बाईस साल पहले बंबई में खडा हूँ। रोजी रोटी की तलाश में। छोटी उम्र और बड़ी जिम्मेदारियों का बोझ लिए। मायानगरी में अपने मासूम बचपन के साथ ऊँचे और शायद कभी न पूरे होने वाले सपनों को लिए हुए। सोच कर ही रोमांच हो जाता है। इधर कई दिनों से मुम्बई आग में जल रही है और लोगों के दिल जल रहे हैं तो सोचता हूँ कोई तो लौटा दे मेरी बंबई। मेरी बंबई कह रहा हूँ तो डर भी लग रहा है। कहीं राज ठाकरे ने सुन ली तो खफा हो जायेंगे। बंबई तो उन्होंने अपने नाम बैनामा करा ली है। वोट की खेती कराने वाली सरकार उनके नाम रजिस्ट्री कर चुकी है और अब बंबई बंबई न होकर मुम्बई हो गयी है। कितना कुछ बदल गया है। सोचते हुए लगता है कि आख़िर किसने उस खूबसूरत फिजा को बिगाड़ दिया जो हमेशा जवान लगती थी। दो साल बंबई में रहा हूँ। भांडुप के तुलसी पाडामें । यहीं मेरी पीछे वाली चाल में नंदलाल सिंह प्रलय भी रहते थे। उन्हें सच बोलने के लिए अपनी जान गंवानी पडी। वे शब्दों के जादूगर थे। स्कूल में पढाते थे लेकिन अखबारों के लिए लिखते भी थे। जनसत्ता में राहुल देव ने उन्हें जोड़ा था। अचानक एक दिन उन्हें सच बोलने की कीमत चुकानी पडी और एक भइया और एक मराठी मानुष ने उनका पोस्टमार्टम करा दिया। प्रलय का जिक्र मैं इसलिए करना चाहता हूँ कि मेरी बात उनके साथ ही शुरू होती है। १९९१ में प्रलय मारे गए थे। मैं बंबई १९८७-८८ में था। तब विक्रोली के सुपर इन्गीनीयारिंग वर्क्स में काम करता था। सुबह ही रोजमर्रा की जरूरतों को पूरी करके सोनापुर से बस पकड़ता था। मुझे तब बस की भीड़ परेशान करती थी। ट्रेन में तो धक्के खाने से चक्कर आने लगते थे। उन दिनों प्रलय जी की कवितायें सुनता था और कई बार लगता कि वे जो कुछ लिख रहे हैं मेरे लिए ही लिख रहे हैं। विक्रोली के काम में मेरा मन नही लगता था। थक जाता था। सेठ का व्यवहार इतना ख़राब था कि मन दुखी हो जाता था। मैं जी एन सिंह से कहता। वे भभुआ के रहने वाले थे। मुझे अक्सर कहते थे कि अपने यहाँ के लोग गाँव में काम करना नही चाहते और यहाँ आकर चाकरी करते हैं। मैं अपने खेतों से बिछड़ने की सजा भुगत रहा था। एक दिन हिसाब लगाया तो गाँव की मेरी जमीने सेठ के कारोबार पर भारी थी। मन के कोने का अहंकार जगा और मैं विद्रोही हो गया। प्रलय ने मुझे प्रेरित किया। मैंने नौकरी छोड़ दी। आर्थिक दुश्वारियों से ऊब कर बंबई गया था अब कैसे लौटूं। कुछ दिनों तक घूमने के बाद मेरे मामा ने साकीनाका में टूथ ब्रश बनाने वाली एक कंपनी में मुझे काम पर लगवा दिया। यहाँ कभी कभी रात में ड्यूटी करने जाना होता था। दिन में घूमता था और पूरी बंबई को देखने लगा था। ऊँचे ऊँचे भवन जिन्हें देखने में गर्दन टेढी हो जाती थी। अठखेलियाँ करता समुद्र, भागते हुए लोग, मुम्बा देवी की जयकारा, गणपति वप्पा मोरिया, सुबह की गुनगुनी घूप, दिसम्बर में भी ठण्ड नही और दो रुपये में भरपेट भोजन। कटिंग चाय और पाव बड़ा। यही लगता कि यहाँ तो टाटा और आम आदमी सबके लिए जगह है। बंबई की यही खूबी मुझे प्रभावित करती और सोचता कि मेरा ठिकाना न बदले। मैंने बंबई क्यों छोड़ दी यह तो कभी बाद में बताउंगा लेकिन मैंने वहाँ रहते हुए जीवन का सलीका सीखा। मैंने बंबई में ब्लिट्ज के संस्थापक आर के करंजिया अभिन्दन देखा। उनके आगे महामहिम आर वेंकट रमन को श्रद्धानवत होते देखा। मैंने वहीं नंदकिसोर नौटियाल और राम मनोहर त्रिपाठी को हिन्दी पत्रकारिता के विकास का मंत्र देते सूना। कई मौकों पर शरद जोशी को व्यंग के बानों से बड़े बड़े लोगों को छलनी करते देखा। आज के कई दादाओं और जरायम की दुनिया के माफियाओं को आपस में गुफ्तगू करते देखा। सब कुछ मुझे रोमांचित करते और लगता कि अगर जहागीर की जगह मैं बादशाह होता तो कश्मीर की जगह बंबई के लिए कहता- गर बररुए जमीनअस्त हमीअस्तो हमीअस्तो हमीअस्त। बंबई मुझे ऊर्जित करती रही और भीड़ में अपने को बचाए रखने की ताकत भी देती रही है। अपने अस्तित्व की हिफाजत का मंत्र तो उस महानगरी ने ही दिया। आँधियों के इरादे अच्छे न होने के बाद भी यदि कोई दिया जलता रह जाए तो कहीं न कहीं कोई न कोई ऊर्जा जरूर है। यह ऊर्जा बंबई ने ही दी। प्रलय मारे गए तो मैं बंबई गया था। संवेदना हलक में फंस गयी थी। प्रलय के घर जितनी देर तक बैठा रहा उनकी बातें याद आती रही। घाटकोपर हिन्दी हाई स्कूल में उनके काव्य संग्र ह का लोकार्प्रण हुआ था। प्रलय कभी कभी विद्रोही बनाते थे तो कभी सवयम को पहचानने की ताकत देते थे।
गतांक से आगे -
प्रलय ने कहा था- एक दिन ऐसा आयेगा, कि तुम बिल्कुल थिर हो जाओगे। हवा के झोंके आयेंगे गुजर जायेंगे, तुम्हारी लौ नही कापेंगी। दुःख आयेंगे सुख आयेंगे, तुम निष्कंप चलते रहोगे। सब छूट जायेगा क्योंकि तुमने अपने को पा लिया होगा। जिसने अपने को पा लिया वह व्यर्थ को पाने के लिए नही दौड़ता। मुझे याद है यह बात उन्होंने रजनीश के हवाले से कही थी लेकिन सन्दर्भ मुझे प्रेरित करना था। समय का दंत हमेशा कुछ न कुछ चुभोता रहता है और समय के साथ ही हम उसे भूल भी जाते हैं। मुम्बई अब पता नही कैसी हो गयी है। यहाँ अब तो राज ठाकरे की हुंकार और नफ़रत सुनाई पड़ती है। मुझे याद है कि १९९३ में जब बंबई में विस्फोट हुआ तो अजीब सा लगा था। शिवसेना के सैनिक दो चार दिन बाद विरोध में त्रिशूल और कतार लेकर सड़क पर आए थे। अब तो राज ठाकरे ने नफ़रत का ऐसा जहर भर दिया है कि उसमे ख़ुद अपना काला चेहरा पहचान नही पा रहे हैं। मुम्बई में तो अब लाशें गिनाते हुए लोग बचे हैं। आसुओं में डूबी उनकी चीत्कार बची है। एक माह पहले इस पूर्वांचल में मनसे के लोगों के हमले से मारे गए लोगों की लाश आ रही थी और इधर आतंकवादियों के बारूद से नहाई हुई लाशें आ रही हैं। मुम्बई से प्रेम की भाषा गायब हो गयी है। प्रेम करो तब तो प्रेम को जानोगे। अब तो मुम्बई में इंसान के हाथों इंसान के लिए मौत बाँटीं जा रही है।
अमृता प्रीतम की एक रचना मुझे याद आती है-
कभी तो कोई इन दीवारों से पूछे
कि कैसे मोहब्बत गुनाह बन गयी है।
यह मिट्टी का रिश्ता, यह पानी का रिश्ता
यह आदम की लम्बी कहानी का रिश्ता
जो मेरे और तेरे खुदा की गली थी
वही आज लाशों की राह बन गयी है..... । मुम्बई में लाशें ही लाशें हैं। वहाँ की आबादी वीरानों का दास्ताँ लिख रही है। वहाँ के संगीत सन्नाटों में तब्दील हो गए हैं। और हमेशा रोशनी में नहाई रहने वाली मुम्बई अंधेरे की गिरफ्त में है। मुझे नरीमन प्वाइंट, गेटवे आफ इंडिया, ताज से लेकर अपने चाल की बावडी और संडास के लिए लम्बी कतारें याद आ रही हैं। मन में एक भरोसा है कि अभी लाख आतंक अपना फन फैलाए माया नगरी का कुछ नही होगा। फ़िर से उठकर चल देगी अपनी बंबई।
यह कहते हुए -
कह दो मुखालिफ हवाओं से कह दो
मोहब्बत का deeyaa तो jalataa रहेगा
yh ahle वतन है, यह ahle sukhaन है
यह मिट्टी का रिश्ता तो khilataa रहेगा।
2 दिस॰ 2008
27 नव॰ 2008
वी पी सिंह ने डायलिसिस से उठकर लड़ी किसानों की लड़ाई

भारत के दसवें प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने ७७ साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन की ख़बर आयी तो चौंकने जैसी कोई बात नही थी। लंबे समय से मौत उनके निकट थी और वे पल पल उससे जूझ रहे थे। पूर्वांचल के इस इलाके से उनका ख़ास जुडाव था। वी पी सिंह से मेरी जान पहचान अखबार में आने के बाद हुई। पर मैंने कई बार उन्हें बेहद करीब से अनुभव किया। जब उन्होंने राजीव गांधी के ख़िलाफ़ अपनी आवाज बुलंद की और बोफोर्स का मुद्दा खडा किया तब उनके साथ देवरिया के राजमंगल पाण्डेय, घोसी के राजकुमार राय और लालगंज के सांसद रामधन सबसे आगे थे। पूर्वांचल से वी पी सिंह का जुडाव था और यहाँ के लोग उन्हें अपने कंधे पर उठाकर देश का नेता बना रहे थे। इलाहबाद उप चुनाव जीतने के बाद वी पी सिंह और देवीलाल समेत कई नेता दौरे पर निकले थे। गोरखपुर से होकर जब वी पी सिंह दोहरीघाट पहुंचे तो उनके साथ दिल्ली के पत्रकारों की टीम थी। वे दोहरीघाट पम्प कैनाल के डाक बंगले पर रुके। मेरे कुछ जानने वाले आदरणीय लोग उनकी प्रेस कांफ्रेंस में जा रहे थे। मैंने भी इच्छा जतायी लेकिन ले नही गए। दोहरीघाट में जब उनकी सभा शुरू हुई तो मैं बतौर श्रोता वहाँ गया। दिल्ली से इंडियन एक्सप्रेस के फोटो जर्नलिस्ट आर के दयाल, हिन्दुस्तान टाइम्स के सौम्य के घोस, इंडियन एक्सप्रेस की अंजली समेत कई खबरनवीस थे। उन लोगों को रास्तों की जानकारी के लिए किसी स्थानीय आदमी की जरूरत थी। आर के दयाल को बाहर का अखबारी समझ कर मैं उनके पास गया। कुछ पूछना चाहा उसके पहले ही उन्होंने मेरा परिचय पूछा। फ़िर साथ चलने के लिए न्योता दिया। मैं अमिला, बोझी होते हुए आजमगढ़ तक उन लोगों के साथ गया। वहाँ डाक बंगले में वी पी सिंह से वे लोग मिले। मैं भी साथ साथ था। उस समय तक जनसत्ता के विवेक सक्सेना भी आ गए थे। गरून् होटल में खाना खाते समय सबने यह तय कर दिया था की अगले पीएम वीपी सिंह ही हैं। बात आयी गयी हो गयी। वी पी सिंह प्रधान मंत्री बने और हट भी गए। लेकिन ऐसा लगा अपने कुछ निर्णयों से पूर्वांचल की जनता के दिलों पर राज लगे। तो कुछ निर्णयों ने उनके विरोध में बड़ी लकीरें भी खींच दी। पर कभी उन्होंने इस अंचल से अपना लगाव कम नही किया। जब भी संघर्ष की जरूरत पडी वे इस इलाके में हाजिर थे। इंदिरा गांधी की ह्त्या के बाद राजीव गांधी के भी करीबी रहे वी पी सिंह की सत्ता में खूब धमक थी लेकिन बोफोर्स मसाले को लेकर जब वे जनता के बीच आए तो जननायक बन गए। मैंने उनकी यात्रा में दिग्गजों को देखा था। तब लोगों को यह नारा लगाते सुना- राजा नही फ़कीर है, भारत की तकदीर है। दसवें प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने शपथ ली उअर अपने एक निर्णय से सत्ता से हाथ धो बैठे। देश का एक समूह उनके विरोध में खडा था। जब उन्होंने मंडल कमीशन लागू किया तब आम जनमानस के बीच उनकी छवि बदल गयी। तब उनके पक्ष और प्रतिपक्ष में लोग मुखर थे। जो उन्हें भारत की तकदीर कहते नही थक रहे थे वही उनके ख़िलाफ़ नारे गढ़ने में आगे हो गए। तब यह नारा गूंजा- राजा नही रंक है, भारत का कलंक है। पर वे इससे विचलित नही हुए। उन्होंने रामविलास पासवान और शरद यादव जैसे नेताओं को एक पहचान देकर अपनी सोच को अमलीजामा पहना दिया। मैं उन दिनों वी पी सिंह के ख़िलाफ़ था। तब अपने क्षेत्र के नेता और वी पी सिंह के धुर विरोधी कल्पनाथ राय का कार्यकर्ता था। मैंने अपने साथी अवध बिहारी राय, विपिन बिहारी श्रीवास्तव और कमलेश राय के साथ आन्दोलन पर आमादा था। एक सुबह हम चारो को गिरफ्तार कर लिया गया। आजमगढ़ जेल में काफी दिनों तक हम लोग बंद रहे। फ़िर कुछ समय बाद यह सब कुछ यादों की तरह रह गया।
वी पी सिंह से सन्दर्भ और संपर्क का दूसरा चरण गोरखपुर दैनिक जागरण में आने के बाद शुरू हुआ। कई बार प्रेस कांफ्रेंस में उनसे मुलाक़ात हुई लेकिन कभी कोई ख़ास बात नही हुई। बाद में एक संपर्क के जरिये वे मुझे पहचानने लगे थे। २००० में मैं प्रेस क्लब का अध्यक्ष चुना गया । एक बार वे किसानो के आन्दोलन में आए तो कल्ब कोषाध्यक्ष राजीव ओझा और संयुक्त मंत्री राजशेखर ने उनका प्रेस से मिलिए कार्यक्रम आयोजित कराने का सुझाव दिया। वे क्लब में आए तो बहुत खुश हुए। उनके साथ दिल्ली में झोपड़ पत्ती आन्दोलन से जुड़े महेंद्र भी थे। कई बार फोन पर वी पी सिंह से बात होती और उनसे सवाल जवाब चलता। मैंने उन्हें बताया की मैंने उनके विरोध में जेल यात्रा भी की है। वी पी सिंह हंसने लगे थे। उन्होंने कहाविरोध और समर्थन एक प्रक्रिया है और यह कभी स्थायी नही होते। उनके साहित्य और संवेदना से मुझे करीब होने का कई बार अवसर मिला। प्रेस क्लब के वार्षिक समारोह में वही हमारे मुख्य अतिथि थे। उन्होंने पत्रकार राजेश सिंह बसर की किताब एक ही चेहरा का विमोचन भी किया। उन्होंने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया और यह जरूर कहते की गोरखपुर के पत्रकार बहुत जागरूक हैं। वे डायलिसिस से उठकर कई बार किसानों के आन्दोलन में भी आए। जब भी जनता के ख़िलाफ़ निजाम की नजर टेढी हुई तो बगावती तेवर लिए वे यहाँ जरूर आते रहे। जिस शाम प्रेस क्लब के कार्यक्रम में शामिल होकर वे दिल्ली गए बीमार पड़ गए। उन्होंने हमसे फोन पर बातचीत की और हमारे कार्यक्रम की सराहना की। यह भी कहा की आप साहित्यकारों का एक कार्यक्रम कराओ और मुझे भी बुलाओ। मैंने कई बार इस पर विचार किया लेकिन सम्भव नही हो सका। हमारे सम्पादक शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने संवाद का आयोजन किया तो मैंने वी पी सिंह को बताया की हमारे यहाँ देश भर के साहित्यकार जुट रहे हैं। आप भी आइये। पर उस समय वे बिस्तर से उठने की हालत में नही थे। राजबब्बर ने उनके बारे में मुझे बताया की उनके जैसा है जो मुद्दों को लेकर हमेशा कुछ कराने के लिए तैयार रहता है। जो कुछ हो हमने अपने बीच से एक संवेदनशील आदमी खो दिया है। उनकी कमी हमेशा बनी रहेगी।
वी पी सिंह से सन्दर्भ और संपर्क का दूसरा चरण गोरखपुर दैनिक जागरण में आने के बाद शुरू हुआ। कई बार प्रेस कांफ्रेंस में उनसे मुलाक़ात हुई लेकिन कभी कोई ख़ास बात नही हुई। बाद में एक संपर्क के जरिये वे मुझे पहचानने लगे थे। २००० में मैं प्रेस क्लब का अध्यक्ष चुना गया । एक बार वे किसानो के आन्दोलन में आए तो कल्ब कोषाध्यक्ष राजीव ओझा और संयुक्त मंत्री राजशेखर ने उनका प्रेस से मिलिए कार्यक्रम आयोजित कराने का सुझाव दिया। वे क्लब में आए तो बहुत खुश हुए। उनके साथ दिल्ली में झोपड़ पत्ती आन्दोलन से जुड़े महेंद्र भी थे। कई बार फोन पर वी पी सिंह से बात होती और उनसे सवाल जवाब चलता। मैंने उन्हें बताया की मैंने उनके विरोध में जेल यात्रा भी की है। वी पी सिंह हंसने लगे थे। उन्होंने कहाविरोध और समर्थन एक प्रक्रिया है और यह कभी स्थायी नही होते। उनके साहित्य और संवेदना से मुझे करीब होने का कई बार अवसर मिला। प्रेस क्लब के वार्षिक समारोह में वही हमारे मुख्य अतिथि थे। उन्होंने पत्रकार राजेश सिंह बसर की किताब एक ही चेहरा का विमोचन भी किया। उन्होंने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया और यह जरूर कहते की गोरखपुर के पत्रकार बहुत जागरूक हैं। वे डायलिसिस से उठकर कई बार किसानों के आन्दोलन में भी आए। जब भी जनता के ख़िलाफ़ निजाम की नजर टेढी हुई तो बगावती तेवर लिए वे यहाँ जरूर आते रहे। जिस शाम प्रेस क्लब के कार्यक्रम में शामिल होकर वे दिल्ली गए बीमार पड़ गए। उन्होंने हमसे फोन पर बातचीत की और हमारे कार्यक्रम की सराहना की। यह भी कहा की आप साहित्यकारों का एक कार्यक्रम कराओ और मुझे भी बुलाओ। मैंने कई बार इस पर विचार किया लेकिन सम्भव नही हो सका। हमारे सम्पादक शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने संवाद का आयोजन किया तो मैंने वी पी सिंह को बताया की हमारे यहाँ देश भर के साहित्यकार जुट रहे हैं। आप भी आइये। पर उस समय वे बिस्तर से उठने की हालत में नही थे। राजबब्बर ने उनके बारे में मुझे बताया की उनके जैसा है जो मुद्दों को लेकर हमेशा कुछ कराने के लिए तैयार रहता है। जो कुछ हो हमने अपने बीच से एक संवेदनशील आदमी खो दिया है। उनकी कमी हमेशा बनी रहेगी।
16 नव॰ 2008
इनकी व्यथा के लिए मुझे शब्द चाहिए

चाहता हूँ इनके लिए कुछ लिखूं पर मेरे पास शब्द नही हैं। दैनिक जागरण के ११ नवम्बर के अंक में इनसे सम्बंधित मेरी एक रिपोर्ट छपी है लेकिन उससे ख़ुद मेरे मन को तसल्ली नही है। ये लोग कुदरत के सताए हुए हैं। एक परिवार की दो पीढियों को ऐसी सजा मिली किआंखों से खून के आंसू आ जाते हैं। गोरखपुर जिले के पिपराइच विकास खंड के एकला गाँव का रामलाल बेहद गरीब है। बीस साल पहले शारदा नाम की महिला से उसकी शादी हुई। इस समय उसके पाँच बच्चे हैं। इनमे एक बेटी है जो आँख से अंधी है और चार बेटे जिनकी शक्ल देखकर लगता है कि वे आदिमानव युग के हैं। सब मंदबुद्धि के हैं। ख़ुद कपडा नही पहन सकते। घर में उधम मचाते हैं। गरीबी अलग से मुश्किल खडी की है। बेटी की आँख की रोशनी लाने के लिए रामलाल अपनी १६ डिसमिल जमीन बेच चुका है। दिन भर की मेहनत मजूरी से घर की रोजी चलती है। जिस दिन रामलाल और शारदा की काम कराने की ताकत ख़त्म हो जायेगी उस दिन इस कुनबे की रोजी रोटी कैसे चलेगी। हमने ऐसे बहुत से लोगों की तकलीफ और दुःख दर्द को अपनी ख़बर के लिए करीब से देखा है लेकिन यह तो ऐसा दर्द है जो मुझे कई दिनों से परेशान किए है। हो सकता है कोई शक्ति उन्हें जीवन की राह दिखाए लेकिन अभी तो कंही से कोई उम्मीद नजर नही आ रही है। इस परिवार के लिए जब तलक भोर का सूरज नजर नही आता मुझे अंधेरों से बगावत करने के लिए ताकत चाहिए। मैं इस बगावत के लिए शब्द तलाश रहा हूँ। शायद मिल जाएँ और उनकी व्यथा को अक्षर अक्षर जोड़ सकूं।
18 अक्टू॰ 2008
नीरज का गुबार
गोपाल दास नीरज की यह रचना मन को छू जाती है
स्वप्न झरे फूल से,मीत चुभे शूल से,लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,गीत अश्क बन गए,छंद हो दफन गए,साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,और हम झुकेझुके,मोड़ पर रुकेरुकेउम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठाथाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,एक दिन मगर यहाँ,ऐसी कुछ हवा चली,लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,और हम लुटेलुटे,वक्त से पिटेपिटे,साँस की शराब का खुमार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,हो सका न कुछ मगर,शाम बन गई सहर,वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,और हम डरेडरे,नीर नयन में भरे,ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,पर तभी ज़हर भरी,गाज एक वह गिरी,पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,और हम अजानसे,दूर के मकान से,पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
स्वप्न झरे फूल से,मीत चुभे शूल से,लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,गीत अश्क बन गए,छंद हो दफन गए,साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,और हम झुकेझुके,मोड़ पर रुकेरुकेउम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठाथाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,एक दिन मगर यहाँ,ऐसी कुछ हवा चली,लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,और हम लुटेलुटे,वक्त से पिटेपिटे,साँस की शराब का खुमार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,हो सका न कुछ मगर,शाम बन गई सहर,वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,और हम डरेडरे,नीर नयन में भरे,ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,पर तभी ज़हर भरी,गाज एक वह गिरी,पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,और हम अजानसे,दूर के मकान से,पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
16 अक्टू॰ 2008
अरविन्द का बुकर
३३ साल के अरविन्द को बुकर अवार्ड मिला हैइसे लेकर हाय तौबा मची है मुझे लग रहा है कि यू पी और बिहार की गरीबी को शब्दों में पिरो कर और उसे बेचकर लोग बाग़ पुरस्कार जीत रहे हैं अक्सर देखा जा रहा है कि हम लोग सिर्फ़ किस्से और कहानियों की विषय वास्तु बन कर रह गए हैं कई फिल्में भी यहीं की जमीन से जुडी होती हैं और उसमें हमारे यहाँ की भाषा और बोली शामिल करके खूब पैसा कमाया जा रहा है वही फिल्में हिट भी होती हैं अमिताभ ने फिल्मों में यहाँ की बोली शामिल कर दी वह बाक्स आफिस पर हिट कर गयी दुनिया गिरमिटिया मजदूरों के इस इलाके की भूख, गरीबी और दर्द को अपने मजे का विषय समझ रही है अरविन्द के उपन्यास में जिस ट्रक ड्राइवर की जिंदगी को नायक और खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है वैसी जिंदगी तो बहुतेरों की है लेकिन उसमे मजा यह है कि आगे बढ़ने के लिए बिहार और यू पी के लोग कैसे होते हैं मुम्बई और दिल्ली में तो यू पी और बिहार के लोगों को किस नजर से देखा जाता है यह भी किसी से छिपा नही है
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