार की रात को उनके पिता ने जब फफकते हुए मुखाग्नि दी तो फ़िर कठोर शमशान भी रो पडा। उसी समय काशी में कोमल भी पञ्च तत्व में विलीन हो रहे थे। कोमल अभी जब गोरखपुर से अमर उजाला का प्रकाशन शुरू हुआ तो यहाँ आए थे। एक कार्यक्रम में उनसे मुलाकात हुई और फ़िर वे गाहे वगाहे मुझे फ़ोन करते थे। बेलौस बनारस की गंध उनके साथ हमेशा मौजूद रहती। कभी मजाक में भी बहुत गंभीर बात कह जाते और कभी मजाक में गंभीर से गंभीर बातों को हवा में उड़ा देते थे। कम समय में अपने इस अंदाज से वे लोगों के बीच पहचान बना लिए। अकेले रहते थे। कभी पूछा की बीवी को क्यों नही लाते हो- तो जवाब यही की घर की जिम्मेदारी है। यकीनन घर समाज और रिश्तों की जिम्मेदारी कोमल ने उठायी। काशी से लौटते समय दुर्घटना हुई। वे अपने अखबार के एक सहयोगी के बारात से ही लौट रहे थे। कोमल ने अपनी जान देकर हम सबसे कोई न कोई कीमत वसूल कर ली है। हर पल यही लग रहा है कुछ खो गया है। जीवन में कई कई लाशें देखी। अपने करीबी लोंगों की भी लेकिन इतनी बेचैनी पहले कभी नही हुई। वेद के न होने का अहसास तो ....... क्या कहूं। पहली बार राजीव केतन मेरे घर लेकर आए थे। तब वेद अखबार से जुड़े थे। फ़िर कोई मौका ऐसा नही की वेद मुझसे मिलने जुलने का सिलसिला आगे न बढाए हों। उनकी जिन्दादिली और दो टूक कह देने की आदत सबको पसंद थी। जब भी गोरखपुर प्रेस क्लब के चुनाव होते वेद मुझसे यह पूछने जरूर आते भइया क्या करना है। कौन किस खेमे है, कौन क्या कहानी कर रहा है, वे जरूर बताते। हमेशा यही कहते की प्रेस क्लब को ठीक से आपने खडा किया है। उसी प्रेस क्लब में श्रधांजलि देने के लिए मुझे बुलाया गया तो मेरी आवाज हलक में ही रह गयी। मैं रोक नही पाया। वेद के प्रति मेरे मन में बहुत ही स्नेह था। उसके रहते इस बात का अहसास नही था। सड़क पर दफ्तर जाते समय जब भी मुलाकात होती वेद के पास कोई नई सूचना जरूर होती। बहुत मुश्किल है आंखों से एक जलवे को पा लेना और होठों से खामोश हो जाना। वेद तो हर दिन आंखों से एक जलवे को कैद करते थे। उनकी आखिरी तस्वीर उन्हें श्रद्धा वश छापी गयी। खूबसूरत आसमान का दृश्य। पूरे आसमान को वेद ने अपनी आंखों में कैद कर लिया था। अब वेद के लिए आँखे प्यासी हैं। लेकिन प्यास का व्यापार करने वाले पानी का पता नही देते। वेद तुम कहा हो।
अभी किसी ने कहा है-
ये चमन यूँ ही रहेगा और हजारों जिन्दगी
अपनी अपनी बोलियाँ सब बोलकर उड़ जायेंगे।
13 जुल॰ 2008
12 जुल॰ 2008
फुर्सत नही मिलती
19 जून 2008
नियति बदल देती चेहरा

नियति बदल देती चेहरा किसी के लिए जीना किसी के लिए मरना। किसी के लिए हँसना किसी के लिए रोना। किसी के लिए ठहर जाना और किसी के लिए चलना। किसी के लिए लड़ना और किसी के लिए चुप रहना। एक ही आदमी को नियति कई चेहरा देती है। चाह कर भी लोग ख़ुद को बदल नही पाते। कभी कभी लगता कि जिन्दगी में आदमी को अवसर तो मिलते हैं लेकिन उसका लाभ नही उठा पाता। आदमी सफल हुआ तो उसका झंडा उठाने के लिए बड़े बड़े लोग लाइन में लग जाते हैं। संयोग से सफलता नही मिली तो लोग उपहास उडाने में देरी नही करते। बहुत पहले किसी शायर ने लिखा- लोग जालिम हैं, बहुत फिकरे उछालेंगे जरूर। कोई खतरा है तो घर बैठिये परदा कीजै ॥ यकीनन जो लोग बिना किसी परवाह के अपना काम करते आगे निकल जाते ज़माना उन्ही के साथ हो जाता है। मैं अपनी बात करुँ तो हमेशा इस सोच में मारा गया कि लोग क्या कहेंगे।निरंटर मेरी रफ्तार कम होती गयी। पर सहेजा गया अनुभव बड़ा काम आता है। वैसे ही-जीना भी आ गया, मुझे मरना भी आ गया। पहचानने लगा हूँ हर इक नजर को मैं।। इसलिए अब जीने कि अदा बदल गयी है। सोचता हूँ तो लगता है एक तरह का व्यवहार सबके साथ हो नही सकता। बचपन से लेकर अब तक जिन लोंगों ने अपने स्नेह प्यार कि ऊर्जा से अभिसिंचित किया है क्या उनकी जगह कोई और ले सकता है। दिल में उन लोगों के लिए जो मुकाम है वह हमेशा बना रहे इश्वर से यही ताकत मांगता हूँ। बाकी तो मैं जानता हूँ कि जिन्दगी की राह दुश्वारियों से भरी रहती है। मैंने कभी रोशन लोगों को देख कर पछतावा नही किया। कभी सोचा नही कि हमे जीवन क्या मिला और क्या नही। हमेशा गर्द कि तरह गलती को झाड़ता रहा हूँ। भविष्य को ख्वाब समझ कर भूलता रहा हूँ। मैंने तो वर्तमान में जीने की कोशिश की है। कोशिश की है घर बच जाए, जलता हुआ अलाव न आए। मुझे हमेशा यह अहसास रहता है-जो रोशनी में खड़े हैं वो जानते ही नही। हवा चले तो चिरागों की जिन्दगी क्या है।। पर मन में अपने जलते रहने का सुकून भी रहता है। कई बार लगता है कि आँधियों के अच्छे इरादे न होने पर भी ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया। कुछ तो है कि संताप के छड़ में अपने को संभाल लेता हूँ। और अगर तेज आँधियों में कभी बुझ भी गया तो बस यही सोच कर संतोष रहेगा कि- तुम्हारी अंजुमन के हम, वही बुझे चिराग हैं। जो तारीकी को और भी निखारते चले गये॥
3 जून 2008
एक लड़की मेरे शहर की
एक लड़की मेरे शहर की। नाम हरिप्रिया। यू पी बोर्ड इम्तहान में उसने प्रदेश टाप किया तो पूरे शहर की बांछे खिल गई। जिस समय रिजल्ट आया उस समय पूरा देश नॉएडा की आरुशी और उसके नौकर हेमराज की मौत की गुथियाँ सुलझाने में लगा हुआ था। अभी भी आरुशी मसला hal नही हुआ है। अब इसमे सीबीआई भी आ गई है। पर गोरखपुर के लिए हरिप्रिया का हाई स्कूल के इम्तहान में अव्वल आना ही चर्चा के लिए काफी है। यू पी पुलिस में हरिप्रिया की माँ सिपाही है और उसके पिता एल आई सी के अभिकर्ता हैं। एक छोटी बहन और भाई के साथ रहते हुए हरिप्रिया अपने मंजिल के लिए निरंटर चलती रही। उसकी उपलब्धि पर सभी खुश हैं। आरुशी पता नही कैसी थी और उसकी मौत कैसे हुई पर यह जानने के लिए लोग व्याकुल हैं। गोरखपुर के लोग अपने बच्चों को हरिप्रिया का उदाहरण देते हैं और अपेछा करते हैं की उनके भी बच्चे हरिप्रिया जैसे ही हों। यकीनन अंधकार प्रकाश का विकल्प नही हो सकता। अँधेरा प्रकाश का आभाव होता है। हरिप्रिया की अच्छाई अनेक बुरी ख़बरों पर भारी पड़ रही है।
2 जून 2008
मजबूरी

अपने अपने हिस्से का दर्द सभी सहते हैं पर अब तो दूसरो के हिस्से का भी दर्द सहना पड़ता है। गोरखपुर में ब्लू फिल्मों के रैकेट का मामला सामने आया तो कई चेहरे बेनकाब हो गए। कुछ अभी परदा डाले हुए हैं। मासूम बच्चियों की मजबूरी का लाभ उठा कर उनके साथ मुंह काला कटरने वालों की पुलिस ने लम्बी सूची बनायी है। अब इनमे से कुछ अपना मुंह छिपाये घूम रहे हैं तो कुछ के बदले कुछ और लोग पुलिस के हाथे चढ़ रहे हैं।
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