1 जन॰ 2010

काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे

आनन्द राय, गोरखपुर


एक शादी समारोह में पुराने ख्याल के एक शख्स अपने घर की लड़कियों पर खफा हो गये। वजह सिर्फ इतनी थी कि लड़कियां भाई की शादी में डांस फ्लोर पर झूम कर नाचने लगीं। उनके साथ रिश्तेदार और बाराती भी नाच रहे थे। उन्होंने इसे खानदान के मान-प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाकर बारात छोड़ दी। तब मिर्जा गालिब प्रासंगिक हो गये जिनके सामने भी परम्परा और आधुनिकता को लेकर भारी दुविधा थी। तभी तो उन्होंने यह लिखा- नफरत का गुमां गुजरें हैं मैं रश्क से गुजरा, क्यों कर कहूं लो नाम न उसका मेरे आगे। ईमां मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।
 मिर्जा गालिब के लिए एक तरफ इस्लाम की परम्परा थी तो दूसरी तरफ भारत आ रहे अंग्रेजों का रहन-सहन और संस्कृति। इसी बेचैनी में उनकी कई रचनाएं वजूद में आयीं। परदे की अपनी रवायत के समानांतर अंग्रेजों का खुलापन उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। अब वही दुविधा आधुनिकता और परम्परा की जंग लड़ रहे मध्यम वर्ग के सामने है। मैरेज हाउस में जो हंगामा हुआ वह इसी दुविधा का नतीजा है। गांव से आये जिस सज्जन ने मर्यादा के सवाल पर बारात छोड़ दी, वे बार बार यही बात दुहरा रहे थे कि लफंगों के साथ घर की लड़कियां नाच रहीं हैं..। उनका गुस्सा देखने लायक था मगर उनके ही परिवार के लोग उनसे सहमत नहीं थे। उनके एक खास रिश्तेदार ने कहा- दुनियां कहां से कहां जा रही है और ये खानदान की मर्यादा लेकर ढो रहे हैं। पर यह कशमकश अभी खत्म नहीं हुआ है।

   नयी उम्र के लोगों में भी यह बात घर किये है कि जो बाप दादों की परम्परा है, उसका पालन किया जाय। आवासीय काम्प्लेक्स में आधुनिक सुख सुविधा के साथ रह रहे 35 साल के कौशल शाही कहते हैं कि हम अपनी परंपरा नहीं छोड़ सकते। हमारे पूर्वजों ने जो परम्परा डाली है उससे अलग होकर अपनी जड़ों से कट जायेंगे। पर एक निजी कम्पनी में इंजीनियर अनुभव सिन्हा का कहना है कि अगर परम्परा की जड़ों में जकड़े रहे तो जिंदगी से कट जायेंगे। डा. ए.के. गर्ग, एस.बी. पाण्डेय एडवोकेट, अनिल पाण्डेय, कांट्रेक्टर ए.एल. मौर्य समेत कई लोग परम्परा के पक्षधर हैं तो एमबीए अखिलेश तिवारी, विशाल सिंह, विनय सिंह, राममोहन का कहना है कि अब रुढि़यों में बंधकर जाहिलों की तरह जीने से अच्छा है कि खुलकर जियें।

   युवा समाज शास्त्री डाक्टर मानवेन्द्र प्रताप सिंह कहते हैं कि यह तो नयी और पुरानी पीढी के बीच का अंतरद्वंद है. इसी कशमकश के बीच से कोई नया रास्ता निकलेगा. यही रास्ता सामंजस्य भी स्थापित करेगा. जो हो लेकिन बहुत से लोग बदलाव के इस मौसम में दोराहे पर आकर खड़े हो गए हैं. बहुत से लोग तो इस बदलाव से हतप्रभ भी हैं.

1 टिप्पणी:

पंकज ने कहा…

पुराने और नये के बीच के द्वंद पर सुंदर आलेख.

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